मूत्रावरोध / मूत्र का रुक जाना [ Retention of Urine ] की समस्या से कैसे बच सकते है ? इस रोग के प्रमुख कारण , परिचय , लक्षण , एव चिकित्सा ? How can you avoid the problem of urinary retention? The major causes of this disease, introduction, symptoms, and therapy?

मूत्रावरोध / मूत्र का रुक जाना  [ Retention of Urine ] 


मूत्रावरोध / मूत्र का रुक जाना  [ Retention of Urine ]  की समस्या से कैसे बच सकते है ? इस रोग के प्रमुख कारण , परिचय , लक्षण , एव चिकित्सा ? How can you avoid the problem of urinary retention? The major causes of this disease, introduction, symptoms, and therapy?
by - BruceBlaus

परिचय - 

मूत्राशय में मूत्र इकट्ठा होकर यदि किसी रुकावट के कारण बाहर न निकल सके तो उसे मूत्रावरोध ( Retention of urine ) कहते हैं । 

• Retention of urine is inabilily to pass urine which has collected in the urinary bladder )

रोग के प्रमुख कारण -

• न्यूरोलोजिकल → स्पाइनल कार्ड के रोग , मल्टीप्ली स्क्लेरोसिस । । 

• मूत्र जननेन्द्रिय सम्बन्धी कारण→ 
1 . लिंग - फाइमोसिस 

2 . मूत्रमार्गीय ( Urethral ) → पोस्टी रियर यूरेथ्रल वाल्व , बाहरी पदार्थ ( Foreign Bodies ) , पथरी ( Stones ) , स्ट्रक्चर , विदीर्ण ( Repture ) , Spincter की ऐंठन आदि ।

3 . प्रोस्टेट ग्रिन्थ की वृद्धि । 

4 . मूत्राशय ( Bladder ) , ट्यूमर , पथरी एवं गर्भाशय का उलट जाना । । 

• औषधि - ' सालबुटामोल , टरबटालीन एण्टी कोलीनर्जिक ड्रग्स आदि ।  

• क्रियात्मक ( Functional ) ।


रोग के प्रमुख लक्षण -

• रोगी में बेचैनी । 

• वस्ति (
 मूत्र थैली ) में पीड़ा । 

• मूत्र थोड़ी मात्रा में पीड़ा के साथ । 

 अधिक समय तक मूत्र को रोकने से मूत्र त्याग करने पर मूत्र जल्दी नहीं उतरता , यदि उतरता भी है तो बहुत धीरे - धीरे आता ,

• नाभि के निचले भाग में तीव्र वेदनायुक्त आध्यमान ( गैस )। ।

• मूत्र का वेग रहने पर स्त्री के साथ सम्भोग करने वाले पुरुष का वायु दबाव के कारण वीर्य अपने स्थान से विकृत होकर मूत्र त्याग के पूर्व अथवा पश्चात् निकलता है जिससे मूत्र चूने के पानी के समान आता है । । 

• कभी - कभी मूत्र की विषैली चीजें खून के साथ मिलकर मस्तिष्क में विकार उत्पन्न कर देती हैं ।

•• नवयुवतियों में मूत्रमार्ग अथवा मूत्राशय में वाह्य पदार्थ की उपस्थिति , स्त्रियों में गर्भाशयगत् । अर्बुद ( गांठ ) एवं मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग में दबाव पड़ने से मूत्राशय में मूत्र रुक जाया करता है । । 

•• गनोरिया , एक्यूट यूरेथ्राइटिस , वेलेनाइटिस , प्रोस्टेट ग्रन्थि कासनोमा , सिस्टाइटिस , ब्लेडर स्टोन , भोजन में तरल की मात्रा कम , द्रव्य की शरीर से हानि , डिहाइड्रेशन , भोजन में शर्करा एवं नमक की अधिकता , कंजेस्टिव कार्डियक फेल्योर , लेफ्ट वेन्ट्रीकुलर फेल्योर , नेफ्राइटिस , कोलेजन डिजीज , यूरीमिया , सल्फोनामाइड्स एवं मरकरी आदि औषधियों तथा इन रोग के कारणों से यह रोग पैदा होता है ।


चिकित्सा सिद्धान्त -

• कारण का परित्याग दृढ़तापूर्वक करना चाहिये । विकृति का सही निदान कर मूत्रावरोध को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये । 

• मूत्रल ( डायोरेटिक्स ) ( 
ऐसे पदार्थ जिससे मूत्र का निर्माण अधिक होता है ), पाचन , और शामक ( कष्ट या पीड़ा कम करने वाली ) औषधि दें । । 

• उष्ण कटि स्नान ( 
सामान्य गर्म पानी से स्नान ) एवं मूत्र शलाका ( पतली पाइप जैसा यंत्र ) का प्रयोग कर मूत्र का उत्सर्ग ( त्याग ) करायें तथा क्षारीय और द्रव पदार्थ पीने को दें । 

मूत्र शलाका , by - BruceBlaus


• स्निग्ध विरेचन ( तेलिय युक्त जमी चिकनाई को गुदा या मल मार्ग से निकालना ) ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा -

• पुराने लाल चावल , उड़द की दाल का यूष , पुराना पेठा , परवल , खीरा , खजूर , कच्चा नारियल , दूध , दही और छाछ दें । 

• कटि स्नान ( 
शरीर के तापमान से कम तापमान के जल से ) का प्रयोग हितकर होता है । मल - मूत्र का वेग नहीं रोकना चाहिये । दौड़ना , रूखे और भारी पदार्थों का खाना हानिकर होता है । पेशाब लाने वाले पदार्थों का विशेष सेवन करना चाहिये । ।


अन्य उपाय -

• कल्मी सोरा + कपूर बराबर - बराबर लेकर पीस कर भीगी हुई रुई में लपेट कर नाभि के नीचे रखें और थोड़ी - थोड़ी देर पर 4 - 6 बूंद जल रुई पर डालते । जायें । 

• प्रतिदिन पोटास के हल्के घोल या एक्रिफ्लेविन ( 1 : 10000 ) या मरक्यूरोक्रोम ( 1 : 1000 ) के घोल से मूत्राशय प्रक्षालित ( 
शुद्ध करना, साफ करना ) करने के बाद मूत्रशलाका बदल देनी चाहिये । 3 - 4 दिनों तक इस क्रम से मूत्र का शोधन करते रहने से मूत्राशय का संकोच - सामर्थ्य ( सामान्य स्थिति में आना ) उत्पन्न हो जाता है और अपने आप मूत्र का उत्सर्ग होने लगता है ,


मूत्रावरोध की विशिष्ट औषधि चिकित्सा -

• डोरिल ( Doryl ) ' मर्क 1 / 2 - 1 टेबलेट दिन में 3 - 4 बार दें । अथवा फ्यूरीलिक ( Furilic ) का एक कैप्सूल 6 - 6 घण्टे पर ताजे जल के साथ दें । । 

• हैजा जैसे डिहाइड्रेशन ( जल की कमी ) वाले रोगों में मूत्र की उत्पत्ति ही रुक जाती है । ऐसी स्थिति में मूत्र की उत्पत्ति को बढ़ाना है । इसके लिये शिरा द्वारा जलीय औषधियाँ ( यथा - डेक्स्ट्रोज , सैलाइन , नार्मल सैलाइन ( N . S . ) , ब्लड प्लाज्मा ( Blood Plasma ) इत्यादि को देना होता है । पिट्यूट्रिन , प्रोस्टिाग्मीन , बेलाफोलिन इत्यादि का इन्जेक्शन देना चाहिये । शिरा द्वारा सोडा बाईकार्ब , सोडा साइट्रास , आदि की व्यवस्था करनी चाहिये । इसके साथ ही ‘ पुनर्नवा लिक्विड एक्स्ट्रक्ट 2 - 2 चम्मच की मात्रा में जल में मिलाकर दिन में 3 - 4 बार दें ।


तीव्र मूत्रावरोध की चिकित्सा ( Acute Retention of Urine Treat ment ) -

• स्थानीय उपाय ( Local measures ) -

पेडू ( हाइपोगैस्ट्रियम ) पर हाट वाटर बैग से सिकाई तत्पश्चात ' वाटर बाथ । रक्खें । इस क्रम से जारी रखने पर मूत्रावरोध दूर होता है । 

• कोलीनर्जिक एजेण्ट्स ( Cholinergic agents ) -

इन्जे . कार्बाकोल ( Inj . Carbachol ) 0 . 25 - 0 . 75 मि . ग्रा . X मांस में । 
नोट - यह औषधि ब्लैडर ( मूत्राशय ) को उत्तेजित करती है । ।

• केथेटेराइजेसन ( Cathetirisation ) -

यदि फिर भी मूत्रावरोध जारी रहे तब एक साधारण यूरीनरी कैथेटर ( पूर्ण एन्टी सेप्टिक सावधानी के साथ ) मूत्रनली में पास करना चाहिये । मूत्र निकल कर कैथेटर बाहर हो जाता है । आवश्यकतानुसार मूत्र निकालने के लिये कैथेटर का उपयोग पुनः किया जा सकता है । इसके लिये " self - Retaining Follys Catheter ” का उपयोग करना चाहिये ।

याद रखिये - एक बार केथैटेराइजेसन के बाद उतना ही तरल रोगी को देना चाहिये । इससे Urinary output अच्छा रहता है । 

• सुप्री - पूबिक एसपाइरेसन ( Supra - pubic Aspiration ) → यदि अवरोध ( Obstruction ) के कारण मूत्रनली से शलाका ( Catheter ) से मूत्र निकालना सम्भव न हो सके तो - ‘ प्यूबिक सिम्फाइसिस के एक दम ऊपर नीडिल से ( By per abdominal ) ब्लैडर को ( Needle Aspiration ) खाली कर लेना चाहिये । । 

नोट - दृढ़तापूर्वक एण्टीसेप्टिक सावधानी आवश्यक । ।

• सुप्री - पूबिक केथेटेराइजेसन ( Supra - pubic Catheterisation ) → जब पुनः केथेटेराइजेसन की आवश्यकता पड़े तब सुप्रापूबिक सिस्टोस्टोमी ( Suprapubic Cystostomy ) करनी चाहिये एवं कैथेटर यूरीनरी ब्लैडर में लगा रहने देना चाहिये । ।

कारण की चिकित्सा ( Treatment of Cause ) → अवरोध को शल्य चिकित्सा ( Surgically ) द्वारा दूर करना चाहिये । । 

नोट - इस चिकित्सा की आवश्यकता - ‘ प्रोस्टेटिक इनलार्जमेण्ट ' ( प्रोस्टेट वृद्धि ) , अथवा मूत्राशय की गर्दन की रुकावट ( Bladder neck obstruction ) में पड़ती है । ।


मूत्रावरोध में सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल -

1 . एल्डेक्टोन ( Aldactone ) ( सलें )  - 1 / 2 - 1 टेबलेट नित्य । आ . नु . 4 टे . नित्य । 

2 . एमीफू - 40 ( इल्डर ) - 1 टे . नित्य । आ . नु . 4 टे , तक । 


3 . एक्वामाइड ( Aquamide ) ( सनफार्मा ) - 1 टे . खाली पेट दिन में 3 बार एवं भोजन से 1 घण्टे पहले । । 

4 . डाइटाइड ( Dytide ) ( S . K . E ) - 2 टे . भोजनोपरान्त । । 

5 . फूसेलेक ( Fruselac ) ( लूपिन ) - 1 - 4 टेबलेट नित्य । 

6 . लेक्टोन ( Lactone ) ( सनफार्मा ) - 25 - 400 मि . ग्रा . विभाजित मात्रा में ।

7 . लेसीलेक्टोन 50 ( होचेस्ट ) - 1 - 4 टेबलेट नित्य । 

8 . लासिक्स हाई डोज ( होचेस्ट ) - विवरण पत्र के अनुसार । 

9 . स्पाइरोमाइड ( Spiromide ) ( सलें ) - 1 - 4 टेबलेट नित्य । । 

10 . यूरीस्पाज ( Urispas ) ( वाल्टरबुशनेल ) - 1 टेबलेट दिन में 3 बार । 

मूत्रावरोध में लगाने योग्य ऐलो . पेटेण्ट इन्जेक्शन -

1 . लासिक्स ( होचेस्ट ) - 20 - 80 मि . ग्रा . । नित्य माँस या नस में धीरे - धीरे । 

2 . एट्रोपीन सल्फ - 1 / 300 - 1 / 100 ग्रेन तक माँस में लगायें । । 


3 . कार्बाकाल ( बरोजवैल्कम ) - 1 / 200 ग्रेन 1 या 2 बार माँस या चर्म में । । 

4 . पिट्यूट्री ( Pituitry ) ( B . I . ) - 1 / 2 - 1 मि . ली . माँस में लगायें । । 

5 . हेक्सामिन ( Hexamin ) ( B . I . Co ) - ओपरेशन या प्रसव के कारण होने वाले मूत्रावरोध में 5 - 10 मि . ली . ( 40 % ) कुछ गरम करके नस में । ।

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