लीन अथवा मृत भ्रूणपात ( Missed abortion ) क्या होता है ? : What is a Missed Abortion?

लीन अथवा मृत भ्रूणपात ( Missed abortion ) क्या होता है ? : What is a Missed Abortion? 


वह महिला तीसरी बार गर्भवती हुई थी । हालांकि उसे गर्भधारण किये पांच माह से अधिक हो गये थे परंतु उसका गर्भस्थ शिशु कुछ भी हलचल नहीं कर रहा था तथा उसके पेट का उभार भी बढ़ना रुक गया था । जी मितलाना अथवा उल्टियां आना ( Vomiting ) , इत्यादि गर्भावस्था के लक्षण भी बंद हो गये थे और अब सब कुछ बिलकुल सामान्य लगने लगा था । 

बातों के दौरान उसने यह भी बताया कि वह दो वर्ष के अपने छोटे बच्चे को स्तनपान ( Breast feeding ) कराती है । महिला की बाहरी शारीरिक जांच में कुछ भी गड़बड़ी नजर नहीं आयी किंतु गर्भाशय ( Uterus ) की आंतरिक जांच से पता लगा कि उसके गर्भाशय का उभार केवल दो माह के गर्भ जितना है । 

उंगलियों से गर्भाशय की जांच करने पर उंगलियों पर रक्त जैसे द्रव के निशान लग गये । इन जांचों से यह निष्कर्ष निकला कि वह महिला गर्भवती तो हुई थी परंतु किन्हीं कारणों से उसका गर्भ खराब हो चुका था । महिला के रक्त एवं पेशाब में कुछ खराबी नहीं थी किंतु मूत्र - गर्भपरीक्षण ( Urine pregnancy test ) द्वारा यह पता लग गया था कि गर्भस्थ शिशु ठीक नहीं है । 

ऐसे विकृत गर्भ को सामान्य नहीं समझा जाता । इस तरह जब मृत शिशु गर्भाशय में ही रुक जाता है तो उसे लीन अथवा मृत भ्रूणपात ( Missed abortion ) कहते हैं । उस महिला के गर्भ को दवाओं एवं ऑप्रेशन की सहायता से बाहर निकाल दिया गया । 

लक्षण ( Symptoms ) -

ऐसे गर्भपात की स्थिति बड़ी पेचीदा ( Complicated ) होती है क्योंकि महिला को यह विश्वास नहीं हो पाता कि उसका गर्भस्थ शिशु विकृत हो गया है या नहीं । इसलिए गर्भपात के बाद भी यह समस्या उस समय तक टलती रहती है , जब तक गर्भधारण ( Conception ) के लक्षण समाप्त नहीं हो जाते । 

गर्भवती महिला का जी मितलाना , सुबह के समय उल्टियां आना , स्तनों में भारीपन तथा रात में बार - बार पेशाब की इच्छा होना गर्भधारण के प्रारंभिक लक्षण हैं । लीन गर्भपात की स्थिति में ये सभी लक्षण समाप्त होते जाते हैं और गर्भस्थ शिशु मर कर गर्भाशय में रुक जाता है । 

उसकी तमाम हलचलें ( Movements ) रुक जाती हैं और गर्भ के न बढ़ने से पेट का उभार भी नहीं बढ़ता । धीरे - धीरे गर्भाशय ( Uterus ) का आकार भी छोटा होता जाता है और योनिमार्ग ( Vagina ) से कभी - कभी रक्तमिश्रित गंदा द्रव निकलता है । 

कारण ( Causes ) -

उपरोक्त लक्षणों में किसी एक लक्षण का संदेह होते ही चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है क्योंकि गर्भाशय में मृत शिशु के रुके रहने से महिला की जान को भी खतरा हो सकता है । 

लीन गर्भपात की स्थिति तब पैदा होती है जब गर्भाशय में स्थापित संसेचित डिम्ब ( Fertilized oyum ) को किन्हीं कारणों से रक्त नहीं मिल पाता और उसका पोषण रुकने लगता है । जब शिशु को आहार ही नहीं मिलता तो उसकी मृत्यु हो जाती है परंतु गर्भाशय से उसका निष्कासन नहीं हो पाता । 

जो रक्त गर्भस्थ शिशु के चारों और इकट्ठा होता जाता है , वह एक बड़े रक्त - मोल ( Blood mole ) का आकार ग्रहण कर लेता है । कुछ दिनों बाद यह रक्त - मोल कड़ा हो जाता है , जिसे कारनियस मोल ( Carneous mole ) कहते हैं । 

धीरे - धीरे इसमें कैल्सियम जमा होता जाता है और यह पत्थर की तरह कड़ा हो जाता है । फिर रक्त न मिलने के कारण शिशु भी पत्थर की तरह कड़ा हो जाता है , जिसे लियोपेडियन ( Lithopaedion ) कहते हैं ।

इन सबका परिणाम यह होता है कि गर्भस्थ शिशु खराब हो जाता है और उसकी प्रगति रुक जाती है । महिला के स्तन नरम हो जाते हैं तथा गर्भ के प्रारंभिक चिह्न समाप्त होते जाते हैं । यही लीन गर्भपात की अवस्था है जिसमें न केवल महिला बहुत कमजोर हो जाती है बल्कि उसकी जान जोखिम में पड़ जाती है । 

उपचार ( Treatment ) -

लीन अथवा मृत भ्रूणपात की स्थिति में सबसे बड़ी परेशानी यह है कि महिला को चिकित्सक की बात का विश्वास नहीं हो पाता कि उसका गर्भस्थ शिशु मर चुका है । 

यह एक मनोवैज्ञानिक कारण है क्योंकि गर्भवती महिला गर्भधारण काल ( Conception period ) से ही आने वाले शिशु के बारे में तरह - तरह के स्वप्न बुनती रहती है । ऐसी स्थिति में जब उसे पता लगता है कि उसका गर्भस्थ शिशु मर चुका है तो वह एकदम मानसिक रूप से टूट जाती है । 

कुछ महिलाएं दूसरे चिकित्सक की तलाश करती हैं कि शायद वह उनके गर्भस्थ शिशु को सामान्य कर देगा । यह बिलकुल गलत धारणा है । जब लगे कि आपका गर्भ ठीक से नहीं बढ़ रहा तो तुरंत चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए । हो सकता है कि आपके गर्भस्थ शिशु का विकास किन्हीं कारणोंवश रुक गया हो । 

इसके लिए मूत्र - गर्भ परीक्षण ( Urine pregnancy test ) , एक्सरे तथा अल्ट्रा सोनोग्राफी ( Ultra Sonography ) द्वारा जांच करके पता लगाया जा सकता है कि गर्भस्थ शिशु का विकास अथवा उसकी हलचलें बंद क्यों हो गयी हैं ।

यदि शिशु जीवित है तो चिकित्सक को चाहिए कि वह उन कारणों की जांच करे जिनके कारण शिशु का विकास रुक गया है तथा उसी के अनुसार उपचार की सलाह दे । यदि शिशु मृत है तो 3-4 सप्ताह से अधिक उसके गर्भाशय से स्वाभाविक रूप से निकलने ( Spontaneous evacuation ) की प्रतीक्षा न करें । 

यदि मृत शिशु इससे अधिक समय तक गर्भाशय में ही रुका रहे तो महिला में रक्तजमाव संबंधी विकार पैदा होने लगते हैं । चिकित्सक को चाहिए कि इस असामान्यता को दूर करने के लिए उसे फाइब्रिनोजन ( Fibrinogen ) अथवा ताजा रक्त दे । 

इसके अलावा अन्य असरदार तरीके भी अपनाये जा सकते हैं । जैसे , सिटोसिनॉन ( Syntocinon ) की " ड्रिप " अथवा प्रोस्टैगलैंडिंस ( Prostaglandins ) का इंजेक्शन दिया जा सकता है । इससे गर्भस्थ शिशु के स्वाभाविक रूप से बाहर निकलने में सहायता मिलती है । 

मृत शिशु के गर्भ में रुके रहने से महिला को संक्रमण ( Infection ) भी हो सकता है । इसके बचाव के लिए ऐंटीबॉयोटिक्स ( Antibiotics ) का प्रयोग करना चाहिए । उसके बाद गर्भाशय के संकुचन ( Uterine contractions ) के लिए औषधियां देनी चाहिए ।

जब मृत शिशु को गर्भाशय से बाहर निकालने के लिए उपरोक्त सभी तरीके कारगार सिद्ध न हो तो अंततः ऑप्रेशन ही करना पड़ता है । किंतु ऑप्रेशन के दौरान अत्यधिक सावधानी बरती जानी चाहिए ताकि महिला किसी भी तरह के सक्रमण का शिकार न हो सके । 

गर्भाशय की सफाई के बाद आगामी कुछ महीनों तक गर्भधारण न करें । इस गर्भपात की समस्या से बचने के लिए आवश्यक है कि जैसे ही विवाहित महिलाओं का मासिक स्राव ( Menstruation ) समय पर न हो तो उन्हें तुरंत ही चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए । 

चिकित्सक उनकी शारीरिक जांच कर उच्च रक्तदाब ( High blood pressure ) , गुर्दे की बीमारी , मधुमेह ( Diabetes ) , गले , रक्तसमूह ( Blood group ) गर्भाशय के विकारों से संबंधित रोगों , क्षयरोग ( Consumption ) तथा यौन - रोगों ( Venereal diseases ) , इत्यादि का उचित उपचार करें । 

उसके बाद ही दुबारा गर्भधारण की सलाह देनी चाहिए । गर्भावस्था की सामान्य स्थिति में गर्भवती महिला को रक्तक्षीणता ( Anaemia ) से बचाने के लिए आयरन ( Iron ) तथा फोलिक अम्ल ( Folic acid ) की गोलियां अथवा इंजेक्शन दें । शरीर में हॉर्मोस ( Hormones ) की कमी होने पर आवश्यकतानुसार इनका सेवन करने से सामान्य गर्भ - विकास में सहायता मिलती है ।


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