त्वचा और उसकी संरचना [ Skin and it's structure ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )

त्वचा और उसकी संरचना  [ Skin and it's structure ]

त्वचा और उसकी संरचना  [ Skin and it's structure ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )

त्वचा और उसकी संरचना त्वचा हमारे शरीर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग होने के साथ - साथ बहुत बड़ा अंग भी है । एक सामान्य वयस्क व्यक्ति के शरीर को ढके रखने वाली त्वचा का क्षेत्रफल लगभग 1.67 वर्गमीटर और वजन लगभग 3.17 किलोग्राम होता है । त्वचा की मोटाई विभिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न होती है , इसकी सबसे कम मोटाई आंखों की पलकों पर और सबसे अधिक मोटाई पैरों के तलवों में होती है । त्वचा जीवाणुओं को शरीर के अन्दर प्रवेश करने से रोकती है । ऐसे जीवाणु बहुत ही कम हैं जो अक्षत त्वचा में प्रवेश कर सकें । 

त्वचा में प्रचुरता से तंत्रिकाएं पाई जाती हैं । तंत्रिकाओं की प्रचुरता के कारण त्वचा को वातावरण में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का आभास हो जाता है । यही कारण है कि शीतऋतु में शरीर के बाल खड़े हो जाते हैं । इन बालों के बीच में वायु एकत्र हो जाती है जो शरीर की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती हैं । डर के कारण भी कभी - कभी बाल खड़े हो जाते हैं जो शरीर की ऊर्जा को बाहर निकलने से रोकते हैं । 

त्वचा में अनेक प्रकार की प्रन्थियां भी पाई जाती हैं । दो प्रकार की ग्रन्थियां विशेष रूप से वर्णनीय हैं- 

  • - स्वेद ग्रन्थियां ( पसीने की प्रन्थियां ) तथा 
  • - त्वग्वसीय ग्रंथियां ( तेल ग्रन्थियां Cebacious glands ) 

जब भी वातावरण का तापमान बढ़ता है स्वेद ग्रन्थियां अपना कार्य प्रारम्भ कर देती हैं । स्वेद स्रावित हो - होकर त्वचा पर आता है । यह स्वेद ( पसीना ) वाष्प बनकर उड़ता है । वाष्प बनने की क्रिया में शरीर से ऊर्जा ग्रहण की जाती है और शरीर का तापमान सामान्य बना रहता है । यही कारण है कि ग्रीष्म काल में शरीर से काफी स्वेद स्रावित होता है जबकि शीतकाल में नहीं । 

स्वेद का स्रावित होना वातावरण के तापमान के साथ - साथ अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है । इसमें स्वसंचालित तंत्रिका तंत्र का प्रभाव अत्यन्त महत्वपूर्ण है । कभी - कभी हथेलियों की त्वचा से प्रचुर मात्रा में स्नेह स्रावित होता है जिससे हथेलियां हमेशा गीती बनी रहती है । व्यक्ति इस कारण अत्यन्त परेशान हो जाता है । 

त्यग्वसीय ग्रन्थियां त्वचा पर त्वग्वसा ( Sebum ) सावित करती हैं । त्वग्वसा का प्रमुख कार्य त्वचा को नमी व चिकनाई प्रदान करना होता है । लग्नता का जावित होना लेंगिक हार्मोन पर निर्भर करता है । मुख्यतः नर लैंगिक हार्मोन ( Androgens ) इस कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं । 

त्वग्वसीय प्रन्थियां मुख्यतः चेहरे पर पाई जाती हैं । क्योंकि स्वग्वसा का स्रावित होना नर लैंगिक हार्मोन पर निर्भर करता है , अतः यौवनावस्था के दौरान इन ग्रन्थियों की कार्य क्षमता कई गुनी बढ़ जाती है । लड़कों में यह कार्य क्षमता लड़कियों की अपेक्षा कई गुनी अधिक होती है , पर लड़कियों में भी त्वग्वसीय प्रन्थियां अपना कार्य तेजी से करती हैं । क्योंकि लड़कियों में भी नर लैंगिक हार्मोन पाए जाते हैं , हां , उनकी मात्रा अपेक्षाकृत काफी कम होती है । 

कभी - कभी त्वग्वसीय प्रन्थियों का मुंह किसी कारण से बन्द हो जाता है । अतः त्वग्वसा प्रन्थि के भीतर एकत्र होता जाता है और प्रन्थि फूलकर बड़ी हो जाती है । इस दशा को मुंहासे कहा जाता है । मुंहासे प्रायः लड़कों व लड़कियों में यौवनावस्था के दौरान पाए जाते हैं । इसका मुख्य कारण यही है कि इस उम्र में त्वग्वसा प्रचुर मात्रा में सावित होता है , फलस्वरूप त्वग्वसीय प्रन्धि के मुख के बन्द होने की संभावनाएं अत्यधिक बढ़ जाती हैं । 

त्वचा दो स्तरों की बनी होती है , बाह्य त्वचा या एपिडर्मिस ( Epi dermis ) और वास्तविक त्वचा या डर्मिस ( Dermis ) डर्मिस के नीचे एक ढोली - डीली तह और होती है जिसे अपस्त्वक ( Subcutaneous ) कहते हैं । बाह्य त्वचा की मोटाई शरीर के विभिन्न भागों में भिन्न - भिन्न होती है । जिन स्थानों पर घर्षण अधिक होता है वहां इसकी मोटाई भी अधिक होती है । पैरों के तलवों में इसकी मोटाई सर्वाधिक होती है । बाह्य त्वचा में कोशिकाओं की बनी हुई अनेक परतें होती हैं जिन्हें दो स्पष्ट क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है । 

कैरेटिन लिप्त स्तर या श्रंगी क्षेत्र ( Keratinised or horny layer ) तथा अंकुरण क्षेत्र ( Germinal layer ) जिसमें मुलायम जीवित कोशिकाएं होती हैं । बाह्य त्वचा में रक्त वाहिनियां नहीं होतीं एवंतु छोटी संवेदी तन्त्रिकाएं अंकुरण क्षेत्र तक प्रवेश पा जाती हैं । अंकुरण क्षेत्र तथा ऊपरी स्तर के बीच द्रव एकत्रित हो जाने पर फफोला ( Blister ) बन जाता है । अंकुरण क्षेत्र के नीचे की परत वर्णक स्तर ( Pigmentary layer ) कहलाती है । 

वर्णक स्तर की कोशिकाओं में उपस्थित मिलेनिन ( Melanin ) नामक ब्राउन रंग का वर्णक ( Pigment ) त्वचा के रंग के लिए उत्तरदायी होता है । गर्म देशों के निवासी व्यक्तियों की त्वचा में मिलेनिन बहुत अधिक होता है अतः उनका रंग काला होता है । संसार में विभिन्न जातियों की त्वचा के रंग में जो विभिन्नता देखी जाती है वह उन लोगों की त्वचा में मिलेनिन की कमी - बेशी के कारण होती है । 

एक ही व्यक्ति के शरीर की त्वचा में कुछ स्थानों पर मिलेनिन की न्यूनता हो सकती है और कुछ स्थानों पर अधिकता । सामान्यतः जननांगों व चूचुक ( Nipple ) की त्वचा में इस वर्णक की अधिकता होती है और यही कारण है कि उन स्थानों की त्वचा अपेक्षाकृत गहरे रंग की होती है । वर्णक त्वचा व शरीर के आन्तरिक अंगों की धूप से रक्षा करता है । यह रंग धूप को अवशोषित कर लेता है । यही कारण है कि शरीर के वे अंग जो खुले रहते हैं अपेक्षाकृत गहरे रंग के हो जाते हैं । धूप में पूरे दिन कार्य करने वाले मजदूरों के पूरे शरीर की त्वचा ही काली पड़ जाती हैं ।

वर्णक स्तर का मस्तिष्क से भी अप्रत्यक्ष संबंध रहता है इसलिए अधिक विचारशील व्यक्तियों व खासतौर से महिलाओं की आंखों के नीचे काली झाइयां सी पड़ जाती हैं । यह मिलेनिन की प्रचुर मात्रा में उत्पत्ति के कारण ही होता है । इसके अतिरिक्त गर्भावस्था के दौरान भी मिलेनिन की उत्पत्ति बढ़ जाती है । इसी कारण कई गर्भवती महिलाओं के चेहरे पर काली - काली झाइयां पड़ जाती हैं । इस अवस्था को त्वकविवर्णता या विवर्ण लांछन ( Cloasma ) कहा जाता है । 

गर्भ समापन के पश्चात यह अवस्था स्वतः ही ठीक हो जाती है । मिलेनिन की अधिक उत्पति के कारण ही गर्भावस्था के पश्चात चूचुकों का रंग काला हो जाता है जबकि कौमार्यावस्था में इनका रंग गुलाबी होता है । इस परिवर्तन का उपयोग न्याय सम्बन्धी विज्ञान ( Forensic science ) में भी किया जाता है । 

चूचुकों का गुलाबी रंग निश्चित रूप से बताता है कि लड़की कभी गर्भवती नहीं हुई है । बाह्य त्वचा के नीचे की परत या वास्तविक त्वचा या डर्मिस आपस में गुंधे हुए रेशों से निर्मित होती है । इसमें बहुत सी संवेदी तन्त्रिकाएं और रक्त वाह्नियां होती हैं जो रक्त द्वारा त्वचा का पोषण तथा शरीर के तापक्रम का नियन्त्रण करती हैं । 

इसी में रोमकूप ( Hair follicles ) और त्वगवसीय तथा स्वेद प्रन्थियां होती हैं । वास्तविक त्वचा के अन्दर धमनियां , शिराएं और तन्त्रिकाएं इतनी अधिक संख्या में फैली हुई होती हैं कि इसके अन्दर यदि पिन चुभोई जाए तो वह बिना किसी रक्तवाहिनी या तन्त्रिका को क्षतिग्रस्त किए हुए त्वचा में प्रवेश पा ही नहीं सकती । इसमें लिम्फ वाहिनियां भी प्रचुर संख्या में होती हैं । जैसा कि हम अभी बता चुके हैं वास्तविक त्वचा या डर्मिस में विभिन्न प्रकार की स्वेद व त्वग्वसीय ग्रंथियां विद्यमान रहती हैं । इसी पर्त में बालों , की जड़ें भी पाई जाती हैं । 

त्वग्वसीय प्रन्थियां शरीर की पूरी त्वचा पर बालों की जड़ों के साथ पाई जाती हैं , यह प्रन्थियां उन स्थानों पर बिल्कुल नहीं पाई जातीं जहां बाल नहीं होते हैं जैसे हथेलियों तथा तलवों पर फिर भी स्थानों पर ये ग्रन्थियां बिना बालों के भी पाई जा सकती हैं जैसे भौहों पर , होठों पर , चूचुकों पर , गुदा द्वार के चारों ओर तथा बाह्य जननांगों पर । 

ग्रीष्म ऋतु में तथा गर्म वातावरण में त्वग्वसा प्रचुर मात्रा में स्रावित होने लगती है । ये ग्रन्थियां यौवनावस्था के दौरान , मासिक स्राव के दौरान तथा गर्भावस्था के दौरान अत्यन्त सक्रिय हो जाती हैं । स्वेद ग्रन्थियां त्वचा में पाई जाने वाली दूसरे प्रकार की प्रन्थियां होती हैं । ये प्रन्थियां मुख्यत : दो प्रकार की होती हैं - 

  • - बाह्य स्रावी ग्रन्थियां ( Eccrine glands ) तथा 
  • - शिखर उत्सर्गी प्रन्थियां ( Apocrine glands )

बाह्य स्रावी स्वेद ग्रन्थियां नालून , होंठ तथा शिदन के अग्रभाग के अलावा शरीर के प्रत्येक भाग में पाई जाती हैं । प्रन्थियों का रस ( स्वेद ) स्वेद प्रन्थि नलिका द्वारा त्वचा के वाह्य हिस्से पर आता रहता है । गर्म वातावरण में इनकी सक्रियता बढ़ जाती है । यही कारण है कि ग्रीष्म काल में पसीना आता है क्योंकि ये ग्रन्थियां होठों , नाखूनों व शिश्न के अग्रभाग पर स्थित नहीं होती हैं ; अतः इन स्थानों पर कभी भी पसीना नहीं आता । शिखर उत्सर्गी ग्रन्थियां बगल में , चूचुकों की त्वचा पर , गुदा द्वार के चारों ओर तथा बाह्य जननांगों की त्वचा पर पाई जाती हैं । 

ये ग्रन्थियां लैंगिक क्रिया या लैंगिक उद्दीपन ( Sexual stimulation ) के समय सक्रिय हो जाती हैं । यही कारण है कि लैंगिक उद्दीपन के समय वे स्थान , जहां पर ये ग्रन्थियां होती हैं , आर्द हो जाते हैं तथा उन स्थानों से एक विशेष प्रकार की गन्ध आने लगती है । रोम अर्थात बाल त्वचा का महत्वपूर्ण भाग है । तलवे , हथेलियों , भग के आन्तरिक भाग तथा शिश्न के अग्रभाग पर इनका पूर्ण अभाव रहता है । बालों की संरचना शरीर के विभिन्न अंगों पर बदलती रहती है । 

प्रतिमाह बालों की लम्बाई लगभग 1-2 सेमी. बढ़ जाती है । बालों की वृद्धि तथा विकास अन्तःस्रावी ग्रन्थियों ( Endocrine glands ) पर निर्भर करता है । यही कारण है कि कुछ मनुष्यों के शरीर पर बाल बहुतायत से पाए जाते हैं जबकि अन्यों के शरीर पर नगण्यता से । औरतों के शरीर पर प्रायः बाल बहुत कम पाए जाते हैं , पर अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के असुन्तलन के कारण कभी - कभी औरतों के शरीर तथा चेहरे पर भी बाल आने लगते हैं । 

प्राय : बाल को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है - जड़ जो कि त्वचा में दबी रहती है जैसे कांड ( Shalt ) जो कि त्वचा के ऊपर दिखाई देता है । बाल को शरीर पर से पूर्ण रूप से हटाने के लिए अत्यन्त आवश्यक है कि बाल की जड़ को भी नष्ट कर दिया जाए । आधुनिक युग में यह कार्य विद्युत के द्वारा ( Eleetrolysis ) किया जा सकता है । केवल कांड काटने पर बालों की वृद्धि और तेज़ हो जाती है । यही कारण है कि शेविंग से बालों की वृद्धि रुकती नहीं है बल्कि और तीव्र हो जाती है ।


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