मुहांसे [ Pimple ] बार - बार क्यो हो जाते हैं ? कैसे रोक सकते हैं ?

मुहांसे [ Pimple ] 


मुहांसे सामान्यतम त्वचा समस्या है । यह रोग अत्यन्त परेशान कर देता है । रोगी इसके इलाज के लिए चारों ओर दौड़ता रहता है । पर फिर भी इससे छुटकारा नहीं पाता है । 

यह रोग यौवनारम्भ ( Puberty ) के साथ ही प्रारम्भ होता है क्योंकि इस समय त्वग्वसीय ग्रन्थियां ( Sebaceous glands ) सक्रिय हो जाती हैं । 

बीस - बाईस वर्ष की उम्र तक यह रोग बहुत कम हो जाता है । तीस वर्ष के पश्चात तो यह रोग नगण्य हो जाता है । पर कुछ व्यक्तियों में मुहांसे वृद्धावस्या तक निकलते ही रहते हैं । 

मुहांसे चेहरे , सीने तथा पीठ पर सामान्यतः पाए जाते हैं । त्वग्वसीय ग्रन्थियां त्वचा में पाई जाने वाली वे ग्रंथियां हैं जो बालों की जड़ों ( Hair roots ) के साथ पाई जाती हैं । क्योंकि ये ग्रंथियां हथेलियों तथा तलवों में नहीं पाई जाती हैं , अतः इन स्थानों पर मुहांसे होने की समस्या भी नहीं होती है । 

त्वग्वसीय ग्रन्थियां पुरुष लैंगिक हार्मोन ( Male sex hormones ) के नियंत्रण ( Control ) में कार्य करती हैं । अतः यौवनारम्भ के साथ - साथ इनकी सक्रियता कई गुनी बढ़ जाती है । 

त्वग्वसीय ग्रन्थियां एक विशेष प्रकार का पदार्थ- त्वग्वसा ( Sebum ) श्रावित करती हैं , जो त्वचा को चिकना रखता है । 

अगर इन ग्रन्थियों का मुख किसी प्रकार बन्द हो जाए तो त्वग्वसा भीतर - ही - भीतर ग्रंथियों में एकत्र होता रहता है जिससे ग्रन्थि फूलकर बड़ी हो जाती है । इसी को मुहांसा कहा जाता है । 

त्वग्वसा का अत्यधिक मात्रा में पैदा होना मुहांसे के निर्माण में सहायक होता है । पर त्वग्वसा के अधिक पैदा होने के साथ - साथ त्वग्वसीय प्रन्थि के निकास द्वार पर स्थित त्वचा कोशिकाओं की वृद्धि भी द्वार को बन्द करने के लिए आवश्यक है ।

त्वग्वसा के कारण त्वग्वसीय ग्रंथि का मुख बन्द होने पर जो मुहांसा बनता है , उसे श्वेत शीर्ष ( White head ) कहते हैं , क्योंकि मुहांसे कां ऊपरी भाग श्वेत होता है । 

पर कुछ समय पश्चात त्वग्वसा गंधक वायु की ऑक्सीजन के सम्पर्क में आकर सल्फाइड ( Sulphide ) में बदल जाती है जो काले रंग का होता है , अतः मुहांसे का शीर्षस्थ भाग भी काला हो जाता है । इस प्रकार के मुहांसे को कृष्ण - शीर्ष ( Black head ) कहते हैं । 

मुहांसों में प्राय : दर्द नहीं होता है जब तक उनमें पूय ( Pus ) ही न पड़ जाए । मुहांसे में बन्द त्वग्वसा में कुछ समय पश्चात द्वितीयक संक्रमण हो सकता है जिससे पूग स्फोटिका ( Pustule ) बन जाता है । 

यह एक प्रकार की विद्रधि ( Abscess ) में परिवर्तित हो सकता है । इसके ठीक होने के पश्चात गड्ढेदार निशान रह जाते हैं । 

कभी - कभी ठीक होने के पश्चात निशान वृद्धि करना प्रारम्भ कर देते हैं और फूलकर अत्यन्त मोटे ( Hypertrophic scars ) हो जाते हैं । इस तरह के निशान सीने तथा पीठ पर पाये जाते हैं । चेहरे पर प्रायः इस प्रकार के निशान नहीं पाए जाते हैं । 

मुहांसे लड़के व लड़कियों में बराबर संख्या में पाए जाते हैं । यह रोग ठीक होने के पश्चात बार - बार होता रहता है । इससे यह इंगित होता है । कि त्वचा का लिंग हार्मोनों के साथ आधारी एकीकरण ( Basic adjustment ) बिगड़ गया है । औरतों में अनियमित ऋतुस्राव या रजोधर्म में कमी अक्सर इससे संबंधित है । 

ऋतुस्राव के कुछ दिन पूर्व प्राय : लड़कियां गंभीर तौर से मुहांसों से ग्रसित हो जाती है । थोड़े मुहांसों से प्रायः कोई परेशानी नहीं होती है । पर ज्यादा मुहांसे चिन्ता का कारण बन जाते हैं । 

मुहांसों के कारण उत्पन्न गड्ढेदार निशानों से वास्तव में चेहरा भद्दा हो जाता है । ' कभी - कभी मुहांसे विशेष प्रकार के व्यवसाय के कारण भी होने लगते हैं । कुछ रासायनिक पदार्थ त्वग्वसीय ग्रंथियों के मुख द्वार को बंद कर देते हैं । 

क्लोरीन तथा वसीय पदार्थ ( Oily substances ) प्रायः इसी प्रकार के पदार्थों में आते हैं । इतना ही नहीं विभिन्न प्रकार के तेल और क्रीमें जो केश राशि को संवारने तथा चेहरे पर लगाने के काम आते हैं ये भी मुहांसों की वृद्धि कर सकते हैं । 

कुछ दवाएं भी मुहांसे पैदा करने वाली होती हैं । इस प्रकार के मुहांसों के चारों तरफ त्वचा में थोड़ी - सी खुजली ( Mild pruritus ) भी प्रायः पाई जाती है । 

ब्रोमाइड तथा आयोडाइड इसी प्रकार की दवाओं में आते हैं । एन्टरोवायोफार्म एक ऐसी दवा है जिसका प्राय : अमीबा जन्म प्रवाहिका ( Amebiasis ) के इलाज में उपयोग किया जाता है तथा जो मुहांसों की वृद्धि कई गुनी कर सकती है । 

भोजन का भी मुहांसों के साथ संबंध स्थापित हो चुका है । प्रायः यह पाया गया है कि असंतुलित आहार मुहांसों को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । 

ऐसा भोजन जिसमें विटामिनों तथा प्रोटीन की कमी हो , मुहांसे के रोगियों के लिए उचित नहीं होता है । 

अत्यधिक वसा तथा कार्बोहाइड्रेट्स मुहांसों की गम्भीरता को बढ़ा देते हैं । अन्त में कहा जा सकता है कि आधुनिक शहरी जीवन मुहांसों को जन्म देने में पूर्ण रूपेण सहायक पाया गया है । 

मुहांसे संक्रामक रोग के अन्तर्गत नहीं आते हैं परन्तु इनसे परेशानी बहुत होती है । कभी - कभी तो मुहांसे इतने भयंकर रूप में जन्म लेते हैं कि रोगी का व्यक्तित्व तक बिगड़ सकता है । इसकी संभावना स्त्रियों में और भी ज्यादा होती है । 

मुहांसों के इलाज के लिए दवाओं के साथ - साथ अन्य बातें भी आवश्यक हैं : 

( 1 ) रोगी को थोड़ी - बहुत देर ताजी हवा व धूप का सेवन करना चाहिए , 

( 2 ) हल्का - फुल्का व्यायाम मुहांसों के लिए लाभदायक है , 

( 3 ) कब्ज से बचना चाहिए , 

( 4 ) भोजन संतुलित होना चाहिए । उसमें हरी सब्जियों व प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों की प्रचुरता होनी चाहिए । कार्बोहाइड्रेटस का सेवन कम करना चाहिए । चाकलेट व मिठाई का सेवन हानिकारक है ,

( 5 ) सौन्दर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल हानिकारक हो सकता है । विशेषतया चिकनी प्रसाधन सामग्रियों से दूर रहना चाहिए , 

( 6 ) डेन्ड्रफ से बचाव करने के लिए औषधियों का प्रयोग आवश्यक होता है , 

( 7 ) चेहरे को दो - तीन बार साबुन तथा गर्म पानी से अवश्य धोना चाहिए । दिन के समय चेहरे को साफ करने वाली स्प्रिट का प्रयोग किया जा सकता है । 

रात्रि के समय विशेष प्रकार की मरहम ( Ointments ) का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे त्वचा शुष्क रहे । 

कभी - कभी त्वचा इतनी शुष्क हो जाती है कि जलन होने लगती है । ऐसी अवस्था में मरहम का प्रयोग रोक देना चाहिए ,

 ( 8 ) वास्तविकता तो यह है कि धूल , चिकनाहट व गन्दगी वाले कार्य मुहांसे के रोगियों के लिए लाभप्रद नहीं होते हैं । पर इतनी आसानी से व्यवसाय परिवर्तित कर देना सामान्य बात नहीं कहीं जा सकती । 

हां , ऐसे धन्धे करने वाले मुहांसों के रोगियों को चेहरे को अधिक से अधिक स्वच्छ रखने का प्रयास चाहिए , 

■ इलाज -

वास्तव में मुहांसों के इलाज में कभी भी अधिक सफलता नहीं मिल पाती है क्योंकि इस रोग का कोई विशेष इलाज है ही नहीं । 

हां , इसमें कोई संदेह नहीं है कि ज्यादातर रोगियों के मुहांसे इलाज से ठीक हो जाते हैं । 

विटामिन A मुहांसों के इलाज में काफी लाभदायक होता है । इसकी मात्रा 100,000 से 200,000 अन्तर्राष्ट्रीय इकाई तक होती है । 

सोचा यह जाता है कि कोई भी ऐसी दवा जो अतिकिरेटिनिता ( Hyper keratosis ) को कम करेगी , मुहांसों में लाभदायक होगी । क्योंकि अति किरेटिनिता के कारण त्वग्वसीय ग्रंथियों का मुख बन्द हो जाता है । जिससे मुहांसे के निर्माण में सहायता मिलती है । 

विटामिन A, अतिकिरेटिनिता को रोक कर मुहांसों के इलाज में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं । 

संक्रमण को रोकने के लिए एन्टीबॉयटिक्स का प्रयोग भी अत्यन्त लाभदायक है । सल्फाड्रग्स तथा अन्य एन्टीबॉयटिक्स का उपयोग प्रायः किया जाता है ।

कभी - कभी रोग की भयंकर स्थिति में , जब सभी दवाएं नाकाम साबित होती हैं , हार्मोनों का प्रयोग भी किया जा सकता है । 

इसके लिए स्टिलबेस्ट्रॉल 1 मिग्रा ० प्रत्येक दिन दिया जाता है । हां , यह ध्यान रखना चाहिए कि स्तनों में दर्द होने पर इस दवा का प्रयोग रोक देना चाहिए । 

चेहरे को दो - तीन बार साबुन तथा गर्म पानी से धोना चाहिए । रात्रि के समय विशेष प्रकार की मरहम का प्रयोग करना चाहिए जिससे त्वचा शुष्क हो जाए । 

एक इसी प्रकार के मरहम का फार्मूला निम्न है : 

  • ● पोटेशियम सल्फ्यूरेटा 3 - 8 ग्राम, 
  • ● जिंक सल्फेट 3 - 8 ग्राम, 
  • ● कैलेमीन 5 - 10 ग्राम, 
  • ● स्प्रिट 60 मिली, 
  • ● एक्वा फैल्सिस 100 मिली,

इस मरहम का लेप रात्रि में किया जाता है । तीन रात्रि तक लगातार उपयोग के पश्चात एक रात्रि के लिए इसका उपयोग रोक देना चाहिए । 

कुछ मुहांसे के रोगियों में उपरोक्त मरहम से लाभ नहीं होता है । इन रोगियों के लिए निम्नलिखित मरहम लाभप्रद होता है : 

● बीटा नेपथोल 2 ग्राम,  

● सल्फर 4 ग्राम,

● सॉफ्ट सोप 12 ग्राम,

● वैसलीन 12 ग्राम, 

यह मरहम रात्रि के समय चेहरे पर लगा ली जाती है । ऐसा लगा तार कई रात्रि तक करना पड़ता है जब तक कि चेहरे पर रक्त का बहाव न बढ़ जाए।

रक्त का बहाव बढ़ने पर चेहरे पर लालिमा आ जाती है । मुहांसों के ठीक होने के पश्चात कभी - कभी चेहरे पर बदसूरत धब्बे दोष रह जाते हैं । 

इन धब्बों को एक विशेष प्रकार की शल्य चिकित्सा ( Dermoabrasive , therapy ) से मिटाया जा सकता है । अगर धब्बे काफी गहरे हैं तो प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है ।


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त्वचा और उसकी संरचना [ SKIN AND IT'S STRUCTURE ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )


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