फंगस के कारण त्वचा की बीमारियां ( Fungal diseases of skin ) क्या - क्या हो सकती है ? कैसे इलाज कर सकते हैं ?

फंगस के कारण त्वचा की बीमारियां ( Fungal diseases of skin )


■ कैन्डिडा एल्बीकेन्स के कारण त्वचा के रोग ( Skin diseases due to Candida Albicans ) -

यह फंगस सामान्यतः आंतों में पाया जाता है । वहां पर यह बिना कोई नुकसान पहुंचाये पड़ा रहता है । त्वचा पर सामान्यतः यह फंगस नहीं पाया जाता है । 

अगर त्वचा की आद्रता बढ़ जाए तो यह फंगस त्वचा पर भी अपना आधिपत्य जमा सकता है । जहां आंतों में यह बिना कोई रोग पैदा किए बना रहता है , वहीं त्वचा पर इसकी उपस्थिति से तरह - तरह के रोग पैदा हो जाते हैं ।

मधुमेह अथवा एन्टीबायटिक्स व स्टेराइड्स के सेवन से यह रोग अत्यन्त तेजी से फैल जाता है । आंतों में फंगस यीस्ट की शक्ल में रहता है परन्तु त्वचा पर आने के पश्चात यह अपना रूप बदलकर माइसीलियम ( Mycelium ) का रूप धारण कर लेता है । 

कैन्डिडा नखों की त्वचा तथा ऐसी त्वचा , जहां दो आर्द्र तल आपस में सम्पर्क में रहते हैं , को बहुत जल्दी प्रभावित कर लेता है । साथ ही साथ यह फंगस मुख तथा योनि की अन्दर की श्लेष्मल कला को भी प्रभावित करता है । 

मुखपाक ( Stomatitis ) रोग तब होता है जब केन्डिडा मुख की श्लेष्मल कला में प्रवेश करके अपना प्रसार प्रारम्भ कर देता है । मुख की श्लेष्मल कला पर श्वेत - श्वेत , दही की भांति चकत्ते जम जाते हैं । 

यह रोग बच्चों में तथा उन व्यक्तियों में जो एन्टीबॉयटिक या स्टेराइड का सेवन कर रहे हैं , ज्यादातर पाया जाता है । 

भग योनि शोथ ( Vulvo vaginitis ) कैन्डिडा द्वारा पैदा किए जाने वाला दूसरा रोग है । इस रोग में फंगस योनि की श्लेष्म कला में प्रवेश कर जाता है । 

योनि द्वार तथा भग के चारों ओर तीव्र खुजली ( Severe ) irritation ) होता है । साथ - साथ योनि से गाढ़े सफेद रंग का स्राव भी होता है । श्लेष्म कला में सूजन आ जाती है तथा भग के आसपास की त्वचा भी सूज जाती है । 

कैन्डिडा द्वारा होने वाला योनि शोथ प्रायः मधुमेह से पीड़ित नारियों में देखने के लिये मिलता है । गर्भवती नारियां भी इस रोग का शिकार बन सकती हैं । 

परिनख शोथ ( Paronychia ) कैन्डिडा द्वारा पैदा किये जाने वाला तीसरा रोग है । इस रोग में फंगस नख के आसपास की त्वचा को अपना शिकार बनाता है । 

शुरुआत में थोड़ा दर्द भी हो सकता है , पर बाद में कुछ समय के अन्तराल पर दर्द होता रहता है । इस सूजन के कारण नख का आकार भी बेढंगा हो सकता है । 

परिनख शोथ हमेशा घरेलू काम - काज करने वाली नारियों में ही पाया जाता है । इसके अलावा कुछ धन्धे करने वाले पुरुषों में भी यह रोग पाया जा सकता है । जैसे फलों का धन्धा करने वाले पुरुषों में जहां हाथ हमेशा गीले रहते हैं । 

जल की उपस्थिति के कारण बाह्य त्वचा का मसूणीकरण हो जाता है और फंगस मसूणीकृत त्वचा में प्रवेश कर जाता है । सीधे हाथ की मध्य उंगली सर्वप्रथम रोग का शिकार बनती है । 

इन्टरट्राइगो ( Intertrigo ) कैन्डिडा द्वारा होने वाला चौथा रोग है । इस रोग में त्वचा की दी सतहें सम्पर्क में रहने के कारण फंग शिकार बन जाती हैं जैसे कि गुदाद्वार के चारों ओर की त्वचा , स्तनों के निचले भाग की त्वचा जो उदर की त्वचा के सम्पर्क में रहती है तथा बगल और दो अंगुलियों के मध्य की त्वचा । 

फंगस के कारण त्वचा में सूजन आ जाती है । तीव्र शूल तथा जलन भी इस रोग के लक्षण हैं ।

कैण्डिडा द्वारा उत्पन्न किए गए किसी भी प्रकार के रोग का इलाज एक ही होता है :

स्थानीय इलाज -

फंगस द्वारा प्रभावित त्वचा को स्वच्छ तथा शुष्क रखना चाहिए क्योंकि आर्द्रत्वचा फंगस को अपनी ओर आमंत्रित करती है अतः त्वचा को स्वच्छ जल व साबुन से धोने के पश्चात तौलिए से पोंछना आवश्यक है । 

भग योनि शोथ की रोगिणी को स्नान करते समय भग व योनि दोनों को साबुन से साफ करने के पश्चात सूखे तौलिए से साफ कर लेना चाहिए । 

प्रायः स्त्रियां जननांगों पर पड़े पानी को ठीक से न सुखाकर ही कपड़े पहन लेती हैं । यह पानी जननांगों के आस - पास की त्वचा की आर्द्रता बढ़ाकर फंगस को आकर्षित करता है । 

त्वचा व श्लेष्म कला को सुखाने के पश्चात निम्नलिखित किसी दवा का लेप करना चाहिए : 

  • हेमाइसिन मरहम ( Haymycin ) दिन में दो - तीन बार 
  • अथवा , 
  • माइकोजेल मरहम ( Micogel ) दिन में दो तीन बार 
  • अथवा ,
  • माइकोस्टेटिन मरहम ( Mycostatin ) दिन में दो तीन बार । 
  • अथवा , 
  • सरफेज मरहम ( Surfaz ) दिन में दो तीन बार 

भगयोनिशोथ की रोगिणी के लिए निस्टाटिन एन्टीबायोटिक की बत्तियां ( Pessaries ) उपलब्ध हैं जिन्हें सोते समय योनि के भीतर रख लिया जाता है । 

साथ ही भगशोथ के लिए भग ( Vulva ) के चारों ओर की त्वचा पर निस्टेटिन क्रीम या मरहम का प्रयोग भी आवश्यक है । 

आन्तरिक इलाज ( Systemic treatment ) -

आन्तरिक इलाज के लिए एन्टीबॉयटिक्स का प्रयोग आवश्यक है । क्योंकि प्राय : फंगस इन्फेक्शन के साथ - साथ द्वितीयक संक्रमण होने लगता है । 

कोई भी ब्रॉड स्पेक्ट्रम एन्टीबॉयटिक प्रयोग में लाया जा सकता है । साथ ही साथ आंतों के फंगस को दूर करने के लिए निस्टेटिन टेब्लेटस ( Nystatin tablets ) का प्रयोग आवश्यक है । 

अगर आंतों के फंगस को दूर न किया जाए तो एक बार ठीक होने के पश्चात पुन : फंगस संक्रमण हो जाता है । 

निस्टेटिन की एक टेबलेट में 500000 यूनिट दवा होती है । एक सामान्य व्यक्ति के लिए दिन में दो या तीन टेबलेट पर्याप्त होती हैं । 

■ दाद ( Ringworm ) -

दाद त्वचा का एक बहुत प्रचलित रोग है । यह रोग एक प्रकार के फंगस के कारण होता है जिसे टीनिया ( Tinea ) के नाम से जाना जाता है । 

यह फंगस बाह्य त्वचा की किरेटिन लिप्त ( Keratinized ) कोशिकाओं में तो प्रवेश कर जाता है पर अन्य कोशिकाओं में प्रवेश नहीं कर पाता है । इसलिए यह रोग रोमों ( Hair ) , नखों ( Nails ) तथा बाह्य त्वचा की श्रंगी पर्त ( Horny layer ) तक ही सीमित रहता है । 

टीनिया फंगस को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है : 

  • ● माइक्रोस्पोरॉन ( Microsporon ), 
  • ● एपीडर्मोफाइटोन ( Epidermophyton ) तथा,
  • ● ट्राइकोफाइटोन ( Tricho phyton ), 

■ काय दद्रु ( Tinea corporis ) - 

यह रोग प्रायः माइकोस्पोरॉन केनिस ( Microsporon canis ) के द्वारा होता है । यह फंगस प्रायः बिल्लियों व कुत्तों से मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है । 

इस रोग में गोल - गोल चकत्ते ( Circular patches ) त्वचा पर पड़ जाते हैं । यह चकत्ते परिधि की ओरं ( Towards periphery ) बढ़ते जाते हैं तथा केन्द्र में ठीक होते जाते हैं । 

इस प्रकार एक तरह का घेरा ( Ring ) सा बन जाता है । चकत्ते प्रायः लाल होते हैं । पर कभी कभी तीव्र सूजन भी पायी जा सकती है । 

चकत्ते प्रायः एक या दो ही होते हैं , पर कभी - कभी कई चकत्ते एक साथ पाए जा सकते हैं । वैसे तो देखकर ही इस रोग का पता लगाया जा सकता है पर अन्तिम निदान के लिए फंगस को सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखना आवश्यक होता है । 

इसके लिए चकत्ते की परिधि से थोड़ी सी खाल ( Scales ) लेकर एक स्लाइड पर रख लेते हैं तथा एक कवर स्लिप से ढंक देते हैं । उसके बाद 20% पोटेशियम हाइड्रोक्साइड की स्लाइड पर चार - पांच बूंदें रख देते हैं । 

स्लाइड को बर्नर पर कुछ सेकण्ड के लिए गरम करते हैं । फिर एक सूक्ष्मदर्शी की सहायता से स्लाइड का निरीक्षण करते हैं । अगर फंगस त्वचा में है तो त्वचा की कोशिकाओं को काटती हुई कई घारियां दिखाई देंगी । ऐसी धारियों दिखाई देने पर रोग की पुष्टि हो जाती है । 

■ वंक्षण बहु ( Tinea cruris ) - 

यह रोग एपीडर्मोफाइटॉन फ्लॉकुसम ( Epidermophyton floccusum ) के द्वारा होता है । रोग प्रायः पुरुषों तक ही सीमित रहता है । 

प्रायः शुरुआत में लाल - लाल दाने उभर आते हैं जो परिधि की ओर बढ़ने लगते हैं तथा कुछ समय पश्चात सभी दाने आपस में मिलकर लाल - लाल चकत्ते बना लेते हैं । 

चकतों की परिधि या किनारे ( Peri phery ) अधिक सक्रिय होती है अतः सूजन भी केन्द्र की अपेक्षा परिधि पर ही अधिक होती है । 

चकत्तों में तीव्र खुजली तथा जलन होती है । ज्यादातर ये चकत्ते जंघाओं के उस भीतरी भाग पर पाए जाते हैं जो वृदणकोष के सम्पर्क में रहता है । 

कभी - कभी इन चकत्तों में खुजलाहट इतनी सी होती है कि रोगी खुजलाए बिना नहीं रह पाता है । चकतों को खुजलाने पर कभी - कभी द्वितीयक संक्रमण हो जाता है तथा उसमें पीप ( Pus ) भी पड़ सकती है । 

■ पैरों की दाद ( Tinea pedis ) -

यह सबसे ज्यादा प्रचलित फंगल संक्रमण है जो एपीडर्मोफाइटोन पलॉकुसम के द्वारा होता है । यह रोग स्नान घरों तथा संडासों ( Lava tories ) में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रवेश करता है । 

यह रोग प्रायः नवयुवकों को अपना शिकार बनाता है । नवयुवक ही इस रोग के शिकार क्यों बनते हैं , इसका कोई भी कारण ज्ञात नहीं हो सका है ! 

पैरों की अंगुलियों व अंगूठों के बीच की त्वचा निर्जीद सफेद रंग की हो जाती है । शनैः शनैः यह त्वचा नीचे की जीवित ( Viable ) त्वचा से अलग होने लगती है । 

इस समय इस भाग में तीव्र जलन व खुजली होने लगती है । रोग कभी - कभी तलवों पर भी पाया जा सकता है । 

■ टीनिया इन्कागनिटो ( Tinea incognito ) - 

अगर इस फंगल रोग पर स्टेरॉइड ( Steroid ) मरहम का प्रयोग किया जाए तो जलन व खुजली कुछ समय के लिए बन्द हो जाते हैं । लालिमा व चकत्ते भी खत्म हो सकते हैं । पर फंगस का नाश नहीं होता है और यह फंगस त्वचा की कोशाओं में जीवित बैठी रहती हैं । 

कुछ समय पश्चात फंगस पुनः अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ करती है । त्वचा पर तीव्र लालिमा ( Intense erythema ) हो जाता है । छोटे - छोटे दाने पैदा हो जाते हैं जिनमें पूय ( Pus ) भरा होता है । 

यदि कोई रोगी यह बताए कि उसने स्टेराइड क्रीम का प्रयोग किया था परंतु इस उपचार से उसे लाभ होकर फिर रोग उभर आया है तो इस रोग की संभावना हो सकती है । इसका इलाज भी अत्यन्त कठिन होता है । 

अतः कभी भी रोग का स्वयं निदान करके इथन - उधर की मरहमों का प्रयोग अत्यन्त खतरनाक सिद्ध हो सकता है । 

त्वचा के रोगों को तुच्छ नहीं समझना चाहिए । कोई भी त्वचा का रोग होने पर चिकित्सक को दिखाकर ही दवा का प्रयोग करना चाहिए । 

■ नख दद्रु ( Tinea unguium ) -

नाखूनों की दाद प्रायः ट्राइकोफाइटॉन रुब्रम ( Trichophyton rubrum ) नामक फंगस द्वारा उत्पन्न होती है । 

फंगस प्रायः नख के स्वतंत्र किनारे ( Free edge ) से प्रवेश करता है तत्पश्चात नाखून की जड़ ( Nail bed ) तक पहुंच जाता है । 

जिन नखों पर फंगस लग जाता है वे सुरदरे ( rough ) तथा अनियमित ( Irregular ) हो जाते हैं । 

■ शीर्ष दद्रु ( Tinea capitis ) -

यह रोग प्रायः बच्चों में पाया जाता है । ट्राइकोफाइटोन सल्फ्यूरिय ( Trichopayton sulphureum ) नामक फंगस प्राय : इस रोग के लिए उत्तरदायी होती है । 

रोग को प्रारम्भिक अवस्था में सिर के छोटे से हिस्से पर से बाल उड़ जाते ( Alopecia ) हैं । धीरे - धीरे सिर के कई छोटे - छोटे हिस्सों से बाल उड़ने प्रारम्भ हो जाते हैं । 

अगर रोग का इलाज न किया जाए तो सिर का गंजापन स्थायी हो सकता है अतः बच्चों में सिर के बालों का गिरना अत्यन्त गम्भीरता पूर्वक लिया जाना चाहिए । शीघ्र ही किसी त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेकर इलाज प्रारम्भ कर देना चाहिए । 

■ श्मश्रु द्रु ( Tinea barbac अर्थात Ringworm of beard ) -

यह फंगल रोग प्राय : घोड़ों या गायों से फैलता है । रोग में छोटे - छोटे दाने ( Red inflammatory papules ) उग आते हैं जो दाढ़ी के बालों को चारों ओर से घेरे रहते हैं । दानों से सीरम का स्राव ( Oozing ) भी हो सकता है । 

दाने कभी - कभी आपस में मिलकर बड़े - बड़े चकत्ते बना लेते हैं । जिनके ऊपर सीरम सूखकर पपड़ी ( Crusting ) के रूप में जम जाता है । 

★ दाद का इलाज -

दाद शरीर में चाहे किसी भी स्थान पर हो प्रत्येक स्थान की दाद का इलाज लगभग एक समान रहता है । 

दाद कहीं पर भी हो उसके लिए एक मात्र सफल औषषि ग्रीसियोफुलविन है जो प्राइसोविन , इडीफुल्बिन आदि व्यापारिक नामों से बिकती है । 

इसके प्रति टेब्लेट में 125 मिग्रा - औषधि होती है । साधारणतः इसकी मात्रा है एक - एक टेब्लेट दिन में चार बार खाना खाने के बाद । 

★ सावधानी -

( 1 ) उपरोक्त औषधि का प्रयोग गर्भवती स्त्री के लिए वर्जित है । इस औषधि के सेवन के दिनों में निद्राकर , औषधियों का प्रयोग न करें । 

यदि इस औषधि के प्रयोग के दौरान आंखों से धुंधला दिखाई देने लगे तो दवा का प्रयोग रोक दें । 

( 2 ) नखों की दाद के लिए उपरोक्त टेब्लेटस दोगुनी मात्रा में खाई जाती हैं । 

( 3 ) उपरोक्त दवाओं के साथ दाद की स्थानीय चिकित्सा भी अत्यन्त आवश्यक है ।

स्थानीय चिकित्सा - 

दाद की स्थानीय चिकित्सा के लिए कई प्रकार को दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं । इनमें से व्हिटफील्ड मरहम ( Whitfield ointment ) इस रोग में बहुत उपयोगी पाया गया है और बहुत जमाने से प्रयोग में आ रहा है । 

इसके बनाने की विधि यह है - 

  • ◆ सैलिसिलिक एसिड ( Salicylic acid ) 1 ग्राम,
  • ◆ बेन्जाइफ एसिड ( Benzoic acid ) 4 ग्राम,
  • ◆ बोरिक एसिड ( Boric acid ) 150 मि.ग्रा. ,
  • ◆ वैसलीन ( Vaseline ) 30 ग्राम,

खरल में घोट कर मरहम बना लें । बाज़ार में बना बनाया भी मिलता है । इस मरहम को रुग्ण स्थान को साफ करने के पश्चात कम से कम दिन में दो तीन बार लगाएं । जंघाओं पर व्हिटफील्ड मरहम बहुत थोड़ी मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए । 

अन्य उपयोगी मरहम निम्नलिखित हैं । इनमें से कोई सा एक प्रयोग किया जा सकता है — 

  • ◆ डेटाकार्ट मरहम ( Ointment Datacort ) 
  • ◆ डेकट्रिन मरहम ( Ointment Daktarin ) 
  • ◆ माइकोजेल मरहम ( Ointment Micogel ) 
  • ◆ माइकोसिड मरहम ( Ointment Mycosid ) 

इनमें से कोई सा भी मरहम दिन में दो - तीन बार लगाना चाहिए । 

नोट -

( 1 ) उपरोक्त मरहमों में से व्हिटफील्ड मरहम को छोड़कर अन्य मरहमों का प्रयोग गर्भावस्था में वर्जित है । 

( 2 ) त्वचा के क्षय रोग का संदेह होने पर उपरोक्त मरहमों का प्रयोग न करें । 

( 3 ) मरहमों का प्रयोग तब तक करें जब तक कि दाद पूरी तौर पर सही न हो जाए । 

( 4 ) दाद बहुत धीरे - धीरे ठीक होती है । लगभग 2-3 . माह तक ठीक होने में लग सकते हैं । पर तब तक दवाओं का प्रयोग रहना चाहिए , अन्यथा पुनः दाद हो सकती है । 

दाद पूरी तरह सही होने के बाद भी पन्द्रह दिन तक मरहम का प्रयोग करते रहना चाहिए । 

★ सिर की दाद का इलाज ( Tinea capitis ) -

उस भाग के बाल जहां से गंजापन शुरू हुआ है , काट दिए जाते हैं । तत्पश्चात वहां पर नित्य प्रति सुबह शाम व्हिटफील्ड मरहम का लेपन किया जाता है । सप्ताह में दो बार सिर को साबुन से साफ कर लेते हैं । 

चार सप्ताह पश्चात गंजे ( Bald ) भाग में बाल उगना प्रारम्भ हो जाते हैं । इन बालों को पुनः पूर्ववत काटकर व्हिटफील्ड मरहम का लेपन करते हैं । इस बार चार सप्ताह पश्चात निकलने वाले बाल स्वस्थ होते हैं तथा अब किसी भी इलाज की आवश्यकता नहीं होती है ।


 और भी जानें :-

त्वचा और उसकी संरचना [ SKIN AND IT'S STRUCTURE ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )


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