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हृदयावरण शोथ [ पैरिकार्डाइटिस- Pericarditis ] रोग क्या है? क्यो हो जाता है? इलाज के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? What is cardiovascular disease [ pericarditis ] disease? Why does it happen? What can be done for treatment?

 हृदयावरण शोथ [ पैरिकार्डाइटिस- Pericarditis ] 


अन्य नाम - हृदयावरण का प्रदाह , परिहृद शोथ । इसे हृदय झिल्ली शोथ के नाम से भी जाना जाता है । 

परिचय - Inflammation of the pericardium ' यदि किसी कारण से पेरिका र्डियम में प्रदाह हो जाये तो उसे पेरिकार डाइटिस कहते हैं । इसमें हल्का बुखार , दर्द , सूखी खाँसी , श्वास कष्ट , दिल धड़कना , मन्दाग्नि , अरुचि एवं हृदय में सूजन होती है । 


हृदयावरण शोथ के प्रकार -

1. एडहीसिव पैरीका इटिस ( Adhesive Pericarditis ) - हृदयावरण शोथ जिसमें हृदयावरण असामान्य रूप से घने तन्तु - ऊतक द्वारा हृदय से चिपक जाता है । 

2. संकीर्णक हृदयावरण शोथ ( Constrictive Pericarditis ) - हृदयावरण शोथ जिसमें अन्तरांगी एवं भित्तिक परतें एक - दूसरे से चिपक जाती हैं जिसके साथ सम्पूर्ण हृदयावरण मोटा हो जाता है । 

3. फाइब्रिनी हृदयावरण शोथ ( Fibrinous Pericarditis ) - ऐसा हृदयावरण शोथ जिसमें हृदयावरण मक्खन के समान निःस्राव से ढक जाता है जो सूख कर हृदयावरणीय सतहों को जोड़ देता है ।

4. हीमोरैहजिक पैरीका इटिस ( Hemorrhagic Pericarditis ) - ऐसा हृदयावरण शोथ जिसमें निःस्राव में रक्त पाया जाता है । 

5. इस्कीमिक पैरीका इटिस ( Ischemic Pericarditis ) - हृदय की स्थानिक अर क्तता के परिणामस्वरूप होने वाला हृदयावरण शोथ । 

6. न्योप्लास्टिक पैरीकार्डाइटिस ( Neoplastic Pericarditis ) - हृदयावरण से जुड़ी रहने वाली रचनाओं के दुर्दम अर्बुदों के द्वारा हृदयावरण के प्रभावित होने के कारण होने वाला हृदयावरण शोथ । 

7. सीरोफाइब्रीनस पैरीकार्डाइटिस ( Serofibrinous Pericarditis ) - हृदयावरण शोथ जिसमें सीरमी निःस्राव बहुत बड़ी मात्रा में होता है । इसमें फाइब्रिन बहुत कम होता है । 

8. यूरेमिक पैरीकार्डाइटिस ( Uremic Pericarditis ) - यूरीमिया के फलस्वरूप होने वाला हृदयावरण शोथ । 

पैरीकार्डाइटिस में - पैरीकार्डियम ( Covering over the heart ) के भीतर रस , रक्त , पीव , फाइब्रिन वगैरह इकट्ठा होते हैं । जब रस , रक्त , पानी या पीव इकट्ठी होती है , तब उसको परिकार्डाइटिस विद एफ्यूजन ( Pericarditis with effusion ) कहते । जब केवल फाइब्रिन ही इकट्ठा होता है तब उसे ड्राई फार्म कहते हैं ।


रोग के प्रमुख कारण -

■ मुख्य कारण आमवात । 

न्यूमोनियाँ , पल्मोनरी ट्यूबरकुलोसिस , एम्पाइमा , सेप्टीसीमिया , वृक्क शोथ , मधुमेह , मारक आर्बुद( गांठ ) आदि संक्रामक रोगों में हुआ करता है । 

इन्फार्शन कोरोनरी थ्राम्बोसिस के पश्चात हृत्पेशी रोध गलन , मायो- कार्डियल इन्फाकर्शन के द्वितीयक रूप में ।

■ मूत्र विषमयता ( यूरीमिया ) । 

■ बाहरी आघात । 

■ घातक अर्बुद( गांठ ) के फलस्वरूप ।

■ एक्टीनोमाइकोसिस । 

■ सिफिलिस । 

■ कभी - कभी मस्तिष्कावरण शोथ , लोहित ज्वर , प्रायमरी एटिपिकल न्यूमोनिया , मिक्सीडीमा , अण्डूलेण्ट फीवर आदि रोगों के उपद्रव स्वरूप ।

■ उत्तेजक कारणों में तमाम प्रकार के जीवाणु । बैक्टीरिया आदि । 


रोग के प्रमुख लक्षण - 

■ हृदय स्थान पर तीव्र पीड़ा । 

■ दर्द सीने से बायें हाथ की ओर फैलता है । 

■ हृदय स्थान के ऊपर अग्रखण्ड की जगह पर दबाने से भयानक कष्ट । 

■ श्वास - प्रश्वास में कष्ट । पानी इकट्ठा होने पर बहुत अधिक । 

■ नाड़ी का स्पंदन ठीक नहीं । 

■ शुष्क ' वातिक कास ( unproductive cough ) और खाँसने पर कष्ट । 

■ उपद्रव रूप में जब यह रोग होता है तो पैदा होने पर शीत के साथ बुखार अधिक । 

■ सीने का दर्द श्वास लेते समय , खाँसते समय तथा किसी भी प्रकार की हरकत करने पर अधिक बढ़ जाती ह । 

■ अरक्तता का लक्षण विशेष । 

■ ज्वर 101 डि . फा . तक । 

■ नाड़ी की गति 100-120 प्रति मिनट । 

■ एक - दो दिन में जब हृदयावरण में तरल ( Effusion ) भर जाता है

■ दर्द कम हो जाता है । 

■ साँस लेने में कठिनाई बनी रहती है और खाँसने पर बड़ा कष्ट होता है । 

■ गले की शिरायें उभरी हुई होती हैं । 

वैसे यह रोग नवयुवकों में होता है , परन्तु अनेक कारणों के अनुसार संक्रामक होकर किसी भी अवस्था में हो सकता है । पुरुषों को अधिक ।

रोग की पहिचान - 

■ नाड़ी अस्वाभाविक भाव से चलती है और गति तेज हो जाती है । 

■ कलेजा धड़कता है । 

■ जब तक पानी इकट्ठा नहीं होता है तब तक घर्षण शब्द प्राप्त होता है । पानी या पीव हो जाने पर ठोस आवाज मिलती है । 

■ तरल की उपस्थिति में एक्स - रे लेने से रोग निर्णय हो जाता है ।


रोग का परिणाम -

■ अधिकांश रोगी उचित उपचार से ठीक हो जाते हैं । परन्तु कुछ रोगियों में सीरस , रक्तस्रावी तथा पूयजनक स्राव हृदयावरण में उपद्रव स्वरूप एकत्रित हो जाते हैं तथा कभी - कभी अभिलग्न हृदयावरण शोथ ( Adherent Pericarditis ) हो जाता है ।

याद रखिये - 

■ तीव्र रोग में शीघ्र परिवर्तन होते हैं । हृदय पेशी की कमजोरी के कारण हृदय गति बन्द होने से प्रायः दूसरे - तीसरे सप्ताह में मौत होती है । 

■ हृयुमेटिज्म कारण होने पर हृत्पेशी प्रायः क्षतिग्रस्त हो जाती है । 

■ हृदय आपस में चिपक भी सकता है अथवा सपूय हृदयावरण की स्थिति उत्पन्न हो सकती है । 

■ वृक्क रोग कारण हो और पूय पड़ जाय और रोगी बालक हो अथवा दुर्बल हो तो यह रोग कठिनाई से ही ठीक होता है ।


चिकित्सा विधि  -

■ कारणानुसार उपचार करना अनिवार्यतः आवश्यक । 

■ आमवातिक ( Rheumatic ) रोग , क्षय , जीर्ण वृक्क शोथ को साधारण तरीके से अच्छा करें । 

■ अधिक कष्ट होने पर ' मार्फीन का उपयोग इन्जेक्शन रूप में । 

■ घातक अवस्था में अवसादनाशक औषधि ( जैसे - कोरामीन , वेरिटाल ) दी जा सकती है ।

■ चिरकारी कंस्टूक्टिव पैरीका इटिस में रोगी को 3 माह तक बेड पर ही रखना चाहिये । जब तक ज्वर एवं नाड़ी की गति स्वाभाविक न हो जाये । 1 वर्ष तक दौड़ भाग का कार्य न करें ।


पथ्यापथ्य / सहायक चिकित्सा - 

■ भोजन थोड़ी - थोड़ी मात्रा में बार - बार दिया जा सकता है । भोजन में दूध , मट्ठा , कांजी , अण्डा , जूस , माँस - रस , शाक - सब्जी , रोटी आदि दे सकते हैं । नमक की मात्रा कम होनी चाहिये । रोगी को थोड़ा - थोड़ा पानी पीने को दें । दूध पानी रहित होना चाहिए । 


■■ सहायक चिकित्सा में - हृदयावरण पर बर्फ रखने की अपेक्षा गर्म पानी की बोतल से सेंक करना अधिक आराम पहुँचाता है । 

■ पूर्ण विश्राम आवश्यक । 

■ पूयावता , ऊर्ध्वस्थ श्वसन ( Orthopnoea ) और शिराओं का फूलना उपस्थित हो तो 500-600 मि . ली . रक्त निकाल देने से तत्काल आराम मिल जाता है ।


हृदयावरण की रोगहर चिकित्सा - 

■ इस रोग की चिकित्सा में एण्टीबायोटिक का विशेष महत्व है । इसके लिये ' स्ट्रेप्टोमाइसिन ' और ' पेनिसिलीन के सम्मिलित योग दिये जा सकते हैं । ' डाइक्रिस्टासीन फोर्ट अथवा स्ट्रेप्टोमाइसिन ' 1 ग्राम प्रतिदिन लाभकर हैं । ' टेट्रासाइक्लीन 250 से 500 मि . ग्रा . ( 1-2 कैप्सूल ) प्रति 6 घण्टे पर मुख द्वारा दे सकते हैं । 

■ अधिक कष्ट होने पर - मार्फीन सल्फ 10-15 मि . ग्रा . अथवा “ पेथिडीन हाइड्रोक्लोराइड " 100 मि . ग्रा . का इन्जेक्शन माँस में लगावें । 

■ अधिक घातक अवस्था में - ' कोरामीन ' अथवा ' वेरिटाल का इन्जेक्शन माँस में प्रति 3 घण्टे के अंतर पर । 

■ भयानक अवस्थाओं में मार्फीन । 

■ रोगी को बिस्तर पर रखें और विटामिन्स प्रचुर मात्रा में तथा अधिक कैलोरी वाला आहार ( Dite ) पर्याप्त मात्रा में दें । 

■ वेदनाजनक बाधाओं को एस्प्रिन या कोडोपाइरीन द्वारा दूर करें ।

■■ इस रोग में नित्य 2 बार पेनिसिलीन 3 लाख यूनिट के साथ विटामिन सी 5 हजार यूनिट एक साथ अतः शिरा प्रयोग करके 12 दिनों में अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं । 

याद रखें - स्थानिक चिकित्सा में " मेथिल सैलिसिलेट " का मल्हम अथवा ' पोलास्टा का उपयोग प्रशस्त है । 


चिकित्सा ए . पी . आई टेक्स्ट बुक के अनुसार - 

ड्राई पैरीकार्डाइटिस चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य लेकर कारण की चिकित्सा करें । 

क्षय निरोधी ( एण्टी ट्यूबरकुलर ) एवं एण्टी रियूमेटिक आ . नु . । चिकित्सा आवश्यक । 

■ सहायक चिकित्सा हेतु सैलीसिलेट एवं कोर्टीकोस्टेरॉयड का उपयोग । 

■ तरल हृदयावरण शोथ ( Purulent Pericarditis ) में उपयुक्त एण्टीबायोटिक। 

■ ज्वर तथा पीड़ा आदि की लाक्षणिक चिकित्सा हेतु - ' एनाल्जेसिक दें ।

Rx 

■ शैया पर पूर्ण विश्राम ( Complete Bed Rest ) । 

■ प्रा . दो . सायं - फेब्रक्सप्लस ( इण्डोको ) 1 टेबलेट जल से 3 बार । 

■ दिन के 8 बजे , सायं 4 बजे एवं रात 8 बजे - लेमक्लोक्स ( Lamklox ) लाइका 1 कैप्सूल जल से 3 बार ।  

■ 10 बजे दिन के - मल्टीविटाप्लेक्स फोर्ट - 1 कै . नित्य ।

■ दिन में 3 बार - प्रेडनीसीलीन - 1 टे . जल से 1 सप्ताह तत्पश्चात 2 टे . । अन्त में 1 टेबलेट । 

■ हृदय स्थान पर - एण्टीफ्लोजिस्टीन प्लास्टर । 

नोट - रोग की तीव्रावस्था में पेथीड्रीन 100 मि . ग्रा . का इन्जेक्शन लगायें एवं रेफलिन ( Renin ) रैनवैक्सी का इन्जेक्शन माँस या नस में 1-4 ग्राम की विभाजित मात्रा में लगायें । 

निर्देश - अत्यधिक रोग वृद्धि की अवस्था में आपरेशन कराके हृदयावरण स्थित द्रव को निकलवा दिया जाता है । 

रोगी सामान्य व्यवस्था पत्र - 

Rx 

■ शैया पर पूर्ण विश्राम । 

■ दिन में 2 बार -  इन्जे . क्लोमेण्टिन ( Inj . Clomentin ) इल्डर ' 1-2 वायल दिन में 2 बार । 

■ प्रा . दो . शा.  - बिटनीलान ( Betnelan ) ' ग्लैक्सों 1-2 टेबलेट । 

■ प्रा . 8 बजे , रात 10 बजे - कोरामीन 10-20 बूंद भोजन के बाद । 

■ छाती पर - गर्म पानी की बोतल का सेंक । 

■ दिन के 10 बजे , शाम 6 बजे - ब्रूफेन 400 - 1-1 टेबलेट जल से । 

■■ इन्जे.'ओम्नाटेक्स ( होचेस्ट ) 1 एम्पुल माँसपेशीगत अथवा शिरा में प्रति 12 घण्टे पर देने से भी उत्तम लाभ मिलता है । 

नोट - हृदयावरण शोथ में प्रयुक्त टेबलेट / कै. ,सीरप एवं इन्जे. आगे इण्डोकार्डइटिस की भाँति ।



image credit - www.scientificanimations.com,, BruceBlaus,, James Heilman, MD,, Raina.sahil

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