मूत्रावरोध / मूत्र का रुक जाना [ Retention of Urine ] की समस्या से कैसे बच सकते है ? इस रोग के प्रमुख कारण , परिचय , लक्षण , एव चिकित्सा ? How can you avoid the problem of urinary retention? The major causes of this disease, introduction, symptoms, and therapy?

मूत्रावरोध / मूत्र का रुक जाना  [ Retention of Urine ] 

मूत्रावरोध / मूत्र का रुक जाना  [ Retention of Urine ]  की समस्या से कैसे बच सकते है ? इस रोग के प्रमुख कारण , परिचय , लक्षण , एव चिकित्सा ? How can you avoid the problem of urinary retention? The major causes of this disease, introduction, symptoms, and therapy?


परिचय - मूत्राशय में मूत्र इकट्ठा होकर यदि किसी रुकावट के कारण बाहर न निकल सके तो उसे मूत्रावरोध ( Retention of urine ) कहते हैं । 

• Retention of urine is inabilily to pass urine which has collected in the urinary bladder )

रोग के प्रमुख कारण -
• न्यूरोलोजिकल → स्पाइनल कार्ड के रोग , मल्टीप्ली स्क्लेरोसिस । । 

• मूत्र जननेन्द्रिय सम्बन्धी कारण→ 
1 . लिंग - फाइमोसिस 

2 . मूत्रमार्गीय ( Urethral ) → पोस्टी रियर यूरेथ्रल वाल्व , बाहरी पदार्थ ( Foreign Bodies ) , पथरी ( Stones ) , स्ट्रक्चर , विदीर्ण ( Repture ) , Spincter की ऐंठन आदि ।

3 . प्रोस्टेट ग्रिन्थ की वृद्धि । 

4 . मूत्राशय ( Bladder ) , ट्यूमर , पथरी एवं गर्भाशय का उलट जाना । । 

• औषधि - ' सालबुटामोल , टरबटालीन एण्टी कोलीनर्जिक ड्रग्स आदि ।  

• क्रियात्मक ( Functional ) ।


रोग के प्रमुख लक्षण -

• रोगी में बेचैनी । 

• वस्ति में पीड़ा । 

• मूत्र थोड़ी मात्रा में पीड़ा के साथ । अधिक समय तक मूत्र को रोकने से मूत्र त्याग करने पर मूत्र जल्दी नहीं उतरता , यदि उतरता भी है तो बहुत धीरे - धीरे आता ,

• नाभि के निचले भाग में तीव्र वेदनायुक्त आध्यमान । ।

• मूत्र का वेग रहने पर स्त्री के साथ सम्भोग करने वाले पुरुष का वायु प्रकुपित हो जाता है । इससे अवरुद्ध किन्तु अपने स्थान से च्युत हुआ शुक्र मूत्र त्याग के पूर्व अथवा पश्चात् निकलता है जिससे मूत्र चूने के पानी के समान आता है । । 

• कभी - कभी मूत्र की विषैली चीजें खून के साथ मिलकर मस्तिष्क में विकार उत्पन्न कर देती हैं ।

•• नवयुवतियों में मूत्रमार्ग अथवा मूत्राशय में वाह्य पदार्थ की उपस्थिति , स्त्रियों में गर्भाशयगत् । अर्बुद एवं मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग में दबाव पड़ने से मूत्राशय में मूत्र रुक जाया करता है । । 

•• गनोरिया , एक्यूट यूरेथ्राइटिस , वेलेनाइटिस , प्रोस्टेट ग्रन्थि कासनोमा , सिस्टाइटिस , ब्लेडर स्टोन , भोजन में तरल की मात्रा कम , द्रव्य की शरीर से हानि , डिहाइड्रेशन , भोजन में शर्करा एवं नमक की अधिकता , कंजेस्टिव कार्डियक फेल्योर , लेफ्ट वेन्ट्रीकुलर फेल्योर , नेफ्राइटिस , कोलेजन डिजीज , यूरीमिया , सल्फोनामाइड्स एवं मरकरी आदि औषधियों तथा रोगकारक अवस्थाओं से यह रोग पैदा होता है ।


चिकित्सा सिद्धान्त -

• कारण का परित्याग दृढ़तापूर्वक करना चाहिये । विकृति का सही निदान कर मूत्रावरोध को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये । 

• मूत्रल ( डायोरेटिक्स ) , दीपन , पाचन , मूत्रवह स्रोतस और शामक औषधि दें । । 

• उष्ण कटि स्नान एवं मूत्र शलाका का प्रयोग कर मूत्र का उत्सर्ग करायें तथा क्षारीय और द्रव पदार्थ पीने को दें । 

• स्निग्ध विरेचन ।


पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा -

• पुराने लाल चावल , उड़द की दाल का यूष , पुराना पेठा , परवल , खीरा , खजूर , कच्चा नारियल , दूध , दही और छाछ दें । 

• कटि स्नान का प्रयोग हितकर होता है । मल - मूत्र का वेग नहीं रोकना चाहिये । दौड़ना , रूखे और भारी पदार्थों का खाना हानिकर होता है । पेशाब लाने वाले पदार्थों का विशेष सेवन करना चाहिये । ।


अन्य उपाय -

• कल्मी सोरा + कपूर बराबर - बराबर लेकर पीस कर भीगी हुई रुई में लपेट कर नाभि के नीचे रखें और थोड़ी - थोड़ी देर पर 4 - 6 बूंद जल रुई पर डालते । जायें । 

• प्रतिदिन पोटास के हल्के घोल या एक्रिफ्लेविन ( 1 : 10000 ) या मरक्यूरोक्रोम ( 1 : 1000 ) के घोल से मूत्राशय प्रक्षालित करने के बाद मूत्रशलाका बदल देनी चाहिये । 3 - 4 दिनों तक इस क्रम से मूत्र का शोधन करते रहने से मूत्राशय का संकोच - सामर्थ्य उत्पन्न हो जाता है और अपने आप मूत्र का उत्सर्ग होने लगता है ,


मूत्रावरोध की विशिष्ट औषधि चिकित्सा -

• डोरिल ( Doryl ) ' मर्क 1 / 2 - 1 टिकिया दिन में 3 - 4 बार दें । अथवा फ्यूरीलिक ( Furilic ) का एक कैप्सूल 6 - 6 घण्टे पर ताजे जल के साथ दें । । 

• हैजा जैसे डिहाइड्रेशन ( जल की कमी ) वाले रोगों में मूत्र की उत्पत्ति ही रुक जाती है । ऐसी स्थिति में मूत्र की उत्पत्ति को बढ़ाना है । इसके लिये शिरा द्वारा जलीय औषधियाँ ( यथा - डेक्स्ट्रोज , सैलाइन , नार्मल सैलाइन ( N . S . ) , ब्लड प्लाज्मा ( Blood Plasma ) इत्यादि को देना होता है । पिट्यूट्रिन , प्रोस्टिाग्मीन , बेलाफोलिन इत्यादि का इन्जेक्शन देना चाहिये । शिरा द्वारा सोडा बाईकार्ब , सोडा साइट्रास , आदि की व्यवस्था करनी चाहिये । इसके साथ ही ‘ पुनर्नवा लिक्विड एक्स्ट्रक्ट 2 - 2 चम्मच की मात्रा में जल में मिलाकर दिन में 3 - 4 बार दें ।


तीव्र मूत्रावरोध की चिकित्सा ( Acute Retention of Urine Treat ment ) -

• स्थानीय उपाय ( Local measures ) -

पेडू ( हाइपोगैस्ट्रियम ) पर हाट वाटर बैग से सिकाई तत्पश्चात ' वाटर बाथ । रक्खें । इस क्रम से जारी रखने पर मूत्रावरोध दूर होता है । 

• कोलीनर्जिक एजेण्ट्स ( Cholinergic agents ) -

इन्जे . कार्बाकोल ( Inj . Carbachol ) 0 . 25 - 0 . 75 मि . ग्रा . X मांस में । 
नोट - यह औषधि ब्लैडर ( मूत्राशय ) को उत्तेजित करती है । ।

• केथेटेराइजेसन ( Cathetirisation ) -

यदि फिर भी मूत्रावरोध जारी रहे तब एक साधारण यूरीनरी कैथेटर ( पूर्ण एन्टी सेप्टिक सावधानी के साथ ) मूत्रनली में पास करना चाहिये । मूत्र निकल कर कैथेटर बाहर हो जाता है । आवश्यकतानुसार मूत्र निकालने के लिये कैथेटर का उपयोग पुनः किया जा सकता है । इसके लिये " self - Retaining Follys Catheter ” का उपयोग करना चाहिये ।

याद रखिये - एक बार केथैटेराइजेसन के बाद उतना ही तरल रोगी को देना चाहिये । इससे Urinary output अच्छा रहता है । 

• सुप्री - पूबिक एसपाइरेसन ( Supra - pubic Aspiration ) → यदि अवरोध ( Obstruction ) के कारण मूत्रनली से शलाका ( Catheter ) से मूत्र निकालना सम्भव न हो सके तो - ‘ प्यूबिक सिम्फाइसिस के एक दम ऊपर नीडिल से ( By per abdominal ) ब्लैडर को ( Needle Aspiration ) खाली कर लेना चाहिये । । 

नोट - दृढ़तापूर्वक एण्टीसेप्टिक सावधानी आवश्यक । ।

• सुप्री - पूबिक केथेटेराइजेसन ( Supra - pubic Catheterisation ) → जब पुनः केथेटेराइजेसन की आवश्यकता पड़े तब सुप्रापूबिक सिस्टोस्टोमी ( Suprapubic Cystostomy ) करनी चाहिये एवं कैथेटर यूरीनरी ब्लैडर में लगा रहने देना चाहिये । ।

कारण की चिकित्सा ( Treatment of Cause ) → अवरोध को शल्य चिकित्सा ( Surgically ) द्वारा दूर करना चाहिये । । 

नोट - इस चिकित्सा की आवश्यकता - ‘ प्रोस्टेटिक इनलार्जमेण्ट ' ( प्रोस्टेट वृद्धि ) , अथवा मूत्राशय की गर्दन की रुकावट ( Bladder neck obstruction ) में पड़ती है । ।


मूत्रावरोध में सेवन कराने योग्य ऐलो . पेटेन्ट टेबलेट / कैप्सूल -

1 . एल्डेक्टोन ( Aldactone ) ( सलें )  - 1 / 2 - 1 टिकिया नित्य । आ . नु . 4 टि . नित्य । 

2 . एमीफू - 40 ( इल्डर ) - 1 टि . नित्य । आ . नु . 4 टि , तक । 

3 . एक्वामाइड ( Aquamide ) ( सनफार्मा ) - 1 टे . खाली पेट दिन में 3 बार एवं भोजन से 1 घण्टे पहले । । 

4 . डाइटाइड ( Dytide ) ( S . K . E ) - 2 टि . भोजनोपरान्त । । 

5 . फूसेलेक ( Fruselac ) ( लूपिन ) - 1 - 4 टिकिया नित्य । 

6 . लेक्टोन ( Lactone ) ( सनफार्मा ) - 25 - 400 मि . ग्रा . विभाजित मात्रा में ।

7 . लेसीलेक्टोन 50 ( होचेस्ट ) - 1 - 4 टिकिया नित्य । 

8 . लासिक्स हाई डोज ( होचेस्ट ) - विवरण पत्र के अनुसार । 

9 . स्पाइरोमाइड ( Spiromide ) ( सलें ) - 1 - 4 टिकिया नित्य । । 

10 . यूरीस्पाज ( Urispas ) ( वाल्टरबुशनेल ) - 1 टिकिया दिन में 3 बार । 

मूत्रावरोध में लगाने योग्य ऐलो . पेटेण्ट इन्जेक्शन -

1 . लासिक्स ( होचेस्ट ) - 20 - 80 मि . ग्रा . । नित्य माँस या नस में धीरे - धीरे । 

2 . एट्रोपीन सल्फ - 1 / 300 - 1 / 100 ग्रेन तक माँस में लगायें । । 

3 . कार्बाकाल ( बरोजवैल्कम ) - 1 / 200 ग्रेन 1 या 2 बार माँस या चर्म में । । 

4 . पिट्यूट्री ( Pituitry ) ( B . I . ) - 1 / 2 - 1 मि . ली . माँस में लगायें । । 

5 . हेक्सामिन ( Hexamin ) ( B . I . Co ) - ओपरेशन या प्रसव के कारण होने वाले मूत्रावरोध में 5 - 10 मि . ली . ( 40 % ) कुछ गरम करके नस में । ।

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