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उच्च रक्तचाप [ हाइपरटेन्शन- Hypertension ] की समस्या किस प्रकार उत्पन्न होती है? किस प्रकार इसका इलाज संभव है? How does the problem of hypertension [hypertension] arise? How is its treatment possible?

उच्च रक्तचाप [ हाइपरटेन्शन- Hypertension ] 


अन्य नाम - रक्त चाप वृद्धि , उच्च रक्त चाप ( High Blood Pressure ) एवं अति रक्त दाब । इसे हाई ब्लड प्रेशर के नाम से भी जाना जाता है । 

परिचय - उच्च रक्त चाप जिसमें सिस्टोलिक पारे के 140 मि.मी. से ऊपर तथा डायस्टोलिक पारे के 90 मि.मी. से ऊपर होता है । 

स्वस्थ मनुष्यों में औसत 110 से 140 मि.मी. पारे ( Hg ) सिस्टोलिक तथा 60 से 100 M.M. Hg डायस्टोलिक होता है । उपरोक्त सीमाओं के ऊपर उच्च रक्त चाप तथा नीचे निम्न रक्त चाप होता है । 

■ प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति में रक्त का दबाव पृथक होता है । यह दबाव आयु , समय , श्रम , आवेश ( Emotion ) , कुछ सीमा तक भोजन और धूम्रपान से प्रभावित होता है । क्लीनिक और शैया पर विश्राम करने के उपरान्त प्रातःकाल लिये गये रक्त दाब में भी अंतर होता है । रक्त चाप मापक यंत्र , बी.पी. यंत्र या ' Sphygmomanometer ' कहलाता है ।

उच्च रक्त चाप सारांश में - किसी भी कारण से उत्पन्न बढ़े हुए रक्त दाब को अति रक्त दाब ( High Blood Pressure अथवा हाइपरटेन्शन ) कहते हैं । जब किसी युवा व्यक्ति में विश्राम एवं बैठी हुई अवस्था में धमनीगत दाब ( Arterial Pressure ) 160/95 मि.मी. अथवा उससे अधिक मिले तब उक्त व्यक्ति को उच्च रक्त दाब से ग्रसित मानना चाहिये।

रोग के प्रमुख कारण - 

■ पौष्टिक भोजन की प्रचुरता , किन्तु शारीरिक मेहनत की कमी । 

■ चिन्ता एवं मानसिक परिश्रम । 

■ कुछ वैज्ञानिकों के मतानुसार अत्यधिक प्रोटीन युक्त आहार का ग्रहण करने से।

■ पहले से वृक्क( kidney ) सम्बन्धी गड़बड़ी । 

■ पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी , गड़बड़ी , यकृत विकार , कब्ज , अधिक भोजन करना , अधिक से अधिक मात्रा में शराब पीना , बहुत स्त्री सहवास , मूत्र ग्रन्थि की बीमारी , मधुमेह , मोटापा , हृदय की बीमारी , गठिया , सिफिलिस , जीर्ण वृक्क शोथ , एड्रीनल एवं पिट्यूइटरी बॉडी के प्रभृति कारणों से रक्त का दबाव बढ़ जाता,


मसालेदार और तीक्ष्ण आहार का प्रयोग -  अचार , तेल , खटाई के सीमा से बाहर सेवन करने से रक्त दाब बढ़ जाता है । 


रोग के प्रमुख लक्षण - 

■ आरम्भ में इस रोग के लक्षण जैसे- घबराहट , चिड़चिड़ापन , दुर्बलता , अनिद्रा आदि ऐसे होते हैं जिनको मनोवैज्ञानिक विकारों से पृथक करना कठिन होता है । 

■ बाद में पाये जाने वाले लक्षण - सिर दर्द , भ्रम , स्मरण शक्ति और ध्यान केन्द्रित करने की सामर्थ्य में कमी । 


अन्य लक्षण - सिर में चक्कर , सदैव आलस्य का बने रहना , शारीरिक एवं मानसिक परिश्रम से अनिच्छा( मन मे इक्छा का अभाव ) । रात को नींद अच्छी न आना अथवा बिल्कुल न आना , हृदय में दर्द , हाथ - पैर में झनझनाहट ,

यद्यपि अति रक्त दाब के कारणों का अनेक रोगियों में पता नहीं चल पाता है तथापि सावधानी से किये गये परीक्षणों से कुछ कारणों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है । 

नोट - 

■ सामान्य रूप से इस रोग के आरम्भ में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं पाया जाता , केवल रक्त दाब ही बढ़ा होता है । 

■ आरम्भ में रक्त दाब कभी - कभी बढ़ता है और आवेश , श्रम तथा ठंड लगने आदि कारणों से हो जाता है । 

■ कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनमें आये दिन रक्त दाब कम - अधिक होता रहता है । आज 180 है तो कल 140 होगा । ऐसे रोगी मानसिक रक्त दाबाधिक्य से पीड़ित होते हैं । 

■ इस रोग से हृदय और गुर्दो में विकृति बहुत बाद में आती है ।


लक्षण सारांश में -

■ सिर में विशेषकर सिर की पिछली ओर पीड़ा । 

■ कभी - कभी सिर की पीड़ा असह्य । 

■ मस्तिष्क भारी - भारी सा । 

■ आँखों के सामने अंधेरा छा जाना । अथवा दृष्टि का जाते रहना ।

■ आँखों के अन्तरीय पटल में रक्तस्राव के लक्षण ।

■ रोगी का दिन प्रतिदिन दुर्बल होते जाना एवं काम करने की शक्ति में कमी । 

■ रात में अधिक और बार - बार मूत्र । 

■ मस्तिष्क की धमनी के फट जाने का भय ।अतः मूर्छा , पक्षाघात एवं मृत्यु की आशंका । 

याद रखिये- 

● साधारण तथा औसत रक्त दाब रहने पर रोगी को किसी प्रकार का आभास नहीं होता है जबकि इनका पता अन्य किसी भी कारण के लिये रोगी का रक्त चाप मापते समय चलता है । 

● अत्यधिक रक्त चाप में जब हृदय , हृदय की रक्तवाहिनियों तथा मस्तिष्क प्रभावित होता है तब रोग को इन अंगों के कारण उत्पन्न हुए लक्षणों का ।


रोग की पहिचान - 

■ उच्च रक्त दाब की पहिचान पूर्णतया रक्त दाब ( Blood pressure ) के मापन द्वारा हो पाता है । इसके लिये निरन्तर रक्त दाब मापन आवश्यक है । इसमें 3 दिनों तक विविध अवस्थाओं में रक्त दाब देखने के उपरान्त यदि रक्त दाब बढ़ा हुआ मिले तभी उक्त रोगी को अतिरक्त दाब ( Hypertension ) से पीड़ित समझना चाहिये । 

■ स्वस्थ व्यक्ति का विश्रामावस्था में 125 से 135 रक्त दाब होता है किन्तु इसमें 150 से 300 तक रक्त दाब हो जाता है ।


रोग का परिणाम - 

■ रक्त दाब की अति वृद्धि वाले रोगी को खतरा रहता है । सिर में धमनी फटने से मृत्यु हो सकती है । ऐसे रोगियों को हृदय की अति वृद्धि होती है । अधिक परिश्रम से हृदय विस्फार हो जाने पर जीवन लड़खड़ाता सा चलता है । किसी समय हृदय गति अवरोध से मृत्यु हो सकती है ।

■ प्रारम्भ में रोग आसानी से काबू में आ सकता है । यदि भोजन और औषधि की ओर विशेष ध्यान रक्खा जाये तो ,


रक्त चाप वृद्धि की चिकित्सा विधि - 

■ हृदय रोग हो चुका है तो रोगी को परामर्श हेतु विशेषज्ञ अथवा अस्पताल भेज दें । 

■ यदि रोगी के शरीर का भार बहुत अधिक है तो विभिन्न विधियों से कम करें । 

■ रोगी को को शान्तिदायक औषधियाँ आवश्यक । 

■ औषधि का चयन रोगी की दशा को देखते हुए करना चाहिए कि उसके कुप्रभाव बहुत कम हों । इस प्रकार की औषिधियों की आवश्यकता रोगी को जीवन पर्यन्त तक हो सकती है । अतः रक्तचाप का संतुलन बनाये रखना ही पर्याप्त होता है । उसे 900 से 100 M.M. Hg के मध्य ही रखने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है , अधिक नीचे लाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये । 

■ एक औषधि के प्रयोग करने पर यदि कुप्रभाव हों तो दूसरी औषधि बदल दें । कुप्रभावों में नाक का बंद होना , नपुंसकता , बुरे स्वप्न , नाक की रुकावट एवं अतिसार होते हैं ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा -

पथ्य  - अल्प , लघु एवं लवण रहित आहार रक्त दाब को कम करने में सहायक होते हैं । 

- जिस समय अधिक व्यस्त कार्यक्रम रहता है उस समय अम्लीय पेय द्रव से बहुत लाभ,

अपथ्य - माँस , मटन , नमकीन , माँस , मछली आदि उत्तेजक तथा प्रोटीन युक्त आहार का पूर्ण निषेध आवश्यक है । शराब पीना सर्वाधिक हानिकारक है । रोगी को भोजन में नमक बिल्कुल बंद कर दिया जाता जो कि उचित नहीं है यदि कुछ रोगी इसका पालन भी करते हैं तो भोजन अरुचिकर होने से उसका शरीर कमजोर पड़ने लगता है । 

रोगी को लेसिक्स जैसे ' डायूरेटिक्स ' देने के कारण मूत्र के बार बार आने से वैसे भी शरीर में नमक की कमी हो जाती है । यदि नमक बिल्कुल बंद कर दिया जाये तो अत्यधिक थकान का अनुभव होने लगता है । कमजोरी आ जाती है अतः नमक को भोजन में बिल्कुल बंद न करने की बजाय अल्प मात्रा में लेने की सलाह देनी चाहिये ।

■■ अधिक मोटे तथा भारी शरीर के रोगी को कम कैलोरी वाला भोजन लेना चाहिये । जैसे - घी , तेल एवं तले पदार्थ , अण्डे , मछली , माँस , मक्खन शुष्क मेवे - बादाम , अखरोट , काजू , नारियल , आलू , चावल आदि कम मात्रा में दें अथवा बिल्कुल न दें । 

सहायक चिकित्सा के अन्तर्गत -

■ शरीर भार को कम करने के लिये यदि सप्ताह में 1-2 दिन का उपवास रखा जाता है तो सोडियम का शरीर से अधिक मात्रा में त्याग होता ही है जो लाभदायक है । पूर्ण विश्राम करना चाहिये । किसी भी कारण से थका देने वाला श्रम तो करना ही नहीं चाहिये । रात को अच्छी नींद आनी चाहिये , इसके लिये शान्त और एकान्त वातावरण में सोना चाहिये । यदि आवश्यक हो तो नींद की गोलियों जैसे - ' सोनेरिल ' , ' सोनरगन ' , ' डोरिडेन आदि किसी का उपयोग कर सकते हैं । 

■ सभी रोगियों को शीघ्रता , क्रोध एवं चिन्ता से बचना चाहिये ।


हाई ब्लड प्रेशर उच्च रक्त चाप की औषधि चिकित्सा -

■ टै . एसीटेन ( Tab . Aceten ) नि . वोकहार्डट = 1-2 टेबलेट और अत्यधिक उच्च रक्तचाप की दशा में 2-4 टेबलेट तक प्रतिदिन 2-3 बार दे सकते हैं । यह औषधि हर प्रकार के हाई ब्लड प्रेशर में उपयोगी है । 

■ टै . बीटाकार्ड ( Tab . Betacard- टोरेण्ट ) = 50 एवं 100 मि . ग्रा . की टेबलेट प्रतिदिन दें । 

■ कै . कैल्सीगार्ड ( Cap . Calcigard- टोरेण्ट ) = 5 तथा 10 मि . ग्रा . के कैप्सूल प्रतिदिन 2 बार दें ।

■ टै . कोरबीटा ( Tab . Corbeta- साराभाई ) = 1-2 टेबलेट प्रतिदिन 2 बार दें ।

■ टै . केटिनॉल ( Tab . Catenoi एल्डेक ) = 50 तथा 100 मि . ग्रा . की 1-2 टेबलेट प्रतिदिन 1 बार दें । 

●● सामान्य ( Mild ) बी . पी . में - सांधारणतया शान्तिदायक औषधि देने से ही काम चल जाता है । 

●● मोडरेट बी . पी . ( Modrate B.P. ) है तो - थायाजाइड समूह की औषधि - एसीड्रेक्स , नेफ्रिल , हाइग्रोटोन , नियोनेकलेक्स आदि के साथ रिसीन ( सर्पासिल ) की न्यूनतम मात्रा से चिकित्सा आरम्भ करके आवश्यकतानुसार मात्रा में वह औषधि दें । 

●● अति तीव्र ( Severe ) बी . पी . में - जबकि वृक्क एवं नेत्रों पर प्रभाव हो चुका हो तो ' एल्डोमेट ' तथा ' थायाजाइड ' समूह की औषधि की आवश्यकता होती है । अर्कामिन ( Arkamin ) तथा आर्कामिन - एच के अलावा नेट्रीलिक्स ( Natrilix ) टेबलेट भी प्रयोग की जा सकती है ।


अवस्थानुसार विशिष्ट चिकित्सा -

◆ सामान्य ( Mild ) हाइपरटेन्शन ( डायस्टोलिक - 90-110 ) - थायजाइड्स ( जैसे - इसीड्रेक्स या लासिक्स -1 सप्ताह तक । यदि बी . पी . कण्ट्रोल न हो तो - ' रिसर्पिन ' , ' हाइड्रालाजीन ' , ' मिथिलडोपा ' , ' क्लोनीडाइन ' अथवा ' प्रोप्रानोलोल का प्रयोग करें । 

◆ मध्यम ( Moderate ) स्वरुप का हाइपरटेन्शन ( डायस्टेलिक 110-130 ) - डायूरेटिक ( थायाजाइड ) प्रारम्भिक चिकित्सा ( Any of the second line drugs from beginning ) । 

- हाइड्रालाजीन ट प्रोप्रानोलोलो ( कोरबीटाजीन- Corbetazine ) । 

- यदि रीनल फेल्योर का भी सम्बन्ध हो तो – हाइड्रालाजीन , मेथिलडोपा , क्लोनीडीन ( Clonidine ) का परामर्श करें ।


◆◆ गम्भीर ( Severe ) स्वरुप का हाइपरटेन्शन ( डायस्टोलिक 130 से ऊपर ) - तत्काल इन्जेक्शन चिकित्सा द्वारा चिकित्सा जारी कर देनी चाहिए । 

- अधिक मोटापा में शरीर का वजन घटायें । 

- अल्प नमक युक्त भोजन ( Lowsalt diet ) । 


◆◆ अत्यधिक गम्भीर स्वरुप का हाइपरटेन्शन का ( अस्पताल में भर्ती लाइक रोगी ) - इन्जे . सर्वासिल ( Inj . Serpasil ) 1 मि . ग्रा . / माँसपेशीगत अथवा आई.वी. ( शिरा में ) । 

नोट - यदि बी . पी . कन्ट्रोल न हो तो 4 घण्टे पश्चात् इसकी डबल मात्रा दें । 

- हिपोस्टेट ( Hipostat ) 300 मि . ग्रा . ( 5 मि . ग्रा . / किलो भार ) नस में धीरे - धीरे ।

- Arfonad ( Trimethophan ) 500 मि . ग्रा . I/V 5% ग्लूकोज में मिलाकर 1 से 4 मि . ली . ( ml ) प्रति मिनट के हिसाब से दें ।

- ' सोडियम नाइट्रोप्रूसाइड 50 मि . ग्रा . को 500 मि . ली . डेक्स्ट्रोज में मिलाकर 25 माइकोग्राम प्रति मिनट के हिसाब से I/V इन्फ्यूजन दें । 

- ‘ हाइड्रालाजीन ' ( Apresoline ) 5 से 20 मि . ग्रा . × माँसपेशीगत 2-4 घण्टे पर । टेकीकार्डिया की स्थिति में Inderal मिलाकर दें । 


अति रक्त दाब की मिश्रित औषधि चिकित्सा ( Combination Therapy ) 

( 1. ) कॉर्बेटाजीन ( साराभाई ) 1/2 टेबलेट , क्लोथैल्टॉन ( एम . जी . ) 1/2 टेबलेट , इस्बैटल ( बी . डब्लू . ) 10 मि . ग्रा . की 2 गोली । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2-3 बार दें । यह हर प्रकार के अति रक्त दाब की उत्तम औषधि है । 

( 2. ) सर्पासिल ( सिवा गैगी )टेबलेट , एटोरेक्स ( यूनिकेम )टेबलेट , गार्डीनिल ( रोन पुलेन्क ) टेबलेट । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार जल से । 

( 3. ) अर्कामिन ( यूनिकेम ) 1/2 टेबलेट , बिनड्रीन ( सैण्डोज )टेबलेट । दोनों को पीसकर एक पुड़िया बना लें । ऐसी 1 पुड़िया दिन में 2-3 बार दें । इसके सेवन से ब्लड प्रेशर शीघ्र ही नार्मल स्थिति में आ जाता है । 

( 4. ) कोर्बाटाजीन ( साराभाई ) 1/2 टेबलेट , क्लोथैलटोन ( S.G. ) 1/2 टेबलेट , इस्बाटोल ( बरोज वेल्कम ) 10 मि . ग्रा . की 2 टेबलेट , ब्रोमो - सपेंन्टाइन 1/2-1 छोटा चम्मच । ऐसी एक - एक मात्रा दिन में 3 बार दें । हर प्रकार के उच्च रक्त दाब में उपयोगी है ।


रक्तचाप वृद्धि की लक्षणों के अनुसार सरल अनुभूत पेटेन्ट चिकित्सा -

1. मामूली रोग में - ' केलप्टिन ' एस . आर . ( बोहरिंगर एम ) 1 टे . नित्य । नये मरीज में 1/2 टेबलेट । बालकों में प्रयोग वर्जित । 

2. रक्त दाब कम करने के अन्य उपाय - कोहनी की शिरा से 200-500 मि . ली . रक्त निकालने से रक्त दाब कम हो जाता है । जितना रक्त निकालें उतना ही ' ग्लूकोज सैलाइन आई . वी . दे दें । यह इमरजेन्सी चिकित्सा है ।

3. सिर की पीड़ा के लिये - ' कैल्शियम डाईयुरेटीन ' थियोविटाल आदि का प्रयोग करें । कोई एक विरेचन भी दे सकते हैं । '

4. जिन्हें अधिक रक्त दाब रहता है - सरपीना की 1-2 टे . नित्य ठंडे पानी के साथ लें । साथ ही ' फीनोबीटोन ' 30 मि . ग्रा . साथ में मिलाकर दें ।

5. चक्कर भ्रम या उत्क्षेपण के लिये - पीरोलाइसिन ( Perolysin ) अथवा ' टीनार्मल ( Tenormal ) 2-25 मि.ग्रा . दिन में 4 बार दें । इसे अल्प मात्रा से प्रारम्भ कर धीरे - धीरे बढ़ाना चाहिये । साथ ही ' मूत्रल ' एवं सर्पगन्धा ( सासिल Serpasil ) को भी देते रहें ।

6. हृदय की दुर्बलता , धड़कन आदि - लेनोक्सिन 1 टे . आवश्यकतानुसार नित्य दें । साथ ही रक्त दाब को कम करने वाली औषधि । 

7. आँख के सामने अंधेरा , अनिद्रा आदि लक्षण - रक्त दाब को कम करने का तत्काल उपाय करें ।

8. रक्त दाब वृद्धि तथा शूल के साथ हद् कार्यावरोध -  ए . टोकोफेराल ( A. Tocopheral ) 100 मि . ग्रा . नित्य । क्रमशः यह मात्रा बढ़ाते हुए तीन सप्ताह में 150 मि . ग्रा . की नित्य होती है ।

9. रसिस्टेन्ट अति रक्त दाब में - टे . हाइड्रालाजीन ( Nepersol ) 25 मि . ग्रा . अथवा ' निफेडीपीन 10 मि . ग्रा . दिन में 3 बार अथवा 20 मि . ग्रा . दिन में 2 बार दें । अथवा टे . ' केप्टोप्रिल ( एसीटेन केपोटेन ) 25 मि . ग्रा . महिलाओं में । अथवा टे . मिनोक्सीडिल 2 मि . ग्रा . दिन में 3 बार महिलाओं को दें ।

10. डायस्टोलिक दाब थनत से अधिक होने पर - रोगी को अस्पताल में प्रवेश दिला देना चाहिये । यदि सुविधा प्राप्त न हो तो - टे . ' नेपरीसौल 1 टे . दिन में 2 बार अथवा ' मिनिप्रैस ( Minipress ) 1 मि . ग्रा . की 1-1 टेबलेट दिन में 2 बार दें ।

11. जब उच्च रक्त दाब निरन्तर बढ़ता ही जाता है और मुख द्वारा दी जाने वाली औषधि से नियंत्रित नहीं हो पाता तब - इन्जे . डायाजौक्साइड ( व्या . नाम - इन्जे . डाइपोस्टैट- Inj . Hypostat ) 5 मि . ग्रा . किलो शरीर भार पर आई . वी . ( I.V. ) बहुत धीरे - धीरे लगावें । अथवा - इन्जे . ' सर्पासिल 1 एम्पुल I/M अथवा I/V मार्ग से दें । जब तक रक्त नियंत्रण में आ जाये प्रति 4 घण्टे पर रीसर्पिन की मात्रा को दुगनी करते जायें ।

■■ यदि किसी रोगी का ' डायास्टोलिक ब्लड प्रेशर 150 मि . मी . पारा ( 150 m.m. Hg . ) है तो उसे 120 मि . मी . पर लाना पर्याप्त है और अधिकांश में इससे नीचे लाना कठिन भी होता है । तो भी जिनका लगभग सामान्य तक उतर सकता है उनमें भी इसका प्रयत्न नहीं करना चाहिये । काफी समय तक चिकित्सा करते हुए इससे कुछ कम करने में कोई हानि नहीं ।

उच्च रक्त दाब में दी जाने वाली अपटूडेट ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल -

1. एसीटेन ( Aceten ) ( वोरवाईट ) - 25-50 मि.ग्रा . दिन में 2-3 बार । मध्यम तथा गम्भीर रक्तदाब में 50-100 मि.ग्रा . दिन में 2 या 3 बार । गर्भावस्था में निषेध।

2. एसीजाइड ( Acezidex वोरवाईट ) - 1-1 टे . दिन में 2 बार । बालकों में निषेध ।

3. एडेलफेन ( Adelphane ) ( सिवा- गैगी ) - 1-1 टेबलेट दिन में 1-3 बार ।

4. एडेलफेन - इसीड्रेक्स ( सिवा - गैगी ) - 1-1 टेबलेट दिन में 1-3 बार ।

5.अल्फाडोपा ( Alphadopa ) ( मेरिण्ड ) - 0.5-2 ग्रा . नित्य विभाजित मात्रा में ।

6. आलटोल ( Altol ) ( इण्डोको ) - 50-100 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट दिन में 2 बार ।

7. एन्जियोप्रिल ( Angiopril ) ( टोरेण्ट ) - 25 मि.ग्रा . की 1 टे . दिन में 3 बार । 

8.अर्कामिन ( Arkamin ) ( यूनीकेम ) - 1 टे. दिन में 3 बार दें । अर्कामीन एच भी ।

9. एटकार्डिल ( Atcardil ) ( सनफार्मा ) - 50-100 मि.ग्रा . नित्य दें ।

10. एटीकोर ( Aticor ) ( विन मेडिकेयर ) - 50 -100 मि.ग्रा . की टे . दिन में केवल 1 बार ।

11. बेप्टाजाइन ( Beptazine ) ( M.M. tabs . ) - 1 गोली दिन में 1-2 बार दें ।

12. बीटाकार्ड ( Betacard ) ( टोरेण्ट ) - 50-100 मि.ग्रा . की टेबलेट नित्य।

13. बीटालाक ( Betaloc ) ( एस्ट्रा आइडियल ) - 100-200 मि.ग्रा . विभाजित मात्रा में ।

14. बीटानोल - डी ( Betanol - D ) ( M.M. tabs ) - 1-3 टेबलेट नित्य । बढ़ाते हुए 5 टि . नित्य ।

15. बीटास्पान ( Betaspan ) ( SKF ) - रीनल उच्च रक्तदाब में 80 मि.ग्रा . नित्य ।

16. बीटाटोप ( Betatrop ) ( सन ) - अनिवार्य ( Essential ) उच्च रक्त दाब में 1 कै . नित्य । बढ़ाते हुए 2 कै . तक । 

17. बिटाक्सीपामिड ( Betaxipamid ) ( जर्मन रेमेडीज ) - टेबलेट दिन में 3 बार ।

18. ब्रिनेरडिन ( Brinerdin ) ( सैण्डोज ) - 1-3 टेबलेट नित्य ।

19. कैलाप्टिन एस.आर. - 1-3 टेबलेट नित्य ।

20. कैल्सीगार्ड ( Caligard ) ( टोरेण्ट ) - 1-2 कै . दिन में 3 बार ।

21. कार्डीपिन ( Cardipin ) ( इन्टास ) - 1-2 कै . दिन में 3 बार ।

22. कारडूल्स ( Cardules ) ( निकोलस ) - 1-2 कै . दिन में 3 बार देवें ।

23. केटाप्रेस ( Catapress ) ( जर्मन रेमेडीज ) - 1-2 टे . सोते समय ।

24. सिप्लार ( सिपला ) - 80 मि.ग्रा . की 1-2 टे . विभाजित मात्रा में ।  

25. क्लोथाल्टोन ( Clothalton ) ( S.G. Pharas ) - 1-1 टे . दिन में 2 बात।

26. कनवरटेन ( Converten ) ( खण्डेल- वाल ) - टेबलेट प्रतिदिन 1 बार देवें ।

27. कोरवीटा -40 डी . ( Corveta - 40D ) ( साराभाई ) - 1-2 टेबलेट दिन में 2 बार । 

28. कोरवीटाजाइन ( साराभाई ) - 1-1 टेबलेट दिन में 3 बार देवें ।

29. डेपाडोक्स ( Dapadox ) ( डीफार्मा ) - 1-1 टेबलेट नित्य प्रातःकाल । बालकों तथा गर्भावस्था में निषेध । 

30. डेपीकोर ( Depicor ) ( मर्ककं ) - 1 टे. दिन मे 3 बार देवें ।

31. डीपिन ( Depin ) ( कैडिला ) - 1-2 टे . दिन में 3 बार । 

32. इमदोप ( Emdopa ) ( I.D.P.L ) - 1-2 टे . दिन में 3 बार । 

33. इनवास ( Envas ) ( कैडिला ) - 5 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट नित्य ।

34. फेलोगार्ड ( Felogard ) ( सिपला ) - 5 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट नित्य ।

35. हार्टेज ( Harteze ) ( लाइका ) - 1-2 टे. दिन में 3 बार देवें ।

36. इण्डेराल ( आई.सी.आई . ) - 1-2 टेबलेट दिन में 3 बार देवें ।

37. इनवोरिल ( Invoril ) ( रैनवैक्सी ) - 5 मि.ग्रा . ( 1 टे. ) नित्य ।

38. इस्मेलिन ( Ismelin ) ( सिवा - गैगी ) - 10 मि.ग्रा . नित्य । 10 मि.ग्रा . हफ्ते में बढ़ाया जा सकता है ।

39. इसोप्टिन 40,80 ( जर्मन रेमेडीज ) - 1-2 टेबलेट दिन में 3 बार ।

40.लिनवास ( Linvas ) ( कैडिला ) - मध्यम एवं तीव्र रक्त दाब में 1 टे.नित्य ।

41. लिपरिल ( Lipril ) ( लूपिन ) - मध्यम एवं तीव्र रक्त दाब में 2.5 मि.ग्रा.नित्य ।

42.लिसोरिल ( Lisoril ) ( इपका ) - 2.5 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट नित्य ।

43. लिस्टरिल ( Listril ) ( टोरेण्ट ) - 2.5 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट नित्य ।

44. लोनोल ( Lonol ) ( खण्डेलवाल ) - 50-100 मि.ग्रा . नित्य ।

45. मेल्डोपा ( Meldopa ) डेज - 1-2 टे . दिन में 2-3 बार ।

46. मेटोलार - एच ( Metolar - H ) ( सिपला ) - 1-2 टेबलेट नित्य देवें ।

47. मायोगार्ड ( Myogard ) ( सलें ) - 1 कै. दिन में 3 बार । 

48. नेप्रीसोल ( Nepresol ) ( सिवा - गैगी ) - 1/2 टेबलेट दिन में 3 बार ।

49. निफेडीन ( Nefedine ) ( Nefedine ) ( S.G. Pharma ) - 1-2 टेबलेट दिन में 3 बार । 

50. नोर्माडेट ( Normadate ) ( ग्लैक्सो ) - 50 मि.ग्रा . की टे . दिन में 2 बार।

51.रेनेडिल ( Renedii ) ( होचस्ट ) - 5 मि.ग्रा . की 1 टे . नित्यं ।

52. सेक्ट्राल ( Sectral ) नि . ' रोन पोलेन्क M.B. - 400 मि.ग्रा की केवल 1 मात्रा नित्य ।

53. सेक्ट्राल प्लस ( रोन पोलेन्क ) - टेबलेट दिन में 2 बार देवें ।

54. सर्पासिल ( Serpasil ) ( सिवा गैगी ) - 1-2 टेबलेट नित्य ।

55. टीनोफिड कै . ( Tenofed ) ( इपका ) - 1 कै . नित्य आ.नु. देवें ।


अति रक्त दाब में लगाने योग्य सुप्रसिद्ध एलो . इन्जे . -

1.इन्जे . सर्पासिल ( Inj . Serpasil ) ( सिवागैगी ) - 1 मि.ली. दिन में 1-2 बार माँस में ।

2. फ्रूमेक्स ( Frumex ) नि.'डोल्फीन'- शोथ वाले उच्च रक्त चाप में 1-2 एम्पुल मांस में लगावें ।

3. हाइडरजीन ( Hyderzine ) ( सैण्डोज ) -  1 मि.ली. मांस में नित्य या हर दूसरे दिन लगावें ।

4. लैसिक्स ( होचेस्ट ) - शोथ वाले उच्च रक्तचाप में 1-2 मि.ली. मांस में लगवायें।

अनुभूत चिकित्सा - एप्रीसोलीन 10 मि.ग्रा . की 1 टेबलेट , सर्पासिलटेबलेट , विटामिन सी 100 मि.ग्रा . 1 टेबलेट । ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 बार लें । 

याद रखिये - कोई भी रोगी जिसकी अवस्था 65 वर्ष के नीचे हो तथा जिसका अनुशिथिलन रक्त दाब ( डायस्टोलिक बी.पी. ) 100 मि.ली. से अधिक हो तो उसको उच्च रक्त दाब को कम करने के लिये औषधि अवश्य लेनी चाहिये । परन्तु 45 वर्ष के पुरुष तथा 35 वर्ष की अवस्था की महिला को तो 90 मि.मी. से अधिक डायस्टोलिक ब्लड प्रेसर पर ही रक्त दाब को नियंत्रित करने के लिये औषधि लेनी चाहिये ।


उच्च रक्त दाब व्यवस्था एक दृष्टि में -

■ Rest and sadative e.g. Phenobarbitone , 10 mg . 2-3 times daily orally or Diazepam 6-30 mg daily in divided doses orally , for mild and moderate cases . 

■ Anti - hypertensive , e.g. Propranolon 80 mg B.D. orally and adjusted at weekly intervals , methyldopa 250 mg 3-4 times daily orally and adjusted at days interval , or metoprolol 100-400 mg daily orally as single or divided dosage . 

■ Diuretic , e.g. spironolactone , 25-100 mg daily orally , or hydrochloro thiazide 25–100 mg daily orally . 

■ Vasodilator , e.g. Hydralzine , 25 mg 2-3 time daily , orally , together with anti - hypertensive and diuretic . 

■ Control of obesity . 

■ Low sodium diet .





image credit - Tibor Végh
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