आंखों में आ रही लाली को नजरअंदाज न करें - Do not ignore the blubber coming in the eye -

आंखों में आ रही लाली को नजरअंदाज न करें - Do not ignore the blubber coming in the eye -
Eye Disease 

आई डिसीज -

आंखें लाल होना आम बात है , पर इसके प्रति लापरवाह न हों । जल्दी से जल्दी नेत्ररोग विशेषज्ञ से जांच के बाद समुचित इलाज कराएं । आंखों की देखभाल में लापरवाही से नेत्र ज्योति हमेशा के लिए जा भी सकती है ।

आंखों में आ रही लाली को नजरअंदाज न करें -

अगर अचानक आपको अपनी आंखों में लाली दिख रही है तो नजरअंदाज न करें । कई बार ये लाली धूल की एलर्जी , आंखें रगड़ने के कारण , संक्रमण के कारण या आंखों की पुतलियों में आई किसी खराबी के कारण आ सकती है । आमतौर पर एंटीबायोटिक , आई ड्राप से इन्हें ठीक किया जाता है । कई बार यह लाली किसी गंभीर बीमारी का लक्षण भी हो सकती है । ये लाली यदि कुछ दिनों में ठीक न हो तो नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए ।

इन कारणों से होती हैं आंखें लाल -

आंख में चोट लगना कालामोतिया ( ग्लूकोमा ) कॉर्नियल अल्सर ॥ कंजंक्टिवाइटिस आंख में चोट आंख में चोट लगने पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए । जरा सी चोट किसी को अंधा बना सकती है । कई बार चोट लगने पर लक्षण सामान्य ही होते हैं जैसे आंख लाल होना , पानी जाना , दर्द होना आदि । आंख में चोट लगने पर आंखों के डॉक्टर ‘ से आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए । चोट लगने से आंख में मोतियाबिंद , काला मोतिया या कॉर्नियल अल्सर हो सकता है । इसकी वजह से आंख का पर्दा अपनी जगह से खिसक सकता है , जिसे रेटिनल डिटैचमेंट कहते हैं । आंख में चोट लगने पर समय से जांच कराकर इलाज कराना चाहिए ।

कार्नियल  अल्सर -

आंख के बीच में गोलाकार क्षेत्र को कॉर्निया ( काला वाला गोल हिस्सा , जिसे पुतली भी कहते हैं ) कहते हैं । कॉर्निया पर हुए घाव को कॉर्नियल अल्सर कहा जाता है । पीड़ादायक कॉर्नियल अल्सर में आमतौर पर बैक्टीरियल , वायरल और फंगल इंफेक्शन होता है । आंखों में डालने वाली बूंद की दवा में मौजूद एंटीबायोटिक्स होते हैं जो संक्रमण को जड़ से निकालने में सक्षम होते हैं ।


काला मोतिया ( ग्लूकोमा ) -

काला मोतिया ( ग्लूकोमा ) में आंख के अंदर का दबाव ( इंट्राऑक्युलर प्रेशर ) बढ़ जाता है , जिससे आंख के पर्दे पर पाई जाने वाली नस ( ऑप्टिक नर्व ) सूखने । ( खराब होन ) लगती हैं और व्यक्ति की नजर लगातार कम होती जाती है । बूंद की दवा जीवन भर डालने से । इसे काबू में रखा जा सकता है । इसके अलावा सर्जरी भी अंतिम विकल्प के तौर पर की जाती है । 

याद रखें । कि इस बीमारी में एक बार नजर कमजोर हो तो उसे । किसी भी इलाज से ठीक नहीं किया जा सकता है । इसलिए 40 साल की उम्र के बाद आंखों का रेग्युलर चैकअप कराते रहना चाहिए जिन लोगों के चश्मे का । नंबर बार - बार बदल रहा है , डायबिटीज है या परिवार में किसी को काला मोतिया है , उन्हें साल में एक बार अपनी आंखों के प्रेशर और फील्ड ऑफ विजन की जांच कराते रहना चाहिए । अगर काला मोतिया की समस्या हो तो कंसल्टेंट की देख - रेख में इलाज कराना चाहिए ।


आइराइटीस -

आँख के कॉर्निया के पीछे आइरिस हती है । आइरिस में आई सूजन को आइरोइटिस कहते हैं । आइराइटिस के - बहुत से कारण होते है जैसे टीबी , लेप्रोसी , सिफलिस , बैक्टीरियल इंफेक्शन आदि । कुछ मरीजों में तो कारण का पता भी नहीं लग पाता । बिना समय गंवाए । डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए । इस बीमारी के दुष्प्रभाव से आंख में मोतियाबिंद या काला मोतिया हो सकता है , जो आंख की रोशनी के लिए खतरनाक स्थिति है ।


स्क्लेराइटिस -

स्क्लेराइटिस आंख की गंभीर बीमारी होती है । इसका अगर समय से सही इलाज न किया जाए तो यह बीमारी आंखों की रोशनी के लिए नुकसानदेह हो सकती है । आंख के सफेद हिस्से की कोई खास जगह लाल हो जाती है । रह्यूमेटॉयड ऑर्थाइटिस जैसे जोड़ों के रोग के मरीजों में यह आमतौर पर देखने को मिलती है । इसके अलावा टीबी और कुष्ठ के मरीजों में भी यह बीमारी देखने । को मिलती है । इसका इलाज खुद नहीं करना चाहिए । ऐसा करने पर कॉर्निया पर सूजन ( किटाइटिस ) मोतियाबिंद या काला मोतिया होने की आशंका रहती है ।

एंडॉपचेलमाइटिस -

एंडोफ्थेलमाइटिस में आंख के अंदर इंफेक्शन हो जाता है । आंख के इंटीरियर चैंबर में पस पड़ जाता है , जिसके कारण आंख लाल हो जाती है , उसमें तेज दर्द होता है , सूजन , आ जाती है और पानी आने लगता है । रोशनी भी कम हो जाती है । इस बीमारी के इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से आंख की रोशनी चले जाने का खतरा रहता है ।

Previous
Next Post »