परजीवी रोगों ( Parasitic diseases ) से किस प्रकार बचाव संभव हैं ? : [ स्केबीज ( Scabies ) & यूकोपसर्ग ( Pediculosis ) ]

परजीवी रोग ( Parasitic diseases ) 


■ स्केबीज ( Scabies ) -

यह रोग सांसर्गिक ( Contagious ) रोगों की श्रेणी में आता है , जो कि एक सूक्ष्मकीट ( Mite ) सारकोप्ट्स स्केबिआई ( Sarcoptes scabei ) के कारण होता है । 

इस रोग में अत्यन्त तीव्र खुजली ( Itching ) होती है । जो कि हमेशा रात्रि के समय ही रोगी को परेशान करती है । सूक्ष्मकीट की मादा की लम्बाई लगभग 0.3 मिमी होती है । इस कीट के आठ टांगें होती हैं - चार सामने जो कि चूषक ( Sucker ) का कार्य करती हैं ; चार पीछे होती हैं जो कांटों ( Spines ) का निर्माण करत हैं । 

नर कीट की लम्बाई मादा कीट की लगभग आधी होती है । यह कीट बहुत कम दिखाई पड़ता है । अधिकतर तो मादा कीट ही दिखाई देता है । 

नर कीट मादा कीट के साथ सहवास करता है । संसेचित ( Impreg nated ) मादा बाह्य त्वचा की कोशिकाओं के अन्दर घुसती है । प्रत्येक दिन यह कीट लगभग 0.5 मिमी० लम्बाई तय करता है । 

भीतर घुसते , हुए मादा कीट अपने पीछे अण्डे छोड़ती जाती है । मादा 2-3 अण्डे प्रति दिन देती है तथा लगभग 1-2 माह तक जीवित रहती है । तत्पश्चात उसकी मृत्यु हो जाती है । 

अण्डों से कुछ ही दिनों में बच्चे ( Acari ) निकल आते हैं जो आसपास के केश की जड़ों में छुप जाते हैं । कुछ दिनों पश्चात बच्चे वयस्क नर तथा मादा कीटों में परिवर्तित हो जाते हैं ।

 नर कीट मादा के साथ पुनः सहवास करके एक नए जीवन चक्र ( Life cycle ) की शुरूआत कर देता है । इस रोग के फैलने के लिए शारीरिक सम्पर्क होना आवश्यक है । प्रायः ' शारीरिक सम्पर्क की अवधि 1-2 घण्टे तक होना आवश्यक है । 

अतः यह रोग एक ही साथ बिस्तर पर सोने वाले व्यक्तियों में आसानी से फैल जाता है । बच्चों में यह रोग साथ - साथ खेलने तथा हाथ मिलाने से भी होता देखा गया है । 

स्केबीज के कीट शरीर पर आने के लगभग एक माह पश्चात तक व्यक्ति ठीक रहता है । उसे कोई भी समस्या नहीं होती है । एक माह के पश्चात खुजली ( Itching ) प्रारम्भ हो जाती है । लाल - लाल चकत्ते शरीर पर पड़ जाते हैं । 

ये चकत्ते उन स्थानों पर पड़ते हैं जहां पर मादा कीट अण्डे देती है । खुजली प्राय: रात्रि को सोते समय होती है । खुजली होने पर व्यक्ति खुजलाता है जिससे त्वचा छिल जाती है । छिली हुई त्वचा पर द्वितीयक संक्रमण हो जाता है ।

स्वबीज का मुख्य चिन्ह ( Sign ) त्यऩसुरंग ( Burrows ) की उपस्थिति है । इन सुरंगों के चारों ओर रक्तिम पुटकीय ( Follicular ) पित्तिकाएं ( Rash ) पाई जाती हैं । ये पित्तिकाएं देशों की जड़ों के पास कीट के बच्चों ( acari ) की मौजूदगी के कारण होती हैं । 

पित्तिकाएं उदर ( Abdomen ) , बगल के चारों ओर तथा जंघाओं के भीतरी भाग पर पाई जाती हैं । सुरंगें प्रायः हाथ के भीतरी भाग पर दो अंगुलियों के बीच वाले स्थान ( धाइयां ) पर , कुहनी पर , बगल पर , नितम्बों पर ( Buttocks ) , शिश्न पर तथा स्त्रियों के चूचूक ( Nipples ) के चारों ओर पायी जाती हैं ।

मादा कीटों की संख्या प्राय: 1 से 50 तक होती है । सामान्यतः स्केबीज के रोगी के शरीर पर औसतन 12 मादा कीट पायी जाती हैं । प्रायः सोचा जाता है कि स्केवीज हमेशा गरीब व निम्न वर्ग के व्यक्तियों में पाई जाती है , पर यह गलत है । यह रोग समाज के किसी भी वर्ग के व्यक्ति में हो सकता है । 

सुरंगों की पहिचान रोग के निदान में महत्वपूर्ण स्थान रखती है । स्केबीज के इलाज के लिए प्रायः दो दवाएं प्रयोग होती हैं : 

  • 25% बेन्जाइल बेन्जोएट ( Benzyl Benzoate ) 
  • अथवा दूसरी,
  • 1% गामा बेन्जीन हेक्साक्लोराइड ( Gamma benzene hexachloride )

गामा बेन्जीन हेक्सा० अधिक उपयोगी तथा लाभप्रद दवा है । ये दोनों ही दवाएं सोल्यूशन या ऐमल्शन के रूप में आती हैं । 

दवा को गर्दन से लेकर पर तक , शरीर के प्रत्येक हिस्से पर लगाना अत्यन्त आवश्यक है ; चाहे उ हिस्से पर खुजली ( Itching ) होती हो या न होती हो । 

पुरुषों में शिश्न पर तथा स्त्रियों में स्तन व भग ( Vulva ) के आस - पास भी इस दवा का प्रयोग आवश्यक है । 

अधिकतर मामलों में यह पाया गया है कि दवा के प्रयोग के पश्चात भी स्केबीज में फायदा नहीं होता है । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रोगी प्राय : दवा का प्रयोग शरीर के केवल उन हिस्सों पर करता है जहां खुजली होती है अन्य हिस्सों पर नहीं जननांग तो प्रायः ही इस दवा से बच जाते हैं । 

दवा का प्रयोग 24 घण्टे के अन्तराल से केवल दो बार किया जाता है । इस प्रकार पूरे शरीर पर दवा 48 घण्टे तक रहती है । 

इन 48 घण्टों में शरीर के किसी भी भाग से दवा छुटानी नहीं चाहिए । इसका अर्थ यह है कि दवा लगाने के कम से कम 48 घण्टे बाद तक स्नान नहीं करना चाहिए । 

अगर किसी भाग से दवा घुल भी जाए तो तुरन्त ही दवा का लेप करना आवश्यक हो जाता है । 48 घण्टों के पश्चात स्नान कर लेना चाहिए । सभी कपड़े बदल देने चाहिए । पहले पहने हुए कपड़ों को उबालकर ( अगर सूती हों तो ) साफ करके ही पहनना चाहिए ।

इलाज के पश्चात भी दो सप्ताह तक खुजली हो सकती है । इसके लिए यूरेक्स मरहम ( Eurax ointment ) सबसे अच्छी दवा है । प्राय : दो सप्ताह के पश्चात खुजली खत्म हो जाती है । 

अगर दो सप्ताह के पश्चात भी खुजली खत्म न हो तो एक बार पुनः 48 घण्टों तक पूर्व वर्णित दवा का प्रयोग आवश्यक है । 

■ यूकोपसर्ग ( Pediculosis ) -

यूकोपसर्ग या पेडीकुलोसिस रोग एक विशेष प्रकार के कीट के द्वारा होता है जिसे यूका या जूं ( Louse ) कहा जाता है । 

मनुष्य के शरीर तीन प्रकार के यूका पाए जा सकते हैं:

1 ) सिर पर पाए जाने वाला यूका ( Head louse ) , 

2 ) शरीर पर पाए जाने वाला यूका ( Body louse ) तथा

3 ) जघनास्थि ( Pubic bones ) के सामने स्थित बालों पर पाया जाने वाला यूका ( Pubis louse ) । 

ये सभी प्रकार के युका अपना भोजन मनुष्य के रक्त से प्राप्त करते हैं । सिर पर पाया जाने वाला यूका अपने अण्डे सिर के बालों से चिपका देता है । 

ये अण्डे 6 से 16 दिन के पश्चात यूका के बच्चे को जन्म देते हैं जो 3-4 माह पश्चात पूर्ण विकसित यूका ( जूं ) का रूप धारण कर लेते हैं ।

यूकोपसर्ग रोग सिर के पिछले भांग पर अत्यधिक होता है । इसके कारण सिर पर तीव्र खुजली होती है । मनुष्य के खुजलाने से त्वचा से कभी कभी रक्त स्राव तक होने लगता है और उसी त्वचा पर द्वितीयक संक्रमण ( Secondary infection ) भी हो सकता है । 

सिर पर पायी जाने वाली जूं के लिए 2% डी० डी० टी० मरहम या 0.1% गामा बेन्जीन हेक्साक्लोराइड उत्तम दवाएं हैं । सभी दवाएं यूका को मारती हैं पर अण्डों को नहीं । दोनों में से किसी एक दवा का सिर पर लेप कर लिया जाता है । 

लेप करने के लगभग 24 घण्टे पश्चात सिर को घो लेते हैं और एक महीन दांतों वाले कंधे से बालों को झाढ़ते हैं , जिससे बालों पर चिपके हुए अण्डे कंधे पर आ जाएं । 

शरीर पर पाई जाने वाली जूं बनियान या ब्रेजियर अथवा ब्लाउज पर पाई जाती है । इन्हीं कपड़ों पर यह जूं अपने अण्डे चिपका देती है अगर जुंओं की तादाद बढ़ जाती है तो बगल के बालों में भी इनको पाया जा सकता है । कपड़ों की सीवन इनके लिए अत्यन्त लोकप्रिय स्थान होता है । 

एक पूर्ण विकसित यूका लगभग एक माह तक जीवित रहती है । तत्पश्चात इसकी मृत्यु हो जाती हैं । एक यूंका अपने जीवनकाल में लग भग 200-300 तक अण्डे देती है । 

यूका प्राय : कपड़ों में रहती है तथा भोजन प्राप्त करने के लिए शरीर पर उतरती है । अतः शरीर के वे स्थान जो कपड़ों के अत्यधिक निकट सम्पर्क में रहते हैं , आसानी से यूका द्वारा भोजन प्राप्ति के लिए चुन लिए जाते है । कंधे , बगल तथा नितम्बों के ऊपरी भांग प्रायः यूका के भोज्य स्थल होते हैं ।

यूका इन्हीं स्थानों पर अपनी छोटी - सी सूंड द्वारा रक्तपान करती है । स्थानों पर तीव्र जलन होने लगती है जिससे रोगी बार - बार खुज लाता रहता है । 

शरीर पर स्थित यूका के इलाज के लिए निम्नलिखित विधि प्रयोग में लानी चाहिए : 

( क ) गर्म पानी से स्नान, 

( ख ) स्नान करने के पश्चात समी अन्दर पहने जाने वाले कपड़ों पर 10 % डी० डी० टी० का छिड़का, 

( ग ) कपड़े के वजन का 1/10 भाग डी० डी० टी० का पाउडर अवश्य छिड़का जाना चाहिए । 

उपरोक्त साधारण विधि से प्रायः यूका से छुटकारा मिल जाता है । पर अगर यूका से छुटकारा न मिले तो पुनः डी ० डी ० टी ० का छिड़काव आवश्यक हो जाता है । 

जंघनास्थि के समक्ष स्थित बालों में निवास करने वाला यूका ( Pediculus pubis ) कभी - कभी बुगलों में , भग के चारों ओर स्थित बालों में तथा गुदाद्वार ( anus ) के चारों ओर स्थित बालों में पाया जा सकता है । 

यह यूका अपने अण्डे बालों से चिपका देता है । अण्डे 7-8 दिनों में बच्चों को जन्म देते हैं । रोग प्रायः निम्न वर्ग के व्यक्तियों में स्वच्छता के अभाव में होता है । 

यह रोग प्रायः लैंगिक समागम ( Sexual intercourse ) द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे में फैलता है । समागम के दौरान जब स्त्री तथा पुरुष के जघन रोम ( Pubic hair ) एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तो यूका आसानी से एक शरीर से दूसरे शरीर पर चली जाती है । 

यूका के काटने से जननांगों तथा जघनास्थि के आस - पास तीव्र जलन होती है । इसीलिए यह यूका भगकण्डू ( Pruritus vulvi ) तथा गुद कण्डू ( Pruritus ani ) भी कर सकता है । 

कभी - कभी जंघाओं के भीतरी भाग तथा जघनास्थि के सामने छोटे छोटे चकत्ते पड़ जाते हैं । ये चकत्ते यूका के लारवा ( जूंके छोटे बच्चे ) में उपस्थित रंजक पदार्थों के कारण होते हैं ।.

जघन रोग भग के चारों ओर के रोम तथा गुदा द्वार के चारों ओर के रोमों पर 2 % डी ० डी ० टी ० मरहम का लेप लगाना चाहिए । अगर यह उपलब्ध न हो तो गामा बेन्जीन हेक्सावलोराइड का उपयोग किया जा सकता है । 

रोग के उपचार में स्वच्छता का महत्वपूर्ण स्थान है । एक स्वच्छ व्यक्ति के शरीर में यह रोग होता ही नहीं है ।


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त्वचा और उसकी संरचना [ SKIN AND IT'S STRUCTURE ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )


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