त्वकशोथ तथा एक्जीमा ( Dermatitis and Eczema ) क्या है ? इसके अलग - अलग प्रकार कौन - कौन से हैं ?

त्वकशोथ तथा एक्जीमा ( Dermatitis and Eczema )

त्वकशोथ तथा एक्जीमा ( Dermatitis and Eczema ) क्या है ? इसके अलग - अलग प्रकार कौन - कौन से हैं ?

भारतवर्ष में त्वकशोथ व एक्जीमा बहुत प्रचलित रोग है । प्रायः सभी रोगों में से 2-3 प्रतिशत रोग त्वकशोथ व एक्जीमा ही होते हैं । 

त्वकशोथ व एक्जीमा चाहे किसी भी प्रकार का हो तथा उनका कारण कोई भी हो- तीन - चार लक्षण अवश्य पाये जाते हैं , लालिमा , सूजन , पर्पटीकरण ( Scaling ) , जलस्फोटन ( Vesiculation ) तथा स्रवणीकरण ( Oozing ) । इसके साथ - साथ इस रोग में तीव्र जलन ( Itching ) होती है जिसके कारण कभी - कभी सोना भी मुश्किल हो जाता है । 

■ प्रकाश त्वकशोथ ( Photodermatitis ) -

प्रकाश त्वकशोथ प्रायः उन्हीं अंगों में पाया जाता है जो खुले रहते हैं जैसे चेहरा , गर्दन , सीने का ऊपरी हिस्सा , हाथ तथा पैरों पर धूप में निकलने पर इन हिस्सों में जलन होने लगती है तथा जलस्फोटन ( Vesi culation ) होने लगता है । 

प्रकाश त्वकशोथ कई कारणों से हो सकता है जैसे सल्फा इत्यादि दवाएं खाने से , खाद्य पदार्थ जैसे मछली इत्यादि खाने से ; तथा कुछ विशेष प्रकार की क्रीम इत्यादि लगाने से जिनमें विभिन्न प्रकार के रंजक पदार्थ ( Dyes ) पड़े हुये हों । 

एक बार प्रकाश त्वकशोथ होने के पश्चात एक - दो सप्ताह में स्वतः ही ठीक हो जाता है । ठीक होने पर त्वचा में घब्बे पड़ जाते हैं । कुछेक महीनों में ये धब्बे भी खत्म हो जाते हैं । 

प्रकाश त्वकशोथ का हमेशा कोई न कोई कारण होता है । अतः एक बार शोथ होने पर कारण को ढूंढना अत्यन्त आवश्यक है , अन्यथा त्वकशोय चार - बार होता रहेगा । कारण ज्ञात होने पर इसका निवारण किया जा सकता है । 

■ सम्पर्क त्वकशोथ ( Contact dermatitis ) -

सम्पर्क त्वकशोथ रोग उद्योगीकरण के साथ - साथ बढ़ता ही जा रहा है । जैसा कि इसके नाम से ही ज्ञात होता है , सम्पर्क त्वकशोथ किसी भी रासायनिक या अन्य पदार्थ के त्वचा के सम्पर्क में आने के कारण होता है । 

जब भी ऐसा पदार्थ त्वचा के सम्पर्क में आता है , कुछ ही समय पश्चात रोग उत्पन्न हो जाता है । पदार्थ त्वचा के बहुत कम क्षेत्रफल के सम्पर्क में आया हो सकता है , पर इसके विपरीत त्वकशोथ अत्यधिक क्षेत्रफल में फैला होता है । 

सम्पर्क के स्थान पर फुंसियां ( Eruptions ) पैदा हो जाती हैं । सूजन आ जाती है । बड़े - बड़े छाले पड़ जाते हैं । 

सम्पर्क त्वकशोथ कई प्रकार के पदार्थों के कारण हो सकता है : - 

1. सौन्दर्य प्रसाधन -

सौन्दर्य प्रसाधनों के कारण होने वाला सम्पर्क त्वकशोथ भारतवर्ष में बढ़ता ही जा रहा है । खासतौर से शहरी क्षेत्रों में यह रोग बहुत पाया जाता है । 

त्वकशोथ किसी भी प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधन के कारण हो सकता है ; होठों की लाली , फेस पाउडर , क्रीम , हेयर डाइज ( Hair dyes ) ; तथा विभिन्न प्रकार के सुगंधित तेलों से । 

विशेष प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों से उत्पन्न शोथ त्वचा विशेष तक ही सीमित रहता है जहां पर सौन्दर्य प्रसाधन का उपयोग किया गया है । 

लिपस्टिक के प्रयोग से हुये त्वकशोथ के कारण होंठ सूज जाते हैं । निचला होंठ ऊपरी होंठ की अपेक्षा अधिक सूज जाता है । होठों के सूजने के साथ - साथ उन पर पपड़ियां ( Crusting ) जम जाती हैं । जिनके अन्दर से स्राव प्रारम्भ हो जाता है । 

यह दशा अत्यन्त दर्दनाक होती है । रोगी को मुंह खोलने तथा बन्द करने में भी कठिनाई होने लगती है । खाना खाना भी असंभव सा प्रतीत होने लगता है ।

लिपस्टिक त्वकशोथ एक विशेष प्रकार के रंजक पदार्थ ( Dye ) के कारण होती है जो लिपस्टिक में पड़ा रहता है । यह लाल रंग का रंजक पदार्थ इओसीन ( Eosine dye ) के नाम से जाना जाता है । 

यद्यपि अधिकांश लिपस्टिक निर्माता इसी रंजक का प्रयोग करते हैं लेकिन कुछ प्रतिष्ठित कम्पनियां इससे भी अधिक सुरक्षित नव - आविष्कृत रंजक प्रयोग करती हैं । 

अतः एक प्रकार की लिपस्टिक से शोथ होने पर उस लिपस्टिक का प्रयोग एकदम बन्द कर देना चाहिए तथा उसके स्थान पर दूसरे ब्रांड की लिपस्टिक का प्रयोग प्रारम्भ कर देना चाहिए । वैसे , बेहतर तो यही है कि लिपस्टिक का प्रयोग ही न किया जाए । 

होठों पर बर्फ को रखने से सूजन कम हो जाती है । बर्फ का इस्तेमाल धीरे - धीरे बर्फ को चूसने के रूप में किया जा सकता है । साथ ही साथ किसी एन्टी - हिस्टामिनिक औषधि का प्रयोग भी लाभकारी सिद्ध होता है । एविल ( Avil ) इसी वर्ग की एक लाभकारी औषधि है । 

लिपस्टिक का प्रयोग रोकते ही त्वकशोथ शीघ्रता से गायब होने लगता है तथा कुछेक दिनों में ही रोगी पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है । 

नेल पालिश ( Nail polish ) के कारण हुआ त्वकशोथ अंगुलियों पर , गर्दन के कुछ हिस्सों पर , गालों पर तथा शरीर के कुछ अन्य भागों पर पाया जा सकता है । ऐसा नेल पालिश के इन भागों के सम्पर्क में आने के कारण होता है । 

कभी - कभी नेल पालिश के कारण हुआ त्वकशोथ प्रेमी के बदन पर भी पाया जाता है । स्पष्ट ही है कि ऐसा प्रेमिका या पत्नी की नेल पालिश के प्रेमी या पत्नी के बदन में लगने के कारण होता है । आवश्यक नहीं है कि प्रेमिका या पत्नी भी त्वकशोथ की बीमारी से पीड़ित हो । 

पूरी संभावनाएं हैं कि पुरुष तो नेल पालिश के कारण उत्पन्न हुए त्वकशोथ का शिकार हो जबकि नारी स्वस्थ बदन विचरण कर रही हो । 

जैसा कि प्रायः त्वकशोथ में होता है , सूजन आ जाती है । जलन होने लगती है । कभी - कभी यह जलन अत्यन्त तीव्र होती है । पपड़ियां जम सकती हैं तथा स्राव ( Oozing ) भी हो सकती है । 

पर प्रायः नेल पालिश त्वकशोथ अधिक भयंकर नहीं होता है । हल्की सी सूजन हो इस रोग का रूप होती है । अगर नेल पालिश त्वकशोथ की संभावनाएं हों तो नेल पालिश ही बदल देनी चाहिए । 

कभी - कभी त्वकशोथ नेल पालिश के कारण नहीं , वरन नेल पालिश में प्रयुक्त स्प्रिट के कारण होता है जो कि नारियां प्रायः ने पालिश के सूख जाने पर डाल लेती हैं । 

ऐसी संभावनाएं होने पर स्प्रिट का प्रयोग रोक देना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है । केश तेल ( Hair oil ) तथा बालों को काला रंगने वाले विभिन्न प्रकार के खिजाब तथा अन्य पदार्थ ( Hair dyes ) भी त्वकशोथ पैदा करने में पीछे नहीं रहते हैं । इन पदार्थों के कारण पैदा हुआ त्वकशोथ कभी - कभी अत्यन्त गम्भीर भी हो सकता है ।

प्रायः चेहरे की त्वचा ही इस रोग का शिकार होती है । विभिन्न प्रकार के सस्ते शैम्पू भी त्वकशोथ का कारण हो सकते हैं । चेहरे पर तथा आंखों के चारों ओर लालिमा छा जाती है । हल्की - सी सूजन पूरे चेहरे को अपना शिकार बना लेती हैं । अधिक गम्भीर रोग होने पर त्वचा पर पपड़ी ( Crusting ) भी जम सकती है । 

चेहरे पर होने वाला त्वकशोथ , केशों में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों तथा चेहरे पर प्रयुक्त होने वाले सौन्दर्य प्रसाधनों , दोनों प्रकार के पदार्थों से हो सकता है । अतः यह पता लगाना आवश्यक हो जाता है कि वास्तव में किस पदार्थ के कारण त्वकशोथ हुआ है । जिस पदार्थ से त्वकशोय हुआ हो , उसका प्रयोग एक दम छोड़ देना चाहिए । 

साथ ही साथ कुछ एन्टीहिस्टामिनिक ( Antihistaminic ) दवाएं जैसे एविल ( Avil ) तथा पिरिटोन ( Piritone ) आदि लेने से रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है । 

सिन्दूर भी त्वकशोथ कर सकता है । यह तथ्य हमेशा ध्यान में रखना चाहिए । अगर शक हो कि त्वकशोथ सिन्दूर के कारण है , तो सिन्दूर का प्रयोग भी रोकना पड़ सकता है ।

2. वस्त्र इत्यादि -

वस्त्र तथा शरीर के सम्पर्क में आने वाले अन्य पदार्थ ; सभी त्वकशोथ के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं । घड़ियों की पट्टी ( Watch straps ) , चप्पलें , कृत्रिम आभूषण तथा वस्त्र इस प्रकार के त्वकशोथ के लिए उत्तरदायी होते हैं । 

शरीर के विशेष भाग पर पाए जाने वाले शोथ से कारण का पता लगाया जा सकता है । जैसे , कलाई पर होने वाला त्वक शोथ घड़ी की पट्टी के कारण होता है । वक्षस्थल तथा ग्रीवा के चारों ओर होने वाला त्वकशोथ, कृत्रिम हार ( Artificial necklace ) के कारण होता है । 

रबर त्वकशोथ ( Rubber contact dermatitis ) विभिन्न प्रकार के जूते व चप्पलों के प्रयोग के पश्चात देखा गया है । शोथ प्राकृतिक रबर या चमड़े के कारण नहीं होता है वरन जूते व चप्पलों के निर्माण में प्रयुक्त कुछ अन्य पदार्थों जैसे रेजिन इत्यादि के कारण होता है । 

तलवों की अपेक्षा पैर का ऊपरी भाग ( Dorsum of sole ) रबर त्वकशोथ के कारण मुख्यतः प्रभावित होता है । पैर सूज जाता है तथा तीव्र खुजलाहट व जलन होने लगती है । यह शोथ प्रायः नये जूते व चप्पलों के प्रयोग के साथ ही प्रारम्भ होता है । 

अतः इन जूतों व चप्पलों का प्रयोग एकदम छोड़ देना चाहिए । शोथ एक - दो दिनों में स्वयं ही ठीक हो जाता है । प्रायः किसी औषधि की आवश्यकता नहीं पड़ती है । 

विभिन्न प्रकार के कृत्रिम धागों से बुने हुए वस्त्रों ( Nylon and textile dermatitis ) के कारण हुआ स्वकशोय शहरीकरण के साथ बढ़ता जा रहा है । 

इस प्रकार का त्वकशोथ जाड़ों की अपेक्षा गर्मियों में अधिक परेशान करता है । जैसा कि किसी भी अन्य प्रकार के त्वकशोय में किया जाता है , सम्भावित वस्त्रों का उपयोग तुरन्त बन्द कर देना चाहिए । प्रायः शोथ स्वतः ही ठीक हो जाता है । 

3. वृक्ष तथा इनसे निर्मित वस्तुएं -

वृक्ष तथा इनसे निर्मित वस्तुओं से हुआ त्वकशोथ भारतवर्ष में बहुधा पाया जाता है । सामान्यतः आम , सन्तरा , नींबू , प्याज आदि इसके उदाहरण हैं । इस प्रकार के त्वकशोथ का निदान बहुत सरल होता है । क्योंकि पदार्थ विशेष के सम्पर्क में आते ही त्वचा पर तीव्र जलन प्रारम्भ हो जाती है । 

इस प्रकार के त्वकशोथ का एक ही इलाज है— पदार्थ का पूर्ण त्याग, इसके लिए किसी भी दवा की आवश्यकता नहीं होती है । 

4. दवाएं -

लगभग प्रत्येक प्रकार की औषधि त्वकशोथ के लिए उत्तरदायी हो सकती हैं । सामान्यत: सल्फोनामाइड्स , पेनिसिलीन्स , स्ट्रेप्टोमायसिन तथा सेवलॉन आदि त्वकशोध करने में अग्रणी पार्ट अदा करते हैं । 

सेवलॉनस्प्रिट डाक्टरों व नर्सों में त्वकशोध का प्रमुख कारण होते हैं । प्रायः हाथ का पार्श्व भाग ( Dorsal part ) इस प्रकार के त्वकशोथ से प्रभावित होता है । अगर ये पदार्थ रोगियों में त्वकशोध करते हैं , तो शरीर का वही भाग प्रभावित होता है जिस पर औषधि का प्रयोग किया गया हो । 

इतना ही नहीं , त्वकशोथ के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली एन्टीहिस्टामिनिक दवाएं भी कभी - कभी त्वकशोथ कर सकती हैं । जैसा कि किसी भी अन्य प्रकार के त्वकशोध में होता है , प्रभावित हिस्से पर लालिमा ( Redness ) छा जाती है । 

तीव्र जलन ( Severe burning ) रोगी को बेचैन कर देती है । इस प्रकार के त्वकशोथ का भी वही इलाज है जो किसी अन्य प्रकार के त्वकशोथ का होता है । 

■ एक्जीमा ( Eczema ) -

एक्जीमा एक प्रकार का त्वकशोथ ही है , पर त्वकशोथ के विपरीत एक्जीमा का कारण अज्ञात रहता है । एक्जीमा का सर्वप्रथम लक्षण लालिमा ( Erythema ) का छा जाना है । 

यह लालिमा त्वचा ( Dermis ) में स्थित रक्त वाहिनियों के फैल जाने के कारण होती है । लालिमा तब तक रहती है जब तक कि एक्जीमा पूर्ण रूपेण ठीक न हो जाये । 

लालिमा के पश्चात बाह्य त्वचा में लिम्फोसाइट्स ( Lymphocytes ) जमा होना प्रारम्भ हो जाती हैं । [ लिम्फोसाइट्स एक विशेष प्रकार की श्वेत रक्त कणिकाएं होती हैं जिनका कार्य शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है ] 

तत्पश्चात बाह्य त्वचा ( Epidermis ) की कोशिकाओं के मध्य द्रव ( Liquid ) एकत्र होने लगता है । यह द्रव एक पुटिका ( Vesicle ) का रूप ले लेता है । कुछ समय पश्चात पुटिका फट जाती है जिससे द्रव निकलकर सतह पर फैलकर पपड़ी ( Crust ) की भांति जम जाता है । 

इन सब क्रियाओं के कारण बाह्य त्वचा की सामान्य कार्यक्षमता का ह्रास हो जाता है । जिसके फलस्वरूप स्वस्थ शृंग कोशिकाओं ( Horn cells ) की उत्पत्ति रुक जाती है तथा त्वचा पर्पटीकृत ( Scaly ) हो जाती है । कोशिकाओं की विभाजन क्षमता बढ़ जाती है जिससे बाह्य त्वचा अत्यन्त मोटी हो जाती है । 

एक्जीमा का मुख्य लक्षण पुटिका ( Vesicle ) का निर्माण है तथा एक्जीमा के रोगी की मूख्य शिकायत खुजली ( Itching ) है । 

एक्जीमा मुख्यतः पांच प्रकार का होता है -

1. एटोपिक एक्जीमा ( Atopic eczema ) -

एटोपी उस अवस्था का नाम है जब शरीर में E इम्युनोग्लोब्युलिन ( Immunoglobulin E ) की मात्रा बढ़ जाती है । ऐसे व्यक्ति बहुत शीघ्र ही दमा , एक्जीमा तथा शीतपित्त ( Urticaria ) के शिकार बन जाते हैं । 

वास्तव में इस प्रकार के एक्जीमा का कोई भी कारण ज्ञात नहीं है । इस प्रकार का एक्जीमा जितना गम्भीर होगा , दमे का रोग होने की सम्भावना उतनी ही अधिक बढ़ जाती है । 

बहुत गम्भीर एक्जीमा के 50 प्रतिशत रोगियों में दमे का रोग भी पाया जाता है । 

एटोपिक एक्जीमा को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है ।

( अ ) इन्फेन्टाइल एक्जीमा -

इस प्रकार का एक्जीमा जन्म के पश्चात तीसरे माह में प्रारम्भ होता है । इसकी शुरुआत गालों से होती है पर धीरे - धीरे यह माथे तथा ठोड़ी पर भी फैल जाता है । इस एक्जीमा की विशेषता यह है कि आंख , नाक . तथा मुंह के चारों ओर की त्वचा इसका शिकार नहीं बन पाती है ।

एक्जीमा चेहरे तक ही सीमित रह सकता है , पर कभी - कभी शरीर पर भी फैल जाता है । त्वचा लाल पड़ जाती है । उसमें छोटी - छोटी दरारें ( Cracks ) पड़ जाती हैं जिनसे सीरम ( Serum ) निकल निकलकर बहता रहता है । 

त्वचा सूज जाती है तथा जलस्फोटिकाएं ( Vesicles ) प्रकट हो जाती हैं । तीव्र जलन के कारण बच्चा रोता रहता है । जब सीरम सूखता है तो त्वचा पर पपड़ियां जम जाती हैं । 

( ब ) फ्लेक्सुरल एक्जीमा ( Flexural Eczema ) -

यह एक्जीमा बच्चों में 4 - 5 वर्ष की आयु के पश्चात पाया जाता है । कभी - कभी इन्फेन्टाइल एक्जीमा ही इस एक्जीमा में परिवर्तित हो जाता है । 

जानुपृष्ठीय व प्रकोष्ठीय गर्त ( Popliteal and cubital fossa ) में ही यह रोग उत्पन्न होता है तथा अधिकतर इन्हीं स्थानों पर सीमित रहता देखा जाता है । 

सर्वप्रथम लालिमा ( Erythema ) छा जाती है । उसके पश्चात जल स्फोटिकाएं ( Vesicles ) उत्पन्न हो जाती हैं जिनसे निकलकर सीरम चारों ओर फैलने लगता है । सीरम सूखने पर पपड़ी के रूप में जम जाता है । ( Crust formation )

इसके साथ ही साथ बाह्य त्वचा अधिक मोटी ( Lichnification ) हो जाती है । तीव्र खुजली व जलन के कारण , रोगी खुजलाता रहता है । इससे रक्त स्राव ( Bleeding ) प्रारम्भ हो जाता है । 

इतना ही नहीं द्वितीयक संक्रमण ( Secondary infection ) भी हो सकता है और रोग अधिक गम्भीर हो जाता है । कुछ मामलों में रोगी दमा का ( Asthma ) शिकार भी हो जाता है ।

 ज्यादातर रोगी 14-15 वर्ष की आयु तक स्वतः ही ठीक हो जाते हैं । पर कुछ रोगियों में रोग ठीक नहीं होता है तथा 14-15 वर्ष की आयु के पश्चात भी बना रहता है । 

( स ) एडल्ट एटोपिक एक्जीमा ( Adult atopic eczema ) -

जब फ्लेक्सुरल एक्जीमा 14-15 वर्ष की आयु तक स्वतः ही ठीक नहीं होता तो यह एक्जीमा फ्लेक्सुरल एक्जीमा का ही रूप हो सकता है ।

पर अधिकतर रोगियों में यह रोग वयस्क अवस्था में प्रथम बार उत्पन्न होता है । बंक भाग ( Flexures ) ही इस प्रकार के रोग की पसन्द होते हैं । पर चेहरा , गर्दन व सीना इत्यादि शरीर का कोई भी हिस्सा इस रोग का शिकार हो सकता है । 

इस प्रकार के एक्जीमा में भी वही सब बातें पाई जाती हैं जो पीछे बताए गए अन्य दो प्रकार के एक्जीमा में पाई जाती हैं । इस रोग के रोगी की वह त्वचा जहां पर रोग नहीं होता है , प्रायः शुष्क होती है । जबकि रोग वाली त्वचा पीलापन लिए हुए ( Pale ) होती है । 

अगर त्वचा को किसी सख्त वस्तु से रगड़ा जाए तो हल्की - पीली रेखा ही बनती है जबकि सामान्य स्वस्थ पुरुष में रक्तिम रेखा का निर्माण होता है । 

रोग की गम्भीर अवस्था में रोगी को पसीना भी बहुत कम आता है । ऐसा स्वेद ग्रंथि नलिकाओं के बन्द होने के कारण होता है । 

2. नाणकाभ एक्जीमा ( Nummular Eczema ) -

इस प्रकार के एक्जीमा के तीन मुख्य गुण होते हैं : 

( a ) सिक्के की भांति अण्डाकार चकत्ते ( Patches ) । 

( b ) इधर - उधर बिखरी जलस्फोटिकाओं ( Vesicles ) के मिलने से बड़े - बड़े प्लेक्स ( Plaques ) । 

( c ) इधर - उधर बिखरी हुई जलस्फोटिकाएं । 

अन्तर्जधिका ( Shin ) , पिण्डली ( Calf ) तथा उंगलियां प्रायः इस रोग के कारण प्रभावित होती हैं । पर कभी - कभी जंघाएं , वक्षस्थल आदि भी इस रोग को आश्रय दे देते हैं । 

जलस्फोटिकाओं से सीरम निकल - निकलकर शरीर पर इधर - उधर फैलता रहता है जो जमकर पपड़ी ( Crusts ) के रूप में बदल जाया करता है । इस प्रकार के एक्जीमा में प्रायः जलन व खुजली नहीं पाई जाती है । 

यह रोग प्रायः 40-50 वर्ष की आयु में होता है । परन्तु नारियों में यह रोग अपेक्षाकृत कम उम्र में ही हो जाता है ।

3. पॉम्फोलिक्स ( Pompholyx ) -

यह एक्जीमा अंगुलियों , हथेलियों व तलवों पर पाया जाता है क्योंकि यहां पर बाह्य त्वचा बहुत मोटी होती है अतः जल स्फोटिकाएं फट नहीं सकतीं और महीनों तक ऐसी ही बनी रहती हैं । 

अगर इन स्फोटिकाओं को छेड़ा न जाए , तो ये सूख कर स्वतः ही गिर जाती हैं । जलन तथा खुजली बहुत तीव्र होती है । जलस्फोटिकाओं की बाहरी भित्ति कभी - कभी खुजलाने से टूट जाती है । ऐसा होने पर जलन तथा खुजली खत्म हो जाती है । 

पर द्वितीयक संक्रमण होने पर यह एक गम्भीर अवस्था में परिवर्तित हो सकता है । यह एक्जीमा प्राय : 20-30 वर्ष की आयु में होता है , पर कभी - कभी बच्चों में भी देखा गया है । 

प्रारूपिक अवस्था में एक्जीमा एकदम प्रारम्भ हो जाता है तथा प्राय : हाथों तथा पैरों को समान रूप से प्रभावित करता है । 2-6 सप्ताह के पश्चात एक्जीमा स्वतः ही ठीक होने लगता है । 

4. सिबोरिक एक्ज़िमा ( Seborrhoeic eczema ) -

यह एक्जीमा प्रायः सिर से प्रारम्भ होता है । पूरे सिर की त्वचा लाल पड़ जाती है । अत्यधिक सीरम का स्राव तथा पपड़ियों का बनना इस प्रकार के एक्जीमा की विशेषता है । 

सिर से प्रारम्भ होकर यह एक्जीमा गर्दन तथा शरीर के अन्य भागों पर भी फैल सकता है । 

5. वैरीकोज एक्जीमा ( Varicose eczema ) -

यह एक्जीमा हमेशा वैरीकोज नसों ( Varicose Veins ) के साथ पाया जाता है । प्रौढ़ महिलाएं व बुद्ध पुरुष इस रोग के शिकार बनते हैं । 

पैरों के निचले भाग की त्वचा प्रायः इस रोग से प्रभावित होती है । जलन व खुजली इस प्रकार के एक्जीमा के मुख्य लक्षण होते हैं ।

■ एक्जीमा का उपचार -

सर्वाधिक प्रभावी स्थानीय इलाज के लिए कॉर्टिटराइड्स ( Corticosteroids ) प्रयोग में लाए जाते हैं । कॉर्टिकोस्टेराइड क्रीम तथा मरहम किसी भी रूप में प्रयोग किए जा सकते हैं । 

एक्जीमा के उन रोगियों में जिनमें द्वितीयक संक्रमण की आशंका हो , कॉर्टिकोस्टेराइड को एन्टीबॉयटिक क्रीम के साथ मिलाया जा सकता है । 

हाइड्रोकॉटिसॉन सबसे न्यून क्षमता का कॉर्टिकोस्टेराइड है जो 1 % की ( Strength ) में प्राप्य है । 

वीटामेथासोन तथा फ्लूओसिनोलोन अधिक क्षमता के कॉटिकोस्टेराइड हैं । कोई भी कॉर्टिकोस्टेराइड एक्जीमा के इलाज के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है । परन्तु चेहरे पर कभी भी 1 % से अधिक शक्ति की हाड्रोकॉटिसान क्रीम का इस्तेमाल नहीं किया जाता है । 

अगर एक्जीमा द्वारा प्रभावी त्वचा से सीरम अधिक निकल रहा है । तो लोशन का इस्तेमाल करना चाहिए । पपड़ियां ( Crusts ) जम जाने पर मरहम का उपयोग अच्छा रहता है । जबकि पपड़ियों तथा स्राव दोनों की मिश्रित अवस्था में क्रीम का प्रयोग उचित माना गया है । 

पपड़ी जम जाने की अवस्था में मरहम लगाने के पश्चात त्वचा को पॉलीथीन शीट से ढंककर दवा का अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है । 

पॉलीथीन शीट के किनारे स्वस्थ त्वचा पर चिपकाए जा सकते हैं । इस प्रकार स्वेद वाष्पित नहीं हो पाता है तथा बाह्य त्वचा की कोशिकाओं का मसूणीकरण करके मरहम को बाह्य त्वचा के नीचे तक पहुंचाने में मदद करता है । 

कभी - कभी कॉर्टिकोस्टेराइड क्रीम तथा लोशन इत्यादि एक्जीमा में फायदा नहीं पहुंचाते । ऐसी अवस्था में अन्य तरीकों का इस्तेमाल लाभप्रद हो सकता है । उस अवस्था में जब अत्यधिक सीरम का स्राव हो रहा हो , 7-8 तहें की हुई कपड़े की पट्टी को नीचे लिखे किसी औषधीय सोल्यूशन में भिगोकर प्रभावित त्वचा पर रखने से काफी फायदा होता है । 

● लैड लोशन ( Lead lotion ) 2 %

अथवा , 

● एल्यूमिनियम एसीटेट लोशन 5 % 

अथवा , 

● सिल्वर नाइट्रेट लोशन 0.5 % 

अथवा ,

● पोटेशियम परमैगनेट लोशन 0.1 % 

यह पट्टी दिन में दो - तीन बार अवश्य बदलनी चाहिए । पपड़ी जमा ( Crusted ) होने की अवस्था में खाली जिंक क्रीम का इस्तेमाल ही लाभदायक होता है । 

जिंक क्रीम को निम्नलिखित विधि के अनुसार बनाया जा सकता है :

● जिंक ऑक्साइड - 32%

● ओलिइक एसिड ( Oleic acid ) - 0.5%

● मूंगफली का तेल - 32%

● चूने का पानी ( Lime water ) - 100%

अगर बाह्य त्वचा काफी मोटी हो गई हो तो क्रीम या पेस्ट में कोलटार की मिलावट अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती है । 

कोलटार पेस्ट को निम्नलिखित विधि के अनुसार बनाया जा सकता है : 

● कोलटार सोल्यूशन - 4%

● जिंक ऑक्साइड - 4%

● बोरिक एसिड - 4%

● स्टार्च - 4%

● वैसलीन - 100%

नोट - त्वचा रोगों में कोलटार का प्रयोग बहुत किया जाता है । स्मरण रखना चाहिए कि यह कोलटार वह नहीं है जो सड़कों पर बिछाया जाता है । 

चिकित्सा में काम आने वाला कोलटार पत्थर के कोयले से डिस्टिलेशन विधि से प्राप्त किया जाता है । यह काले रंग का द्रव होता है जो बहुत जमाने से डिसइन्फेकटेन्ट और एन्टीसेप्टिक के तौर पर इस्पतालों में भी प्रयोग होता आ रहा है । 

इस कोलटार का घुलनशील अंश अल्कोहल में घोलकर जो सोल्यूशन व्यापारिक रूप में बेचा जाता है उसे लिकर कार्बोन डेटरजेन्स ( Liquor Carbonis Detergens ) संक्षेप में L.C.D. कहते हैं । 

इसी का एक अन्य नाम लिकर पिसिस कार्बोनिस ( Liquor Piscis Carbonis ) भी है । स्थानीय इलाज के साथ - साथ द्वितीयक संक्रमण को रोकने के लिए एन्टीबॉयटिक्स का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है ।


 और भी जानें :-

त्वचा और उसकी संरचना [ SKIN AND IT'S STRUCTURE ] आखिर क्या है ? ( संक्षेप्त में )


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