सुजाक [ Ganorrhoea ] रोग क्या है ? यह किस कारन होता है ? इससे किस प्रकार छुटकारा पाया जा सकता है ? What is the disease [Ganorrhoea]? What causes this? How to get rid of it?

सुजाक [ Ganorrhoea ] 




पर्याय – औपसर्गिक मेह , आगन्तुक मेह , व्रणमेह , उष्णवात , भूशोष्णवात , गोनोमेह , पूयमेह । अंग्रेजी में इसे गनोरिया तथा यूनानी में सोजाक ' या ' सुजाक ' कहते हैं । 

रोग परिचय - यह एक तीव्र स्वरूप का औपसर्गिक ( Infectious ) रोग है जिसमें मूत्र के साथ पीव का स्राव एवं मूत्रसंस्थान में ' शोथ के लक्षण होते हैं । इसमें पुरुष के मूत्रमार्ग तथा स्त्री के ' योनिमार्ग से पीव निकलता है ।

This is an infection of the Imucous membrane of Genito - urinary tract by * N . Ganorrhoeae .

रोग के कारण ( Causes of Disease ) -

यह रोग “ नाइसीरिया गोनोराई ” नामक जीवाणु द्वारा होता है । जीवाणु स्त्री और पुरुष के मूत्रमार्ग को संक्रमित करता है । 

-  यह जीवाणु ' कॉफी के बीज अथवा मनुष्य के गुर्दे की शक्ल के अत्यन्त सूक्ष्म जीव होते हैं ।
इस रोग में ग्रस्त स्त्री के साथ सम्भोग करने पर ये जीवाणु शिश्न के अंदर मूत्र मार्ग में घुस जाते हैं और अपनी संख्या में असाधारण रूप से वृद्धि करते हुए मूत्र - नलिका को खाने लगते हैं । जिससे पीघ बनने लगती है । रोगी व्यक्ति के साथ समागम करने के द - ब दिन के अंदर ही इस रोग के लक्षण दिखायी देने लगते हैं । 

इस रोग के कारण दो बिन्दुओं के सदृश्य आकार वाले जीवाणु गोनोकोकस हैं ।

याद रहे - सुजाक ( पूयमेह ) रोग से आक्रान्त स्त्री के साथ सम्भोग करने से स्त्री से पुरुष को तथा पूयमेह से ग्रस्त पुरुष के साथ मैथुन करने से इस रोग का संक्रमण हो जाता है । 

मूत्रमार्ग से पीव का स्राव होने के कारण इस रोग के ‘ पूयमेह ' कहते है ।

सुजाक के लक्षण -

नये रोग में -
• क्षोभ के कारण बार - बार लिंग का उत्थान । । 

• लींग के अग्र भाग में कण्ड एवं मूत्र त्याग के समय कष्ट । 

• धीरे - धीरे शिश्न मणि पर लाली एवं शोथ की उत्पत्ति । 

• मूत्र त्याग के समय असह्य पीड़ा एवं दाह । । 

• मूत्र मार्ग में दाह के परिणामस्वरूप रोगी में बेचैनी । 

• पुनः पुनः मूत्र का वेग होता है । 

• शिश्न तन जाता है तथा उससे ‘ स्राव ' आने लगता है । 

• कभी - कभी शोथ के कारण मूत्र मार्ग से रक्तस्राव । 

• कुछ केसिस में पीव अंदर ही सुखकर मूत्रमार्ग असाधारणतया अवरुद्ध । 

• मूत्रपथ का छिद्र संकुचित हो जाता है । 

• मूत्र दाह के साथ दो धाराओं में आता है । 

• हल्का बुखार , जाड़ा अथवा कंपकंपी एवं सिर दर्द का मिलना । 

• रात्रि में लिग के अधिक कड़ापन होने से नींद न आना । । 

• पेशाब साफ नहीं आता है और बूंद - बूंद कर होता है ।

रोग के पुराने होने पर -

• जलन एवं पीड़ा में कमी । पर पीव का स्राव जारी रहता है । 

• पीव गोंद की तरह सफेद एवं लसीला । । 

• कुछ केसिस में पीव आना बंद / अथवा उसका कम मात्रा में आना । कुछ समय बाद उसका पुनः चालू होना । 

नोट - यह क्रम महीनों अथवा वर्षों तक चलता रहता है । 

याद रहे — यह रोग उपदंश ( गरमी या आतशक ) का सहयोगी है । अंतर केवल इतना ही है कि उपदंश में ' लिंगेन्द्रिय की सुपारी के ऊपर घाव होते हैं,

रोग के विशिष्ट लक्षण -

पुरुषों में तीव्र सुजाक -

• मूत्र नली में पीड़ा / तत्पश्चात् मूत्र मार्ग से पीवयुक्त स्राव आता है जो बाद को ' Frankly Purulent में बदल जाता है । 

• 10 से 14 दिन तक जिन रोगियों की चिकित्सा नहीं की जाती , उनकी मूत्र नली में शोथ ( पोस्टीरियर यूरेथ्राईटिस ) उत्पन्न हो जाता है । । 

• सिर दर्द , Melaise , तीव्र नाड़ी तथा बुखार । । 

• मूत्रनली में अवरोध जो इसका प्रमुख उपद्रव,

स्त्रियो में सुजाक -

• इसमें गर्भाशय , गर्भाशय मुख , बर्थोलिन ग्लाण्ड्स तथा मूत्रनली प्रभावित होती है । 

• कमर में दर्द । । 

• बालिकाओं में यानि तथा योनिद्वार शोथ मिलता है । 

• निम्न उदर के दोनों ओर पीड़ा एवं बुखार ।  

• श्रोणि परीक्षा में दोनों पाश्र्यों में दाब वेदना ।  

• मूत्र बार - बार तथा पीवयुक्त ।

बालकों में→ बुखार से पीड़ित महिलाओं में उत्पन्न बच्चों में नेत्राभिष्यन्द ( Opthelmin Neonetorum ) की आशंका ।

रोग निदान ( Diagnosis )  → 

• अवैध मैथुन का इतिहास रोग निदान में सहायक होता है । 

• उपसर्ग के 3 - 7 दिन के अंदर मूत्र - त्याग में जलन एवं पीड़ा ।  

• मूत्र मार्ग से विशेष प्रकार के पीव का स्राव रोग निदान में सहायक । 

• पूय परीक्षा में जीवाणु विशेष की उपस्थति ( अन्तःकोषीय युग्म रूप में ) । 
वक्तव्य - उपरोक्त लक्षण एवं चिन्ह रोग निदान में सहायक होते हैं ।
सुजाक का रोगी जब चिकित्सा में आये तो उसके मूत्र मार्ग से निकलने वाले मवाद को तुरन्त लेबोरेटरी भेजकर यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि उसे इस रोग के साथ सिफलिस तो नहीं लग गई है । 

याद रहे - यदि रोगी के बयान से पता लगे कि रोगग्रस्त वेश्या से सम्भोग करने के बाद उसने अपनी पत्नी से भी सम्भोग किया है तो पति और पत्नी दोनों की चिकित्सा आवश्यक है ताकि भविष्य में एक - दूसरे को रोग न लगता रहे ।

रोग के उपद्रव ( Complications )  

पुरुषों में → 

• मूत्रमार्ग सन्धि शोथ ।  

• शिश्नमणि शोथ । 

• अष्ठीला रोग ।  

• शिश्न विद्रधि ।  

• वस्ति शोथ । ।  

• वृषण शोथ । । 

मिले - जुले उपद्रव   नवजात शिशु में — नेत्राभिष्यन्द ( कन्जंक्टिवाइटिस )

महिलाओं में → 

• भगोष्ठ शोथ । 

• मूत्रमार्ग शोथ । 

• योनि शोथ । 

• गर्भाशय ग्रीवा शोथ । 

• गर्भाशय शोथ । 

• उदर कला शोथ । 

• बीज गन्थि शोथ । 

• मासिक धर्म के विभिन्न विकार । 

• गर्भवती होने पर गर्भस्राव ।

वक्तव्य - यह एक हठीला रोग है किन्तु घातक नहीं , पर कठिनता से ठीक होता है । प्रारम्भ में यदि इसकी उचित चिकित्सा न की गई तो रोग आजीवन बना रहता है । 

० रोग का संक्रमण स्त्री - पुरुष दोनों में सम्पूर्ण प्रजनन अंगों को विकारग्रस्त कर देता है । 

० उदरावरण तथा नेत्र भी इसके संक्रमण से भयंकर रूप से ग्रस्त हो सकते हैं ।

बचने के उपाय

 मैथुन का सर्वथा त्याग । 

• वेश्या तथा व्यभिचारिणी स्त्री के साथ सम्भोग भूलकर भी न करें ।

• गलती हो जाने ( इन्फेक्शन लगने ) पर साबुन अथवा सेवलोन ' लोशन से जननेन्द्रिय को साफ कर पोटाशियम परमैंगेनेट ( 1 : 5000 ) घोल से मूत्र नली को साफ कर 2 % के प्रोटार्गल के घोल अथवा ' वेटाडीन का घोल की 20 - 30 बूंदें प्रविष्ट कराके 5 - 7 मिनट रोके रखें । साथ ही ‘ ओरीप्रिम की 1 टिकिया दिन में 2 बार खिलाते रहने से सुजाक होने का डर नहीं रहता,

आनुषंगिक चिकित्सा -

• रोगी को बिस्तर पर विश्राम दें । 

•  दौड़ना , नाचना , साईकिल चलाना आदि का त्याग । ।

•  दूध , नारियल जल तथा सोडावाटर पिलावें ।  

• मलावरोध की स्थति में ' मृदुरेचक की व्यवस्था । । 

• रोगी को कई बार 4 लीटर जल + 1 लीटर कच्चा दूध मिलाकर पिलावें ।  

• रोगी को प्रतिदिन स्नान आवश्यक ।

सुजाक रोगी के लिये पथ्य 

• शीघ्र पचने वाला हल्का एवं ठंडा भोजन / दूध , डबल रोटी , दूध में पकाया जौ का दलिया , मूंग की दाल , खिचड़ी एवं पतली चपाती । । 

• हरे शाकों में पालक , बथुआ , तुरई घिया । 

• दूध की लस्सी और नीबू का शर्बत हितकारी है ।

सुजाक रोगी के लिये अपथ्य   

• चाय , कॉफी , गरम मसाले तथा माँस मछली का सेवन , चटनी , अचार , लाल मिर्च , शराब , गुड़ - तेल आदि से बनी चीजें अपथ्य हैं ।

सुजाक चिकित्सा ( Treatment of Ganorrhoea )  

• प्रोकेन पेनिसिलीन - 3 - 5 मैगा यूनिट - मांसपेशीगत् - केवल 1 बार । । 

• एम्पीसिलीन - 3 - 5 ग्राम । एमोक्सीसिलीन 3 ग्राम + प्रोवेनीसिड 1 ग्राम 

• टेट्रासाइक्लीन 0 - 5 ग्राम - दिन में 4 बार - 7 दिन तक ।

• डोक्सीसाइक्लीन 100 मि . ग्रा . - दिन में 2 बार - 5 दिन तक । 

अथवा 

  स्पेक्टीनोमाइसिन 2ग्राम - आई . वी . ( I . V . ) । 

• सेफोक्सीटिन द ग्राम - मांसपेशीगत् + प्रोवेनीसिड 1 ग्राम । । 

अथवा 

  सेफोटेक्सीन - 1 ग्राम - मांसपेशीगत । ।  

• मूत्रनली के अवरोध ( Structure ) तथा फोड़े ( Abscess ) के लिये              - सर्जिकल चिकित्सा । ।
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डेविडसन्स प्रिंसिपल एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मेडिसन्स के अनुसार सुजाक की मेडिकल चिकित्सा  

Rx 

• प्रोकेन पेनीसिलीन 2 - 4 ग्राम - मांसपेशीगत + प्रोवेनीसिड 1 ग्राम - ओरली ( मुख द्वारा ) । । 

• एम्पीसिलीन - 2 ग्राम + प्रोवेनीसिड 1 ग्राम - मुख द्वारा ( पे . रसिस्टेन्ट ) 

• को - ट्रीमोक्साजोल 8 ( 480 mg ) - 1 टिकिया - 1 मात्रा । 

• को - ट्रीमोक्सालोल 5 ( 480 ) - 1 टिकिया - - 12 ए पर 3 मात्रा ।

रसिस्टेन्ट केसिस में -

• प्रोकेन पेनिसिलीन 4 - 8 ग्राम - मांसपेशीगत + प्रोवेनीसिड । ग्राम ओरली ( मुख द्रारा ) 

• एम्पीसिलीन 3 - 5 ग्राम + प्रावेनीसिड 1 ग्राम - मुख द्वारा । 

• स्ट्रेप्टोमाइसीन 2 या 4 ग्राम - मांसपेशीगत ( पेनीसिलीन ELERGY ) । 

जो रोगी पूर्ण रूप से रसिस्टेन्ट हों ( पेनीसिलीन से ) ---

० सेफेलोक्सीन 0@ 5 - 1 ग्राम - मांसपेशीग । 

० सिप्रोफ्लोक्सेसिन - 250 मि . I . - ओरली । 

० स्ट्रेप्टोमाइसीन 2 या 4 ग्राम - मांसपेशीगत ( पेनीसि . एलर्जिक रोगी ) । 
उपद्रव युक्त रोगी में ( With Complication Needs ) ---

० एम्पीसिलीन 2 ग्राम + प्रोवेनीसिड / ग्राम / तत्पश्चात् 

० एम्पीसिलीन - 500 मि . ग्रा . + गेवेनीसिड 500 मि . ग्रा दिन में 4 बार - 14 दिन तक । ।

→ अपने देश में वेश्याओं पर सरकारी पाबन्दी लगने के कारण अब यह रोग न के बराबर रह गया है ।
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व्यवस्था पत्र ( Preseription Notes )  

RX 

1 . एम्पीसिलीन ( एलवसिलिन ) कैप्सूल 500 मि . ग्रा .  6 कैप्सूल - 1 मात्रा + वेनेमिड टेबलेट ( M . S . D . ) 5 ग्रा . टेबलेट । 2 टिकिया * ओरली । 

2 . वैक्ट्रिम या सेप्ट्रॉन 4 टिकिया – प्रति 12 घण्टे पर । ऐसी 4 मात्रा तक ( 2 दिन तक ) । 

3 . सिट्रालिका ( P . D . ) 4 चम्मच ( 20 मि . ली . ) - - दिन में 4 बार ।

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एक अनुभूत व्यवस्थापन्न   

RX 

1 . टेट्रासाइक्लीन अथवा एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा . 1 कैप्सूल - दिन में 4 बार - 5 दिन तक । 

अथवा 

रिफाम्पिसीन 15 मि . ग्रा . कैप्सूल - 3 कै . प्रातः नाश्ते से । । तत्पश्चात् 3 कै . - शाम - 3 दिन तक । 

2 . को - ट्राईमोथेक्साजोल ( Co - Trimothexazole ) व्या . नाम वैक्ट्रिम या ओरीप्तिम या सेप्ट्रान 
मात्रा - पहले दिन 3 टिकिया प्रातः - 3 टिकिया शाम 12 घण्टे  के अन्तर पर । अगले दिन 2 टिकिया प्रातः - 2 टिकिया शाम - 1 सप्ताह तक ।

इस औषधि के सेवन काल में रोगी को जल अधिक पिलावें । 

3 . अल्कासोल ( नि . स्टेडमेड ) 5 - 10 मि . ली . - 3 - 4 बार - नित्य । । | 

अथवा 

सिट्रालिका लिक्विड ( नि . पी . डी . ) 20 - 30 मि . ली . दिन में 4 बार । । 

4 . मवाद तथा जलन की अधिकता ---
एफ्रीफ्लेबीन 15 मि . ग्राम + नार्मल सैलाइन 30 मि . ली . से मुत्र नलिका को धोयें । तत्पश्चात् पेनिसिलीन इन्जेक्शन नार्मल सैलाइन में घोलकर मूत्रमार्ग में चढ़ा दें । रोगी इसे कुछ समय तक रोके रहे । 

याद रखिये - यदि मवाद की अधिकता नहीं है तो मूत्रनलिका को धोने आदि की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती । 

• रोग ठीक होने के बाद भी । 1 सप्ताह तक चिकित्सा जारी रखें , ताकि रोग पुनः न हो सके ।
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• सुजाक की लक्षणानुसार अनुभूत चिकित्सा व्यवस्था ---

1 . सुजाक की प्रारम्भिक अवस्था में एण्टीबायोटिक चिकित्सा --- ‘ प्रोकेन पेनिसिलीन 4 - 8 लाख यूनिट - मांसपेशीगत् दिन में 1 बार 2 दिन तक । अथवा - प्रो . पेनिसि . 24 लाख यूनिट - मांसपेशीगत् दिन में 1 बार - 2 दिन तक ।

 चूंकि मात्रा अधिक होती है अतः आधी - आधी मात्रा दोनों नितम्बों ( Buttucks ) में लगावें । । 

याद रहे - यदि रोगी को साथ में सिफिलिस भी हो तो पेनिसिलीन के यह दोनों इन्जेक्शन ही इसके लिये भी पर्याप्त होते हैं । 

अथवा - 

" टेट्रासाइक्लीन कै . " ( टैरामाइसीन ‘ फीजर ) 250 मि . ग्रा . के 6 कै . तत्काल । तत्पश्चात् 2 कै . दिन में 4 बार - 4 दिन तक । पूर्ण मात्रा - 10 ग्राम । । 

• गर्भावस्था में इसका प्रयोग न करें ।

2 . बवैक्टीरियोलजिस्ट की रिपोर्ट पर कि पेनिसिलीन रोगी पर प्रभावहीन है तब अथवा रोगी पेनिसिलीन के प्रति सेन्सिटिव है ।  --- ' टेट्रासाइक्लीन ' अथवा ' एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा . का 1 - 1 कै . - दिन में 4 बार - 7 दिन तक दें । अथवा - ‘ रिफाम्पिसिन ' 150 मि . ग्रा . कैप्सूल - इसके 3 कै . प्रात : नाश्ते के साथ - 3 कै . शाम - 3 दिन तक लगातार । । अथवा - ‘ एम्पीसिलीन ' ( एलवर्सलीन ) 500 मि . ग्रा . 6 कै . । खुराक में + वेनेमिड ( M . S . D . ) 2 टिकिया मुख द्वारा । ।

3 . उपद्रवयुक्त गोनोकोकल इन्फेक्शन ( Complicated Gonococcal Infection ) --- → इन्जे , ‘ एक्वस प्रोकेन पेनिसिलीन जी 10 - 20 लाख यूनिट - नित्य - 2 सप्ताह तक । अथवा कै . टेट्रासाइक्लीन 250 मि . ग्रा . 2 कै . - नित्य - 4 बार - 10 दिन तक । अथवा – एम्पीसिलीन 2 ग्राम तत्काल + वेनेमिड 1 ग्राम तत्काल । ।

• उपरोक्त किसी एक के प्रयोग के बाद - ' एम्पीसिलीन 500 मि . ग्रा . – प्रति 6 घण्टे पर - 10 दिन तक ।

4 . प्रसत सुजाक से क्रमण ( Disseminated Qonococcal infection ) --- → ' एम्पीसिलीन ' 3 - 5 ग्राम + वेनेमिड 1 ग्राम दें । तत्पश्चात् - ‘ एम्पीसिलीन 0 - 5 ग्राम - दिन में 4 बार - 7 दिन तक । । अथवा - ' टेट्रासाइक्लीन कै . 05 ग्राम ( 500 ml ) - दिन में 4 बार - 7 दिन तक ।

• गर्भावस्था में प्रयोग न करें ।  

विशेष उपयोग - ‘ प्रोस्टेट ग्रन्थशोथ , ‘ इपीडिडिमाइटिस ' , गर्भाशय ग्रीवाशोथ , ‘ सल्पिन्जाइटिस ' आदि उपद्रवों में विशेष उपयोगी है । अथवा - ‘ इरीथ्रोसिन ' 05 ग्राम – मुख द्वारा – दिन में 4 बार - 7 दिन तक ।अथवा - इन्जे . ' एक्वस ' क्रिस्टेलाइन पेनिसिलीन ' 10 लाख यूनिट प्रतिदिन चिकित्सालय में भर्ती रोगी में । लाभ मिलने पर - ‘ एम्पीसिलीन 0 @ 5 ग्राम - दिन में 4 बार 7 दिन तक । 

5 . गोनोकोकल अर्थाइटिस उष्णवात । जन्य जोड़ों की सूजन --- → ‘ एक्रोमाइसीन ( लीडलें ) 100 से 500 मि . ग्रा . प्रति 12 घण्टे बाद आई . वी . ( IV ) अथवा ' स्ट्रेप्टोपेनिसिलीन - नित्य 1 इन्जे . 6 दिन तक लगावें । साथ ही इस्जीपाइरीन ( सीवा - गायगो ) 1 एम्पुल की सुई नित्य मांस में लगावें / अथवा ब्रुफेन 600 या ' इबूकोन - 400 ( Ibucon - नि . कन्सेप्ट कं ) की 1 टिकिया । दिन में 2 बार 7 दिन तक दें । साथ ही ‘ डायथर्मी शोर्टवेव अथवा इन्फ्रारेडहीट का प्रयोगकरें ।

6 . आइराइटिस ( Iritis ) --- → इन्जे . स्ट्रेप्टोमाइसीन 1 ग्राम - मांस में नित्य 7 दिन तक / अथवा टेट्रासाइक्लीन 250 मि . ग्रा . का 1 कै . दिन में 4 बार 7 दिन तक दें । 

गम्भीर अवस्था ( Serious Condition ) में - ' 10 हाइड्रोकार्टीजोन एसीटेट ' आइन्टमेण्ट अथवा डूप्स या ' निओस्पोरिन आइन्टमेण्ट / अथवा ' फीनोसल्फ आई ड्राप्स की2 बूंद दिन में 2 बार डालें ।

7 . नवजात शिशु के नेत्राभिष्यन्द में  --- →0 - 10 % गर्म नार्मल सैलाइन से आँखें धोयें । ‘ एल्बूसिड ' अथवा ' लोकुला की कुछ बूंदें दोनों आँखों में प्रति 4 घण्टे पर डालें । 

8 . लिंग के घाव में --- → लिंग को अंदर से किसी लोशन ( वेटाडीन लोशन आदि ) से साफकर ‘ ओरियोमाइसीन अथवा ' निओस्पोरिन स्किन आइण्टमेन्ट दिन में 2 बार लगावें ।

9 . नये और पुराने सुजाक रोगी की ।  पेटेन्ट चिकित्सा --- ‘ प्रोकेन पेनिसिलीन ' 6 लाख यूनिट - मांसपेशी में 2 इन्जे . पर्याप्त । प्रतिरोधी अवस्था में - ' स्ट्रेप्टोमाइसीन 1 ग्राम प्रतिदिन मांरापेशी में 2 दिन तक / तत्पश्चात् ' ओरीप्रिम 1 टिकिया दिन में 2 बार 5 दिन तक दें । पोटाश परमैंगनेट लोशन से लिंगेन्द्रिय को धोयें ।

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सुजाक नाशक ---

• ' एक्स प्रोकेन पेनिसलीन 2 - 4 लाख यूनिट मांसपेशी में 2 भागों में बाँटकर दें । + प्रोवेनीसिड ( M . S . D . ) 1 ग्राम ओरली । 

• 1 दिन छोड़कर – एम्पीसिलीन 3 - 5 ग्राम - ओरली + प्रोवेनीसिड 1 ग्राम दें । । 

जो पेनिसिलीन ' के प्रतिरोधी हों उन्हें -

• टेट्रासाइक्लीन 1 - 5 ग्राम । तत्पश्चात् 500 मि . ग्रा . दिन में 1 बार 10 दिन तक । 

 ' Sexual partner ' की भी चिकित्सा साथ - साथ करें । 

गर्भवती में - नं . 1 और 2 की चिकित्सा करें । जो महिलायें पेनिसिलीन के प्रति सेन्सिटिव हों उन्हें – ‘ इरीथ्रोमाइसीन 500 मि . ग्रा . - ओरली - दिन में 2 बार 4 दिन तक ।
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विशिष्ट चिकित्सा क्रम • 

• सुजाक में लगाने योग्य ऐलोपैथिक पेटेन्ट इन्जेक्शन 

1 . एम्पीलिन ( Ampilin ) “ लाइका - 1 इन्जे , मांस में - नित्य 5 दिन तक । 

2 . बायोटेक्स ( Biotex ) “ बायोकेम ” →1 ग्राम तत्काल मांसपेशी में । ( 1 mg . 250 ml ) 

3 . बिस्ट्रेपेन ( Bistrepen ) एलेम्बिक→1 इन्जे . मांस में दिन में 1 बार या 2 बार । 

4 . क्रिस - 4 ( Crys - 4 ) साराभाई →1 इन्जे . मांस में नित्य । 

5 . इनसामाइसिन ( Ensamycin ) - फुलफोर्ड - 200 मि . ग्रा . , मांसपेशीगत ( 10 mg + 50 mg . ) । 

6 . लूपीलिन ( Lupilin ) ' फार्मनोवा→1 इन्जेक्शन , मांसपेशी में ।

7 , ओरीटॉक्सिम ( Oritaxim ) एलीडेक→1 ग्राम , मांसपेशीगत । ( 250 , 500 , 10 mg . ) 

8 . पेनी - ड्योर ए . पी . ( Penidure A . P ) वीथ - > 1 इन्जे , मांसपेशी में । 

9 . टैरामाइसीन ( Terramycin ) ‘ फीजर →2 मि . ली . , मांसपेशीगत नित्य ।
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सुजाक में सेवन कराने योग्य पेटेन्ट ऐलोपैथिक कैप्सूल 

1 . एलबर्सिलिन ( Alburcillin ) हैक्स्ट →1 - 2 कै . दिन में 3 - 4 बार । 

2 . आल्सीफेन ( Alciphen ) ' एलेम्बिक→1 - 2 कै . दिन में 2 बार । 

3 . एलस्पोरिन ( Alsporin ) हैक्स्ट -  500 मि . ग्रा . का एक कै . दिन में       3 बार । ( 250 , 500 mg . ) 

4 . एमोक्सीवान ( Amoxivan ) खण्डेलवाल→3 ग्राम नित्य । 

5 . एम्पीलिन ( Ampilin ) ' लाइका→1 कै . दिन में 3 बार । ( 250 , 500 )

6 . बेसीक्लोक्स ( Baciclox ) ' एलेम्बिक→1 - 2 कै . दिन में 3 या 4 बार । 
7 . लूपीलिन ( Lupilin ) फार्मानोवा→1 इन्जे . मास में । 

8 . बेसीपेन ( Bacipen ) एलेम्बिक→ 1 - 2 कै . प्रति 6 घण्टे पर । 

9 . बायोसिलिन ( Biocillin ) वायोकेम - 1 - 2 कै . प्रति 6 घण्टे पर । ( 250 , 500 ) • इसका ड्राई सीरप भी आता है 

10 . सिडोमेक्स ( Sidomex ) राउसेल - 1 - 2 कै . प्रति 8 धण्टे पर । 

11 . लेमोक्सी ( Lamoxy ) ' लाइका -  1 - 2 कै . दिन में 3 बार ।  ( 250 , 500 ) । 

12 . लूपीलिन ( Lupilin ) ‘ फार्मेनोमा→1 कै . दिन में 3 बार । ( 250 - 500 ) 

• इसका ड्राई सीरप भी आता है । 

13 . मोक्स ( Mox ) ' गूफिक ' - 3 ग्राम की मात्रा ( 250 - 500 ) 

14 . मोक्सीलियम ( Moxilium ) “ वायोकेम ’ - 250 / 500 का कै . प्रति 8 घण्टे पर । ( 250 - 500 ) 

15 . निओसेफ ( Neocel ) ' एलनवरीज - 1 ग्राम दिन में 3 बार । ( 250 - 500 ) 

16 . नोवामॉक्स ( Novamox ) ' सिपला→1 कै . दिन में 3 बार । 

17 . फेक्सिन ( Phexin ) ग्लैक्सो→1 कै . दिन में 3 बार । ( 250 , 500 )

18 . स्पोरी डेक्स ( Sporidex ) रैनवैक्सी » 1 कै . दिन में 2 या 3 बार । ( 250 , 500 ) 

19 . सेपेक्सिन ( Cepexin ) ' लाइका -  1 - 2 कै . दिन में 3 बार । । 

20 . साइमोक्सिल ( Symoxyl ) ' साराभाई -  1 कै . प्रति 8 घण्टे पर । 250 , 500 

• इसका सस्पेन्शन भी आता है । 

21 . टेट्राडोक्स ( Tetradox ) रैनवैक्सी - 300 मि . ग्रा . तत्काल / तत्पश्चात् 1 घण्टे बाद | ( 100 ) 300 मि . ग्रा . 

22 . वसिलिन ( Worcilin ) वार्नर ' - 1 कै . प्रति 8 घण्टे पर । । ( 250 , 500 ) 

• इसका ड्राई सीरप भी आता है ।
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सुजाक में सेवन कराने योग्य ऐलोपैथिक पेटेन्ट टेबलेट 

1 . सेप्ट्रान ( Septran ) “ वरोजवैल्कम ” →1 टिकिया सुबह नास्ते के बाद् । तत्पश्चात् 2 टिकिया 12 घण्टे बाद 1 सप्ताह तक । 

2 . बैक्ट्रिम ( Bectrim ) ' रोशे कं , - ' उपरोक्त अनुसार । 

3 . सुप्रोनल ( Supronal ) बेयर - पहले 2 टिकिया / तत्पश्चात् 2 टिकिया प्रति 12 घण्टे | पर 1 सप्ताह तक । 

4 . ब्लुसेफ - पी ( Blucef - P ) ब्लूक्रोस - 1 - 2 टि . दिन में 2 बार 5 - 10 दिन तक । 

5 . व्लसिलिन - पी ( Blucillin - P ) → ब्लूक्रोस - 1 - 2 टि . दिन में 2 बार5 \ दन तक । 

6 . सेफेसिलिन ( Cephecillin ) ' विलशायर - 1 टि . प्रति 6 घण्टे पर । 

7 . किस्टापेन ‘ वी ( Crystapen V ) ग्लैक्सो→1 - 2 टि . दिन में 2 या 3 बार 1 सप्ताह तक ,

8 . ई - माईसिन ( E - mycin ) ' थेमिस - 1 - 2 टि . तत्पश्चात् 1 टि , प्रति 6 घण्टे पर । 

9 . पेनग्लोव ( Penglobe ) ' एस्ट्रा - आइडियल→ 4 टि , 1 मात्रा । यह गोनोकोकल यूरेथाइटिस में उपयोगी है । । 

10 . एन्ट्रीमा ( Antrima ) ' एम . बी . ' →1 टिकिया दिन में 2 बार । 

11 . आउब्रिल ( Aubril ) ' हिन्दुस्तान - सीवा - गायगी ' → 1 टि . दिन में 2 बार 14 दिन तक । 

• सस्पेन्शन भी आता है । 

12 . बैक्ट्रिम ( Bactrim ) ' रोशे ' एवं बैक्ट्रिम - डी . एस . → 1 - 2 टि . दिन में 2 बार । इसका सस्पेन्शन आता है । 

13 . बेक्टार ( Bactar ) ' एफ . डी . सी . ' →1 टि . दिन में 2 बार । सस्पेशन आता है ।

14 . बायोफ्लोक्सिन ( Biofloxin ) ' बायोकेम→2 टि . तत्काल 7 से 10 दिन । 

15 . सिडाप्रिम - फोर्ट ( Cidaprim - Forte ) " जगत " > 1 टि . दिन में 2 बार । । 

16 . सिफ्रान ( Cifran ) ' रैनवैक्सी - > 1 टिकिया दिन में 1 या 2 वार । । ( 250 ) 

17 . सिप्रोबिड ( Ciprobid ) कैडिला→ 1 टि , दिन में 1 बार 7 दिन तक । 

18 . कोमसेट ( Comsat ) ‘ नोल ' कोमसेट - फोर्ट - 1 टिकिया दिन में 2 बार ।  इसका सस्पेन्शन भी आता है । 

19 . डीसीफ्लोक्स - 400 ( Diciflox400 ) ' इण्डोको→2 टिकिया तत्काल । 
20 . लोनोट्रिम ( Lonotrim ) ' निकोलस→ 1 टि . दिन में 3 बार । 

21 . नेगाफ्लोक्स ( Negaflox ) ' कैडिला→ 1 टि . दिन में 2 बार 7 - 10 दिन तक ।  

22 . नोरबिक्टूिन ( Norbactrin ) रैनवैक्सी - > 800 मि . ग्रा . की 1 टि , तत्काल । । 

23 . नोरबिड ( Norbid ) ' एलेम्बिक→ 800 मि . ग्रा . का 1 मात्रा । । 

24 . नोरफ्लोक्स ( Norflox ) ' सिपला→ 800 मि . ग्रा . की 1 टि , तत्काल । । 

25 . ओबेक्स ( Obax ) ट्राईडोस→ 800 मि . ग्रा . की 1 टि . तत्काल । । 

26 . ओरीप्रिम डी . एस . ( Oriprim D . S . ) ' कैडिला→1 टि . दिन में 2 बार । पेडियाट्रिक सस्पेन्शन भी आता है । 

27 . सेप्ट्रान ( Septran ) ' वरोजवेल्कम - 2 टि . दिन में 1 बार । पेडियाट्रिक । सस्पेन्शन भी आता है । 

28 . सर्वोत्रिम डी . एस . ( ServoprimD . S . ) ' हैक्स्ट - 1 टि . दिन में 2 बार ।

० इसका सस्पेन्शन भी आता है । 

29 . सुगाप्रिम ( Sugaprim ) ' एस . जी . फामा→2 टिकिया दिन में 2 बार । 

30 . टेबरोल , टेबरोल डी . एस . एरिस्टो - 2 टि . दिन में 2 बार 5 दिन तक । 

31 . यूरोफ्लोक्स ( Uroflox ) ' टोरेण्ट - 2 टिकिया तत्काल ।

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