" बातें गिरा देती हैं रिश्तों में फासलों की दीवार " "Things drop in the relationships wall of crops" "Teenage Counseling"

" बातें गिरा देती हैं रिश्तों में फसलों की दीवार " "Things drop in the relationships wall of crops" "Teenage Counseling"
"Teenage Counseling"


" टीनएज काउंसलिंग "


नए पालकों का छोटे बच्चों और टीनएजर्स के साथ संवाद लगातार कम होता जा रहा है । इन दिनों बच्चों को बहुत ही अधिक प्रोटेक्टेड यानी सुरक्षित रखा जाता है । वे जब भी दुनिया का अकेले सामना करने निकलते हैं तो बहुत मुश्किल में पड़ जाते हैं । बच्चों से संवाद कायम रखें और उन्हें जिंदगी की ऊंच - नीच से भलीभांति वाकिफ कराएं ।

" बातें गिरा देती हैं रिश्तों में फासलों की दीवार "

यदि बच्चा गिर गया है तो उसे खुद उठने दें , यदि हमेशा आप उठाएंगे तो वह बड़ा होकर भी आपसे ही उठाने की उम्मीद करेगा । आज स्कूलों में ‘ नो पनिशमेंट नो रिवार्ड ’ का ब्रह्मवाक्य की तरह पालन किया जाता है । सभी बच्चे हर खेल में एक जैसे होते हैं । कोई पहले नंबर पर नहीं आता । सभी को खुश रखने की चाहत में स्कूली बच्चों के बीच से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा गायब हो गई है । मैदानों में खेलते बच्चे , पैदल चलते हुए बच्चे अब दिखाई नहीं देते । बच्चे अब स्कूलों में ही मोटरसाइकल के मालिक बना दिए जाते हैं ।


स्कूल से स्पोटर्स डे गायब -

स्कूल स्पोर्ट्स डे में कोई दौड़ नहीं है , कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है । पहले की तरह अब प्रथम , द्वितीय या तृतीय स्थान नहीं है । अब यह कहा जाता है कि बच्चों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए । दरअसल आज के समय में माता पिता की एक या अधिक से अधिक दो संतानें होती हैं । वे किसी भी कीमत पर स्कूल में अपने बच्चों को किसी भी खेल अथवा प्रतिस्पर्धा में फिसड्डी नहीं देखना चाहते हैं । यदि स्कूल इस तरह की प्रतिस्पर्धा कराता है तो पैरेंट्स आकर झगड़ते हैं । आज के बच्चों के पास खिलौने और खेल से भरा कमरा है । कोई पूछे कि इन खिलौनों का क्या करते हो तो इसका उनके पास कोई जवाब नहीं होता । वे अब भी और अधिक तथा नया से नया खिलौना । पाने की कल्पना संजोए रहते हैं । इन्हें सबसे अधिक खिलौने चाहिए और अधिक से अधिक ही उनके जीवन का नया मंत्र बन गया है ।


आत्मविश्वास से दुनिया का सामना करना सिखाये ?

आज के पैरेंटस अपने बच्चों के चारों ओर घूमते रहते हैं और हर कीमत पर उनकी रक्षा करना चाहते हैं । अपने बच्चों को घोंसले के संरक्षण की तरह रखना चाहते हैं । बच्चे सड़कों पर निकलते हैं तो पालकों का कलेजा मुंह को आता है । बच्चे जब घर में सबके लिए पकाया हुआ खाना नहीं खाते तो वे परेशान हो जाते है । उन्हें बाहर सड़क पर अथवा मैदान में खेलने देने की बजाय उनके लिए घर पर ही गतिविधियों का आयोजन करते हैं । बच्चों का होमवर्क और उनके अन्य कार्य पैरेंट्स करते हैं । पैरेंट्स बच्चों की हर मुसीबत हल खुद करते हैं ।


क्यों करते हैं युवा आत्महत्या ?



किसी भी प्रतिस्पर्धा परीक्षा में आज ऐसे बहुत से मामले हैं जब बच्चे घर से भाग जाते  हैं या आत्महत्या करते हैं क्योंकि वे परीक्षा में कम अंक से निपटने में और सहने में सक्षम नहीं हैं या वे अपनी पसंद के संस्थान में । प्रवेश पाने में नाकाम रहते हैं । अपने बच्चे की मानसिक और बौद्धिक क्षमता के आधार पर ही उनके लिए गोल सेट करें । अवास्तविक गोल्स तय करने के बाद जब बच्चा उसे हासिल करने में असफल होता है तो उसे आत्महत्या के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझता ।


पेपर्ड है आज का बच्चा ?

पहले के जमाने में बच्चे को माता - पिता की आंखों की निगरानी में अपना बचपन नहीं बिताना पड़ता था । वे दोस्तों के साथ खेलते थे , कूदते थे , गिरते थे और उठकर खड़े हो जाते थे । आज ऐसा नहीं है । आज बच्चे आंखों से दूर रखे ही नहीं जाते हैं । वे अपने आप कोई फैसला नहीं ले पाते हैं । उनके सारे फैसले माता - पिता करते हैं । स्कूल तो दूर रहा कई पैरेंट्स तो बच्चे को कॉलेज के गेट तक छोड़कर आते हैं । यदि वे किसी इंटरव्यू में जाते हैं तो माता - पिता बाहर बैठकर इंतजार करते हैं ।


आपका बच्चा भी बाकी बच्चों की ही तरह है ?

पैरेंट्स को बार - बार अपने बच्चे को यह महसूस कराना कि वह सारी दुनिया के बच्चों से अलग है और विशेष है , बंद कर देना चाहिए । कोई भी बच्चा हमेशा विशेष नहीं होता है , प्रशंसा तभी करें जब उन्होंने कुछ विशेष अच्छा कार्य किया हो । जब वे इसके योग्य हों तभी प्रशंसा करें । इससे उनका स्वाभिमान बढ़ेगा और वे निरंतर प्रगति करेंगे । जीवन सुख और दुखों का मिश्रण है । इसका अहसास उन्हें होना चाहिए । बच्चों को किसी भी संकट का सामना करने लायक बनाना चाहिए । 
संकट के समय संकट से लड़ने की प्रेरणा देना और उनका स्वाभिमान बढ़ाना ही माता - पिता । का ध्येय होना चाहिए । बच्चों को प्रतिकूल समय का अहसास होना चाहिए । बच्चों को कम उम्र में निराशाओं , विफलताओं से निकलने का मौका दें , यह नहीं कि उनकी सभी मुसीबतों को अपने सिर ले लें और बच्चे को सुरक्षित रख लें । कम उम्र में असफलता स्वीकार करने से उनकी मानसिकता मजबूत होगी और वे बड़ी उम्र में भी असफलता का बेहतर तरीके से सामना कर सकेंगे ।

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