डर्मिस के रोग ( Diseases of dermis ) ; इसके अलग - अलग प्रकार क्या - क्या है ?

डर्मिस के रोग ( Diseases of dermis )

डर्मिस के रोग ( Diseases of dermis ) ; इसके अलग - अलग प्रकार क्या - क्या है ?


■ क्षोण रेखाएं ( Striae atrophicac ) -

ये रेखाएं प्रायः उन महिलाओं में पाई जाती हैं जो एक - दो या अधिक बच्चों को जन्म दे चुकी होती हैं । उदर( पेट ) तथा स्तन प्रायः इस प्रकार की रेखाओं से प्रभावित होते हैं । कभी - कभी ये रेखाएं जंघाओं पर भी पाई जा सकती हैं । देसी भाषा में इन रेखाओं को ' खोकसे ' कहते हैं । 

क्षीण रेखाएं उन व्यक्तियों में भी पाई जा सकती हैं जिनका वजन यकायक बढ़ जाता है । 

डर्मिस में पाये जाने वाले कोलेजेन रेशों ( Collagen fibres ) के टूट जाने के कारण या व्यपजनन ( Degeneration ) के कारण क्षीण रेखाओं का निर्माण होता है । डर्मिस के नीचे के अंगों के तेजी से विकास के कारण त्वचा भी तेजी से विकास करने लगती है । पर कोलेजेन रेशे उतनी तेजी से विकास न कर पाने के कारण जगह - जगह पर टूट जाते हैं । 

क्षीण रेखाएं एक इंच से लेकर कई इंच लम्बी हो सकती हैं । प्रारंम्भ में ये रेखाएं लालिमा लिए हुए होती हैं पर बाद में सफेद हो जाती हैं । इन रेखाओं के होने से कोई भी नुकसान नहीं होता है । ये रेखाएं उन महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण होती हैं जो अभिनय या नृत्य करती हैं , क्योंकि अनेकों अवसरों पर नृत्य या अभिनय के समय इस प्रकार के वस्त्र पहनने पड़ सकते हैं जिससे ये रेखाए दिखाई देने लगें । 

कुछ महिलाएं अपने शरीर की ओर ज्यादा ध्यान देती हैं । ऐसी महिलाएं भी इन रेखाओं के कारण परेशान हो सकती हैं । इन रेखाओं का कोई भी इलाज नहीं है । हां , इन रेखामों का निर्माण रोका या कम किया जा सकता है ।

गर्भावस्था के दौरान उदर तथा स्तनों पर तेल की मालिश ( Massage ) न केवल मांस पेशियों की टोन ( Tone ) बढ़ाती है , वरन गर्भ समापन के पश्चात होने वाली क्षीण रेखाओं को भी कम कर सकती है । 

क्षीण रेखाएं हमेशा ही अहानिकारक नहीं होती हैं । कुशिंग रोग ( Cushing disease ) में भी क्षीण रेखाएं उत्पन्न हो जाती हैं । इस रोग में शरीर के अन्दर पैदा होने वाले कार्टिकोस्टेराइड ( Corticosteroid ) की मात्रा बढ़ जाती है । 

अतः क्षीण रेखाओं को एकदम सामान्य नहीं मान लेना चाहिए । अगर गर्भावस्था के अतिरिक्त इस प्रकार की रेखाएं शरीर के किसी भी स्थान पर पढ़ें तो किसी कुशल चिकित्सक की राय अवश्य लेनी चाहिए ।

■ प्राथमिक अपुष्टि ( Primary atrophy of dermis ) -

यह रोग प्रायः नवयुवतियों में पाया जाता है । इस रोग में 0.25 इंच से लेकर एक - एक इंच तक के गोल या अण्डाकार चकत्ते शरीर पर पड़ जाते हैं । सामान्यतः ये सफेद रंग के होते हैं तथा कंधों पर , स्तनों पर और कभी - कभी चेहरे पर पाये जाते हैं । 

इस रोग का कोई इलाज नहीं है तथा इससे कोई नुकसान होने का खतरा भी नहीं है । अगर चकत्ते दृष्टव्य ( Visible ) हिस्से पर हैं तो सौंदर्य प्रसाधनों द्वारा उन्हें छुपा सकते हैं । 

■ त्वक काठिन्य ( Scleroderma ) -

त्वक काठिन्य तीन प्रकार के रोगों का एक समूह है । लाइफन स्कलरोसस ( lichen sclerosus ) तीनों प्रकार में सबसे ऊपरी भाग में पाया जाता है । डर्मिस में विद्यमान कोलेजेन रेशे फूल - फूलकर मोटे हो जाते हैं । बाह्यत्वचा ( Epidermis ) की सतर्हे मोटी हो जाती है । तथा रोम कूप और स्वेद प्रन्थियों के कूप बन्द हो जाते हैं । इस रोग में आधे सेंटीमीटर से लेकर कई सेंटीमीटर तक के सफेद धब्बे शरीर पर पड़ जाते हैं ।

रोग प्राय : अधेड़ उम्र की नारियों में पाया जाता है । रोग गर्दन तथा बगल की त्वक को अपना शिकार बना सकता है , पर प्रायः भग ( Vulva ) तथा गुदा ( Anus ) के चारों तरफ की त्वचा ही इस रोग से प्रभावित होती है । 

क्योंकि रोग प्राय: छुपे स्थानों पर होता है अतः सफेद दाग स्वयं में कोई भी समस्या खड़ी नहीं करते , पर दागों पर होने वाली खुजलाहट बहुत परेशान करती है । 

रोग के कारण उत्पन्न खुजलाहट ( Itching ) कोई भी हाइड्रोकार्टिसोन क्रीम ( Hydrocortisone cream ) लगाने से ठीक हो जाती है । बाजार में कई तरह की फ्री में उपलब्ध हैं । बैटनोबेट ( Glaxo ) इसी प्रकार की एक क्रीम है । 

यहां पर यह बताना उचित होगा कि भग तथा भग के चारों ओर सफेद धब्बे पढ़ने के कई कारण हो सकते हैं । ल्यूकोप्लेकिया ( Leucoplakia ) भी सफेद धब्बों का एक कारण है । 

ल्यूकोप्लेकिया के धब्बों पर कैंसर बनने की अत्यन्त प्रबल संभावनाएं रहती हैं , अतः भग के सफेद धब्बों को छुपाना नहीं चाहिए और न ही धब्बों को त्वक काठिन्य मानकर हाइड्रोकार्टिसोन क्रीम लगानी चाहिए । ऐसे धब्बों के लिये कुशल चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिये ।


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