" इस रोग के कारण टूट सकती है रीढ़ की हड्डी ""The disease may break due to the spinal cord""Osteoporosis"

" इस रोग के कारण टूट सकती है रीढ़ की हड्डी ""The disease may break due to the spinal cord""Osteoporosis"
Osteoporosis"

" ऑस्टियोपोरोसिस " 

" इस रोग के कारण टूट सकती है रीढ़ की हड्डी "


ऑस्टियोपोरोसिस ( अस्थिक्षरण ) एक ऐसा रोग है जिसमें हड्डियों का घनत्व घट जाता है । हड्डियों की मोटाई सामान्य से कम हो जाती है । इसके परिणामस्वरूप पूरे शरीर की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं । रीढ़ की हड्डी भी इसी कारण चटख जाती है ।

हड्डियों में दर्द होना ऑस्टियोपोरोसिस का एक सामान्य लक्षण है । लेकिन लक्षण का पता प्रायः नहीं चल पाता है । इस रोग में मांस पेशियों पर एकाएक जोर पड़ने पर कभी भी शरीर के किसी भी हिस्से की हड्डी टूट सकती है । ऐसी ही समस्या का सामना वर्टिब्रल कॉलम यानी रीढ़ की हड्डी को भी करना पड़ता है । इसके रोगियों की कूबड़ निकली हुई हो सकती है । वर्टिब्रा के ध्वस्त होने से शरीर के निचले हिस्से के अंग पक्षाघात के शिकार हो सकते हैं । दूसरी कमजोर जगह जांघ की हड्डी है यह भी बिना किसी कारण के ही उठते अथवा बैठते ही टूट जाती है ।


बुढ़ापे में होता है वजन कम -

ऑस्टियोपोरोसिस के कारण ही बुढ़ापे में लोगों का वजन कम होने लगता है । असमय में मीनोपॉज होना या किसी वजह से अंडाशय को निकलवा देना या उसका खराब हो जाना ऑस्टियोपोरोसिस के महत्वपूर्ण कारण हैं । यहां तक कि सामान्य मीनोपॉज के बाद भी , आगे के 15 वर्षों में हड्डियों से काफी कैल्शियम निकल जाता है जिसके परिणामस्वरूप महिलाएं ऑस्टियोपोरोसिस की शिकार हो जाती हैं । अगर तमाम सावधानियों के बावजूद फैक्चर हो ही जाए तो तुरंत इलाज के लिए आगे बढ़े , बजाय घरेलू उपाय करने के ।


यह एक खामोश रोग है -

ऑस्टियोपोरोसिस को एक खामोश रोग कहा जाता है क्योंकि हड्डी फैक्चर होने से पहले तक आम तौर पर इसके कोई भी लक्षण प्रकट नहीं होते । अक्सर ही यह फैक्चर स्पाइन , नितंब या कलाई में होता है । जहां तक पुरुषों का सवाल है , तो उनके सेक्स हॉर्मोन में अचानक कमी नहीं आती , बल्कि वह 70 साल की उम्र तक बना रहता है । इससे पुरुष आम तौर पर ऑस्टियोपोरोसिस से बचे रहते हैं ।


कम सेक्स हॉर्मोन वाले युवा पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम बहुत अधिक होता है और उन्हें इसे लेकर सतर्क रहना चाहिए ।



पुरुष और महिलाओं को एक समान है जोखिम -


पुरुषों और महिलाओं को इससे संबंधित कई एक समान खतरे हैं । पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम और विटामिन डी का न मिलना खतरे को बढ़ाता है क्योंकि ये पोषक तत्व हड्डी को होने वाले नुकसान से बचाते हैं । वजन घटाने वाले व्यायामों का अभाव भी खतरे को बढ़ा सकता है क्योंकि इन गतिविधियों से हड्डी का घनत्व बढ़ता है ।


बोन डेंसिटी की जांच जरूर कराएं -

पुरुषों को 45 वर्ष की उम्र के बाद बोन मिनरल डेंसिटी ( बीएमडी ) टेस्ट करवाना चाहिए और अगर हड्डी का आकार छोटा हो तो हड्डियों को होने वाले नुकसान को रोकने और फ्रक्चर के खतरे को कम करने के लिए दवा लेने के संबंध में डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए । यह एक ऐसा रोग है जो चुपके से वार करता हैं और मरीज़ जब तक संभलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । इसलिए थोड़ा संकेत मिलते ही चिकित्सक की सेवाएं लेने में देर नहीं करनी चाहिए और अगर तमाम् सावधानियों के बावजूद चिर हो ही जाए तो काफोप्लास्टी सर्जरी ही दर्द समाप्त करने और हड्डियों को जोड़ने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है ।


कैसे काम करती है काइकोप्लास्टी -

इस सर्जरी के अंतर्गत पीठ की ओर से एक बहुत ही छोटा चीरा लगाया जाता है जिसके माध्यम से चिकित्सक एक पतली सी नली डाल देता है । फ्लूरोस्कोपी का प्रयोग करते हुए नली को सही स्थान तक पहुंचा दिया जाता है । एक्स रे छवियों का प्रयोग करते चिकित्सक अब नली के माध्यम से एक विशेष बैलून वर्टिब्रा तक पहुंचाता है और बड़ी ही सावधानी से बैलून को लाता है । 
फूलने के साथ ही बैलून फैक्चर को ऊपर उठा देता है जिससे टुकड़े अधिक सामान्य स्थिति में आ जाते हैं । इससे अंदर की कोमल ही भी ठोस हो जाती है और वर्टिब्रा के अंदर एक कैविटी का निर्माण हो जाता है । इसके बाद बैलून को हटा लिया जाता है । चिकित्सक इस कैविटी को सीमेंट जैसे पदार्थ से भर देते हैं । यह सीमेंट तेजी से कड़ा हो जाता है जिससे हञ्जियो स्थिर हो जाती हैं ।

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