त्वचा के क्षय रोग [ Tuberculosis of skin ] कौन - कौन से हैं ? इलाज के क्या उपाय हैं ?

त्वचा के क्षय रोग [ Tuberculosis of skin ] 


त्वचा का क्षय रोग फेफड़ों के क्षय रोग की भांति ही खतरनाक सिद्ध हो सकता है । प्रायः लोगों में भ्रान्ति होती है कि क्षय रोग ( T.B ) तो फेफड़ों ( Lungs ) में ही होता है । 

जबकि क्षय रोग शरीर के किसी भी भाग को अपना शिकार बना सकता है । यहां तक कि त्वचा भी कभी - कभी इस भयंकर रोग की गिरफ्त में आ जाती है । 

त्वचा के क्षय रोग को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है :

  • 1. प्राथमिक क्षय रोग ( Primary T.B ) 
  • 2. द्वितीयक क्षय रोग ( Secondary T.B ) 
  • 3. टुबरकुलाइड्स ( Tuberculides ) 

त्वचा का प्राथमिक क्षय रोग प्रायः देखने में नहीं आता है । इस रोग में क्षय रोग के कीटाणु बाहर से ( Exogenously ) आकर त्वचा पर अपना आधिपत्य जमा लेते हैं । बच्चे इस रोग के शिकार होते हैं । 

रोग की प्रार म्भिक अवस्थाओं में शरीर के किसी भी भाग की त्वचा पर एक दाना सा उग आता है । यह दाना 6 से 12 मास तक की अवधि में स्वतः ही ठीक हो जाता है । इसलिए प्राथमिक क्षय रोग का सार्वजनिक महत्व खत्म हो जाता है । 

मनुष्यों के लिए द्वितीयक क्षय रोग का महत्व होता है । यह रोग केवल उन व्यक्तियों में होता है जिनमें कभी न कभी प्राथमिक क्षय रोग हो चुका हो । 

इस रोग के पुनः चार प्रकार होते हैं :

  • 1. ल्यूपस वल्गेरिस ( Lupus vulgaris ) 
  • 2. स्क्रोफुलोडर्मा ( Scrofuloderma ) 
  • 3. वार्टी ल्यूपस ( Warty lupus ) 
  • 4. अल्सर ( Tubercular ulcer )

1 ) ल्यूपस वल्गेरिस ( Lupus vulgaris ) -

अधिकतर रोगियों में यह रोग टुबरकिल कीटाणु ( Tubarcle bacilli ) द्वारा त्वचा के संक्रमण के कारण होता है । 

प्राय : यह जीवाणु बाह्य स्रोत ( Exogenous source ) से ही आता है , पर कभी - कभी शरीर के ही किसी भाग से आ जाता है । 

उदाहरण के लिए फेफड़ों का क्षय रोग होने की अवस्था में यह जीवाणु फेफड़ों से त्वचा में आ सकता है यद्यपि इस प्रकार की संभावनाएं काफी कम होती हैं । 

प्राय : 2 से 15 वर्ष के बच्चे इस रोग का शिकार होते हैं । 

इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्न हैं -

रोग की शुरूआत एक छोटी सी गांठ ( Nodule ) से होती है । कई बार यह गांठ नासाग्र ( Tip of nose ) पर निकलती है , परंतु चेहरे या अन्य अंग पर भी निकल सकती है । बाद में या तो गांठ फूट कर घाव बन जाती है । और या सूखकर काफी छोटी हो जाती है । 

अगर गांठ फूट गई है तो धाव के चारों ओर लालिमा आ जाती है । गांठ के सूखने की दशा में अंगों में कई प्रकार की विकृतियां पैदा हो जाती हैं , जैसे नाक टेढ़ी पड़ सकती है या पिचककर कोढ़ियों जैसी हो सकती है । कान का बाह्य भाग या कान की लो ( Pinna ) बिल्कुल नष्ट हो सकता है । 

निदान - 

रोग का निदान बहुत महत्वपूर्ण तथा कठिन कार्य होता है । उपरोक्त वर्णित लक्षणों से रोग का अनुमान हो सकता है अथवा त्वचा का थोड़ा सा भाग लेकर ( Biopsy ) सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखकर इस रोग का निदान सही होता है । 

एक बार निदान हो जाने पर रोग का इलाज अत्यन्त आवश्यक हो जाता है । रोग के इलाज के लिए आइसोनेक्स ( Isonex tablet ) की गोलियां दी जाती हैं । 

यह गोली 300 मिग्रा मात्रा तथा 100 मिग्रा मात्राओं की बनती हैं । एक वयस्क व्यक्ति के लिए 300 मिग्रा मात्रा उपयोगी होती है । 

यह गोली एक ही बार में सोते समय खिलायी जाती है । त्वचा के क्षय रोग के इलाज में क्षय रोग के पूरे इलाज की जैसे स्ट्रेप्टोमायसीन के इन्जेक्शन आदि देने की आवश्यकता नहीं होती है । 

रोग का इलाज पूरे डेढ़ साल तक करना आवश्यक होता है । आइसोनेक्स की गोलियों के साथ - साथ रोगी को संतुलित आहार देना भी बहुत आवश्यक होता है । 

2 ) स्क्रोफुलोडर्मा ( Scrofuloderma ) -

इस रोग में त्वचा का क्षय रोग लसीका ग्रन्थियों के क्षय रोग के कारण होता है । इसे हिन्दी में कन्ठमाला कहते हैं क्योंकि इस रोग में गर्दन की बहुत सी लसीका ग्रन्थियां फूलकर माला में गुंधे हुए मनकों की तरह हो जाती हैं । 

ये गांठें त्वचा से चिपक जाती हैं फिर ये गांठे फट जाती हैं । और त्वचा पर घाव कर देती हैं । घाव के चारों ओर की त्वचा काले रंग की पड़ जाती है । 

इलाज -

इस दशा का इलाज भी उसी प्रकार किया जाता है जैसे ल्यूपस वल्गेरिस का ।

3 ) वार्टी ल्यूपस ( Warty lupus ) -

यह रोग प्राय : 20-30 वर्ष उम्र के व्यक्तियों में पाया जाता है । यह या तो हाथ में होता है या नितम्बों पर । इस रोग में त्वचा पर घाव हो जाता है । इस घाव में छोटी - छोठी गांठे पाई जाती हैं । घाव से हर समय पानी रिसता रहता है । 

इलाज -

इस रोग का इलाज भी ठीक उसी प्रकार किया जाता जैसे ल्यूनस वल्गेरिस का ।


 और भी जानें :-

त्वचा और उसकी संरचना [ SKIN AND IT'S STRUCTURE ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )


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