उपदंश - सिफिलिस [ Syphilis ] की समस्या क्यों हो जाती है ? क्या है इसके कारण व् इलाज ? Syphilis - Why is the problem of syphilis? What is the reason and treatment?

उपदंश - सिफिलिस [ Syphilis ] 

उपदंश - सिफिलिस [ Syphilis ] की समस्या क्यों हो जाती है ? क्या है इसके कारण व् इलाज ? Syphilis - Why is the problem of syphilis? What is the reason and treatment?
syphilis


पर्याय — आतशक , गर्मी , फिरंग । गर्मी की बीमारी सामान्य भाषा में । 

परिचय - एक स्पाइरोकीट ट्रेपोनेमा पैलिडम द्वारा उत्पन्न एक संक्रामक , जीर्ण रजित रोग जिसमें बहुत सी त्वचा पर विक्षतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं परन्तु शरीर का कोई भी अंग अथवा ऊतकग्रस्त हो सकता है ।

प्रधान कारण -
• प्रत्यक्ष लैंगिक सम्पर्क । 

• संक्रमित रक्त अथवा प्लाज्मा के आधान या संक्रमित पदार्थ से सम्पर्क होने से अथवा गर्भाशय में जीवाणुओं के माता से भ्रूण में पहुँचने से संचारित होता है । 

• जीवाणु त्वचा या श्लैष्मिक झिल्ली में स्थित किसी भी कटी - फटी जगह से प्रवेश कर जाता है । 


याद रखिये - आतशक वाली स्त्री के साथ सम्भोग करने से पुरुष को और आतशक वाले पुरुष के साथ संभोग करने से स्त्री को यह रोग लग जाता है । यह एक संक्रामक रोग है जो अधिकतर वेश्यागमी पुरुषों को होता है ।

 कभी - कभी झूठे बर्तनों से जैसे किसी व्यक्ति के होठों पर व्रण हो गया हो और उसने किसी पात्र में पानी पिया हो तो उसी पात्र में दूसरे के पानी पीने से यह रोग हो सकता है । 

• अधिकांश रूप से यह रोग दूषित हुक्का , सिगरेट , बीड़ी अथवा चुम्बन द्वारा भी हो सकता है ।

प्रधान लक्षण -
रोग के लक्षणों को 3 अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है ,

प्रारम्भिक अवस्था - संक्रमण के 2 4 सप्ताह बाद अधिकतर शिश्न अथवा भग पर परन्तु त्वचा या श्लैष्मिक झिल्ली पर किसी भी स्थान पर एक विक्षति उत्पन्न होती है जो एक छोटी लाल पिटिका या फंसी से छोटे से जख्म में और फिर कठोर शैंकर में बदल जाती है जो संक्रामक एवं वेदना रहित होता है । विक्षति के उत्पन्न होने के लगभग 2 सप्ताह पश्चात् लसीका ग्रन्थियाँ कठोर हो जाती हैं एवं बड़ी हो जाती हैं ।

द्वितीयक अवस्था - कठोर औंकर के बनने के लगभग 6 सप्ताह पश्चात् धड़ एवं भुजाओं पर बहुरूपी त्वचा विस्फोट निकल आते हैं । गुदा के किनारे या भग पर अथवा स्तनों के नीचे मांसगुल्म ' या ‘ कण्डाश्लोमा ' बन सकता है । गर्दन की त्वचा सफेद सी प्रतीत होने लगती है । जिसके साथ जगह - जगह पर सफेद दाग हो जाते हैं । पूरे शरीर से अथवा चकत्ते के रूप में बाल झड़ जाते हैं । क्षेत्रीय लसीका ग्रन्थियाँ बड़ी एवं कठोर हो जाती हैं । 

• सिर में दर्द , बुखार , व्याकुलता या । घबराहट तथा गला खराब होना आम बात है । जोड़ों तथा अस्थ्यावरण में तेज दर्द भी हो सकता है ।

तृतीयक अवस्था - द्वितीयक अवस्था के कुछ वर्ष पश्चात् यह आरम्भ होती है । इस अवस्था में गमा बनना एक विशिष्टता होती है जो शरीर के प्रत्येक भाग में बन सकता है । इसके फूटने पर ऐसा जख्म बन जाता है जैसे किसी ने बर्मे से छेद कर दिया हो । हृदय एवं रक्तवाहिनियाँ तथा केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र अधिकतर ग्रस्त होते हैं ।

रोग की पहिचान -
• जननेन्द्रिय पर शोथ एवं लालीरहित । व्रण हो तो उसे उपदंश का व्रण समझना चाहिये । 

• इसी प्रकार शरीर के दूसरे भागों में चिरस्थायी तथा पीड़ारहित व्रण मिलने पर इसी रोग की सम्भावना व्यक्त की जाती है ।

रोग का परिणाम -
• आधुनिक एण्टीबायोटिक औषधियों से चिकित्सा करने पर रोग पूर्णतया ठीक हो जाता है । 

• शरीर का कोई भी तन्तु , कोई अंग , उपांग ऐसा नहीं जहाँ इस अवस्था में विकार पैदा न हो सके ।

नोट - हडिडयाँ , यौन ग्रन्थियाँ , यकृत , रक्तवाहिनी नलियाँ , मस्तिष्क , फेफड़े , ह्रदय सभी में । भयंकर स्थायी एवं दुःसाध्य परिवर्तन हो जाते हैं जो अन्ततः मौत का कारण बनते हैं । हार्ट ( दिल ) की अनेक व्याधियाँ , लकवा ( पक्षाघात ) , मस्तिष्क सम्बन्धी विकार आदि उत्पन्न होकर वृद्ध रोगी इस व्याधि के कारण ही इस संसार से कूच कर जाते हैं ।

चिकित्सा विधि → 
• स्वस्थ व्यक्ति आतशक वाले व्यक्ति से मैथुन न करे । 

• आतशक के प्रथम लक्षण उत्पन्न होने के बाद तुरन्त ही इसकी चिकित्सा करनी चाहिये । आतशक के रोगी को पहले जुलाब देकर पेट साफकर देना चाहिये । दवा सेवन के बीच - बीच में भी जुलाब देना उचित है ।

पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा -
• रोगी के दिल और दिमाग को पूर्णतः शान्त रखना चाहिये । 

• चने की रोटी , मूंग की दाल , परवल और तरोई का शाक रोगी का पथ्य है । अरहर की दाल बिना मसाले की दें । बकरी के मांस का शोरबा चपाती के साथ दें । बिना नमक के चने की रोटी सबसे उत्तम है । 

• बैंगन , मटर , सेम , गुड़ और खट्टे पदार्थ नहीं खाने चाहिये ।

•• प्रायः देखा गया है कि गर्मी के कारण जननेन्द्रिय मुण्ड फूल जाता है और इस हालत में चर्म उलटा नहीं जा सकता फलतः घाव भीतर ही भीतर सड़कर गलने लगता है । यदि चर्म न उलटा गया हो और सूजन आ गई हो तो गर्म पानी में जरा सा पोटास आफ परमैंगनेट मिलाकर धोना चाहिये । 

नोट – कागजी नीबू के अलावा कोई खट्टी चीज नहीं देनी चाहिये ।


•• आतशक की औषधि चिकित्सा -

• प्रारम्भिक सिफलिस में ‘ फोर्टीफाइड प्रोकेन पेनिसिलीन का 8 लाख यूनिट का एक इन्जेक्शन प्रतिदिन 10 दिन तक लगाना चाहिये । इन्जेक्शन नितम्ब की गहरी पेशी में दें । अथवा प्रोनापेन ( Pronapen ) नि . ‘ फाइजर ' 4 लाख यूनिट की मात्रा में मांसपेशीगत दें ।

जिन रोगियों को पेनिसिलीन बर्दाश्त न हो उन्हें अन्य एण्टी वायोटिक दवायें दी जा सकती हैं परन्तु सिफिलिस के उपचार में केवल ' टेट्रासाइक्लीन ' तथा ' इरीथेमाइसिन ' ही पेनिसिलिन की स्थानापन्न हो सकती है । 

अतः टेट्रासाइक्लीन 250 मि . ग्रा . का एक - एक कैप्सूल प्रतिदिन चार - चार के हिसाब से 14 से 20 दिन तक सेवन कराना चाहिये । ‘ इरीथोमाइसिन 250 मि . ग्रा . की 1 - 1 टिकिया हर 6 घण्टे बाद । दी जाती है ।

• सिफलिस की द्वितीय अवस्था में – सिफलिस रोग लगने के एक से लेकर पाँच वर्ष के अंदर यदि चिकित्सा की जाये तो पेनिसिलीन का सेवन दो गुनी मात्रा में करना पड़ता है । इस दशा में फोर्टीफाइड प्रोकेन पेनिसिलीन 800 , 000 यूनिट का एक इन्जे . नितम्ब की पेशी में 16 - 20 दिन तक रोजाना लगाना चाहिये । 

• रोगी को रक्त की जाँच हर महीने करनी चाहिये । आमतौर पर तीसरे महीने के अन्त तक शरीर में जीवाणु समाप्त हो जाते हैं परन्तु यदि ऐसा पता लगे कि बीच में एक बार जीवाणु कम होकर फिर बढ़ गये हैं तो पुनः एक कोर्स पेनिसिलीन उपचार का होना चाहिये ।

• जब सिफलिस का उपचार देर से कराया जाय तब - बाई सौक्सिल ( Bisoxyl ) का एक - एक इन्जेक्शन नितम्ब के ऊपरी भाग में काफी गहराई में हर सप्ताह में केवल एक बार के हिसाब से 4 सप्ताह तक लगाना चाहिये । कोर्स पूरा होने के बाद पाँचवें सप्ताह से पेनिसिलीन देना चाहिये । इसके लिये प्रतिदिन 6 लाख से लेकर 8 लाख यूनिट का फोर्टीफाइड पेनिसिलीन का एक - एक इन्जे . 15 दिन तक लगाना चाहिये । यदि आवश्यकता हो तो 6 महीने बाद फिर इसी प्रकार चिकित्सा कोर्स किया जा सकता है ।

• सिफलिस में सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल •

1 . पेनिसिलीन टेबलेट ( Penicillin Tab . )  -   2 - 4 टिकिया नित्य दें । 

2 . टेट्रासाइक्लीन हाइड्रोक्लोराइड ( कई कं )  -  1 - 2 कै . प्रति 4 घण्टे पर । 14 दिन तक दें ।
नोट - पेनिसिलीन माफिक न आने पर । 

3 . एम्पीसिलीन ( Ampicillin ) 500 मि . ग्रा . कै .  -  1 कै . प्रति 4 घण्टे पर ।

4 . इरीथ्रोमाइसीन ( Erythromycin ) -  1 टि . प्रति 4 घण्टे पर दें ।

5 . सैण्डोसाइक्लीन ( Saadocyclin )  -  1 - 2 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें । 

6 . लीडरमाइसीन ( Leadermycin ) लीडलें - 1 - 1 कै . प्रति 4 घण्टे पर दें । 

7 . सेप्ट्रान ( Septran ) वरोजवैल्कम  -  1 - 1 टि . दिन में 3 बार दें ।

8 . वैक्ट्रिम ( Bactrim ) रोशे  -  1 - 1 टि . दिन में 3 - 4 बार दें । 

9 . क्लोरोमाइसेटिन ( Chloromycetin )  -  नये रोग में 2 कै . दिन में 2 बार दें ।

10 . डॉक्सी - 1 ( Doxy - 1 ) यू . एस . वी . एण्ड 6 6 6 पी   -  प्रारम्भ में 2 कै . देकर फिर 1 कै . नित्य देते हैं ।

11 . सुप्रोनल ( Supronal ) ' वेयर  -  1 - 2 टि . दिन में 3 - 4 बार । ।

12 . टैरामाइसीन ( Terramycin ) फाइजर 250 - 500 मि . ग्रा .  -  1 - 1 कै . प्रति 4 घण्टे पर रोगानुसार दें ।

13 . एमोक्सीवॉन ( Amoxivan ) खण्डेलवाल  -  250 - 500 मि . ग्रा . दिन में 2 बार दें । 

14 . 250 , 500 मि . ग्रा . के . एमोक्सीबिड ( Amoxybid ) ' विडल शायर ' ( ड्राई सीरप भी )  -  250 - 500 . मि . ग्रा . दिन में 2 बार दें ।

15 . एम्पीलॉक्स ( Ampilox ) बायोकेम  -  1 कै . दिन में 4 बार दें ।

16 . कोमोक्सिल ( Comoxyl ) कन्सेप्टर  -  1 - 2 कै . दिन में 2 बार दें ।

    
•• सिफलिस में सेवन कराने योग्य अपडेट ऐलो . पे . इन्जेक्शन ••

1 . एम्पिलॉक्स ( Ampilox ) ' बायोकेम  ( 250 मि . ग्रा . वायल ) - 1 वायल की सुई चूतड़ के गहरे मांस में प्रतिदिन 2 बार लगायें । 

2 . पेनिड्यूर एल ए - 12 ( Penidure LA - 12 ) ' वाईथ  -  1 सुई गहरे मांस में सप्ताह में 1 बार 4 से 7 इन्जे . तक ।

नोट - इसके साथ पेण्टिड्स ( साराभाई ) । 2 - 3 बार प्रतिदिन दें । 

3 . क्रिस्टेलाइन पेनिसिलीन जी  -  4 लाख यूनिट की 1 टि . 5 लाख यूनिट डिस्टिल्ड वाटर 2 - 3 मि . ली . में धोलकर प्रातः और रात को मांस में लगावें । 

4 . टेरामाईसिन ( फाइजर )  -  3 मि . ली . ( 250 मि . ग्रा . ) के एम्पुल की सुई धीरे - धीरे शिरा में प्रतिदिन लगायें ।

5 . केनामाइसिन ( Kanamycin ) ‘ बायोकेम  -  1 ग्राम विवरण पत्र के अनुसार दें ।

नोट - एलेम्बिक कं , ने इसे केनासिन नाम से बनाया है ।  -  

6 . इस्केसिलिन ( Eskaycillin ) S . K . F . 250 - 500 मि . ग्रा . -  250 मि . ग्रा . से / 1 ग्रा . प्रति 6 घण्टे पर मांस में । 

7 . क्लेफोरान ( Claforan ) रसिल 250 मि . ग्रा . की वायल 55 - 1 - 2 ग्राम मांस अथवा नस में प्रति 12 घण्टे पर । 

8 . क्रिस - 4 ( Crys — 4 ) साराभाई  -  विवरण पत्र के अनुसार दें । 

9 . बोअसिल ( Broacil ) / DPL  -  250 - 500 मि . ग्रा . प्रति 4 – 6 घण्टे पर ।

10 . सेफेक्सिन ( Cephaxin ) बायोकेम 500 मि . ग्रा . / 1 ग्रा . वायल -  500 मि . ग्रा . से 1 ग्राम नित्य लगावें ।
  
नोट - ड्यूपेन ( Dupen ) फाइजर ' रोग और आयु के अनुसार 5 से 10 लाख यूनिट की नितम्ब के गहरे मांस में सप्ताह में 1 - 2 बार सुई लगावें । साथ ही फेनोसिन फोटे ( Fanocin forte ) 1 - 2 टिकिया 4 बार प्रतिदिन खिलावें । । 

** उपदंश होने पर सम्भोग करते समय इन्द्री पर चिकनाई युक्त निरोध अवश्य चढ़ा लें ।


० सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेण्ट सीरप / तरल -

1 . एम्पीलिन ड्राई सीरप ( लाइका )  -  1 - 2 चम्मच दिन में 2 - 3 बार ।

2 . एम्पीलॉक्स ड्राई सीरप ( बायोकेम )  -  बालक 1 चम्मच दिन में 3 - 4 बार दें ।

3 . बायोमोक्स ( Biomox ) ' वायोकेम ड्राई सीरप  -  250 - 500 मि . ग्रा . प्रति 8 घण्टे पर ।

4 . कोमोक्सिल ( Comoxyl ) ' कंसेप्ट ड्राई  सीख  -   2 - 2 चम्मच दिन में 4 बार दें ।

5 . फ्लेमोक्सिन सीरप ( Flemoxin Syrup ) नि . ईस्ट इण्डिया कं - 1 - 2 चम्मच प्रति 8 घण्टे पर ।
   
सिफलिस में उपयोगी व्यवस्थापत्र -

प्रारम्भिक सिफलिस में -

Rx 

• बेन्जाथीन पेनिसिलिन ( Benzathine Penicillin ) | 2 - 4 मैगा यूनिट्स । 
अथवा 

प्रोकेन पेनसिलिन जी ( आयल रूप में ) । | 4 : 8 मैगा यूनिट दिन में 1 बार एवं 1 . 2 मैगा यूनिट दिन में 2 बार x3 दिन तक । 

अथवा 

प्रोकेन पेनसिलिन जी ( Procain Penicillin G ) | 6 लाख यूनिट x नित्य 8 दिन तक ।

 दिन में 2 बार - निओ - स्पोरिन स्किन आयन्टमेण्ट । । लगाने के लिये । । 
• दिन में 2 बार ओरीप्रिम डी . एस ( Oriprim D . S . )  10 बजे एवं रात 8 बजे 1 टि , दिन में 2 बार । 

• दिन में 1 बार इन्जे . विटा , बी 12 ( Inj . Vit B12 ) 2 मि . ली . X मांस में ।

•• जीर्ण / चिरकालिक सिफलिस में ( Late Syphillis ) ••

Rx 

• यदि रोगी पेनिसिलिन के प्रति सेन्सिटिव न हो तो - बेन्जाथीन पेनसिलिन ( Benzathine Penicillin ) । 6 - 9 मेगा यूनिट विभाजित मात्रा में । । । 

• यदि रोगी पेनीसिलिन के प्रति सेन्सिटिव हो तो - इरीथ्रोमाइसिन ( Erythromycin ) 500 मि . ग्रा . । दिन में 4 वार x 3 - 4 सप्ताह तक । 

• 1 दिन छोड़कर – टेट्रासाइक्लीन 1 - 2 कै . दिन में 2 बार x 10 - 15 दिन तक ।


•• लक्षणों के अनुसार सिफलिस की चिकित्सा -

1 . गर्भवती स्त्री एवं पेनसिलिन के सेन्सिटिव रोगी में  -  प्रारम्भिक सिफलिस में ‘ इरीथ्रोमाइसीन 500 मि . ग्रा . दिन में 4 बार 15 दिन तक ।

2 . 1 वर्ष से अधिक का रोग होने पर  - इरीथ्रोमाइसीन 500 मि . ग्रा . दिन में 4 बार 30 दिन तक ।  

3 . पुस्तैनी या कंजेनीटल सिफलिस में  -  फोर्टीफाइड प्रोकेन पेनसिलीन एक वायल की 1 सुई 12 - 12 घण्टे पर या 24 घण्टे बाद मास में पूर्ण आराम होने तक लगायें । 

4 . आतशक से बचने के लिये  -  सम्भोग करने के तत्काल बाद लिंग की सुपारी का पर्दा हटाकर लिंग मुण्ड को सेवलॉन या एक्रोफ्लेवीन लोशन से साफ करके ' फाइजर ' कं की टैरामाइसीन स्किन । आइण्टमेण्ट को लिंग मुण्ड पर मलवा दें । इससे आतशक होने का भय नहीं रहता है 

5 . एन्जाइना की स्थति में  -  वे सोडाइलेटर्स ( Vasodilators ) का प्रयोग करें । 

6 . कार्डिट फेल्योर की स्थिति में [ Aortic ]  -  लेनोक्सिन की 1 / 2 - 1 टि . दिन में 1 या 2 बार दें तथा भूसेमाइड ( लासिक्स ) की 1 टि . दिन में 1 बार प्रातः सेवन करायें । 

7 . अयोटिक एन्यूरिज्म Ancurysm ) की स्थिति में  -   शल्य चिकित्सा प्रभावी । 

8 . टेबीज डोरसेलिस [ Tabes dorsalis ) →  ‘ विटामिन बी12 ' एवं ' एनाल्जेसिक का प्रयोग ।


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