जलना / दग्ध [ Burns ] आपातकालीन स्थिति में आप क्या कर सकते है ? कैसे बाख सकते है ? Burns / Burns] What can you do in an emergency? How can you

जलना / दग्ध [ Burns ] 

जलना / दग्ध [ Burns ] आपातकालीन स्थिति में आप क्या कर सकते है ? कैसे बाख सकते है ? Burns / Burns] What can you do in an emergency? How can you
stage of buring


अन्य नाम - दग्ध , अग्नि दग्ध , आग अथवा अन्य रासायनिक द्रवों से जलना । । 

परिचय - किसी गरम तपती हुई वस्तुओं के सम्पर्क द्वारा शरीर की त्वचा और अन्दरूनी ऊतकों के प्रभावित होने को जलना ( Burns ) कहते हैं ।


कारण =

जलने के निम्न कारण हो सकते हैं - 

• अज्ञानता ( Ignorance ) । 1 

• असावधानी ( Carelessness ) । 1 

• उपेक्षा ( Nigligence ) → 

• घरेलू वस्तुओं को अव्यवस्थित रखना ( Bad house - keeping ) । D 

• सामानों के संरक्षण एवं रख - रखाव की गलत आदत ( Bad Maintenance Practice ) । 

अन्य कारण -

• अग्नि की ज्वाला से । । 

• गरम धातु के टुकड़े । 

• गरम दूध , चाय , जल , घी , तेल एवं वाष्प से ,

• क्षि - करण एवं रेडियम चिकित्सा । 

• विद्युत ( इलेक्ट्रिक करेन्ट से ) । 

• टेरिलीन , नाइलोन आदि के वस्त्रों में आग लगने से । । 

• दहेज - उत्पीड़न की आग से जलना । । 

• किन्हीं आक्रोशों की असहिष्णुता से होने वाले आत्मदाह जैसी अत्यधिक दर्दनाक दग्ध को दुर्घटनाओं से । ।


लक्षण =

दग्ध ( जलना ) 2 प्रकार का होता है :-

1 . हीच दग्ध ( Minor Burns ) 2 . बहुल दग्ध ( Major Burns ) 

1 . हीन दग्ध ( Minor Burns ) के लक्षण -

• त्वचा दग्ध से प्रभावित एवं झुलसी । किन्तु नष्ट नहीं । । 

• चिकित्सा की आवश्यकता नहीं । । 

• यदि विस्तृत भाग प्रभावित न हुआ हो तो । कोई उपद्रव भी नहीं । 

2 . बहुदग्ध के विशिष्ट लक्षण ( Speci fic Symptoms of Major Burns ) -  • इसमें शरीर के तरल ( Fluids ) का ह्रास । । 

• तरल निकलता रहता है और उसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है । → 

• प्रोटीन तथा तरल की कमी से स्तब्धता के लक्षण प्रकट होते हैं ।

• इसमें गम्भीर स्थिति में धातुएँ भी नष्ट । । 

• प्यास एवं मूच्र्छ । 

• उपयुक्त चिकित्सा के अभाव में मृत्यु । 

• उसमें क्रोध उत्पन्न होकर वह भाग अलग हो जाता है और व्रणमात्र शेष रह जाता है । जिसका रोहण विलम्ब से होता है । 

• विकिरण ऊर्जा जलन ( Radiant heat Burn ) सूर्य की किरणों या अल्ट्रा वाइलेट किरणों से होती है । चूंकि यह जलन शरीर की सतह पर काफी फैले हुए क्षेत्र में होती है इसलिये गम्भीर स्थिति पैदा हो सकती है । ।



• जलन से प्रभावित हुए क्षेत्र की त्वचा लाल , फफोलेयुक्त या जलन की गम्भीरता के अनुसार अन्दरूनी ऊतक बाहर की ओर खुले हुए दीख सकते हैं । जलन का सबसे मुख्य लक्षण गम्भीर एवं असहनीय दर्द है । यदि जलन अत्यधिक गम्भीर है । तो आघात के लक्षण दिखायी देंगे , ऐसी स्थिति में कभी - कभी मृत्यु भी हो सकती है , क्योंकि शरीर से द्रव की अत्यधिक हानि हो जाती है । 

कभी - कभी जलन के निम्न तीनों प्रकार एक साथ दिखायी देते हैं । 

1 . प्रथम श्रेणी की जलन ( First Degree of Burn ) — इसमें केवल त्वचा ही प्रभावित होती है और लाल दिखायी देती है । फफोले नहीं उठते । ।

2 . द्वितीय श्रेणी की जलन ( Second Degree of Burn ) — इसमें त्वचा पर फफोले उठ आते हैं और त्वचा के नीचे स्थित ऊतक प्रभावित हो जाते हैं। 

3 . तृतीय श्रेणी की जलन ( Third Degree of Burn ) — इसमें त्वचा के क्षतिग्रस्त होने के साथ ही अन्दरूनी ऊतक भी प्रभावित हो जाते है । । 

4 . चतुर्थ श्रेणी की जलन ( Fourth Degree of Burn )  इसमें त्वचा व ऊतकों की गम्भीर जलन होकर क्षतिग्रस्त ऊतकों की गहराई अस्थि तक पहुँच जाती है । प्रभावित खुले क्षेत्र काले एवं जले हुए दिखायी देते हैं ।


पहिचान -

लक्षणों के आधार पर बहुत आसान -

• रोगी अथवा उसके सहयोगी स्वयं बताते । 

• देखने पर 

1 . जलने का इतिहास । 

2 . फफोले तथा घाव । । 

3 . तीव्र पीड़ा प्रमुख पहिचान । 

4 शाके का लक्षण । ।


परिणाम -

• वृद्धों और बालकों में दग्ध के परिणाम अच्छे नहीं । 

• शरीर के बाह्य भाग का आधे से अधिक जल जाना घातक । 

• दग्ध जितना अधिक गहरा होता है । उतना ही अधिक गम्भीर / घातक होता है । 

• मुख मण्डल , कमर के भाग में एवं धड़ 1 का जलना हाथ - पैर के जलने की अपेक्षा अधिक घातक होता है ।



• रासायनिक और बिजली से उत्पन्न दग्ध के परिणाम अधिक भयंकर । 

विशेष ज्ञातव्य - पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ अधिक संख्या में जल जाती हैं या क्रूर सास - ससुर , ननद , देवर के द्वारा जला दी जाती हैं और समुचित चिकित्सा के अभाव में वे दम तोड़ देती हैं ।


• स्थान दग्ध के अनुसार शरीर का 100 भागों में विभाजन 

• शिर - 6 प्रतिशत - धड़ ( उदर और वक्ष ) 18 प्रतिशत 

• दोनों हाथ - 18 प्रतिशत पीठ - 20 प्रतिशत में 

• दोनों पैर - 38 प्रतिशत सम्पूर्ण योग = 100 %

याद रखिये - यह अनुमान लगाया जा चुका है कि यदि शरीर की सतह का 1 / 10 वाँ भाग या इससे अधिक भाग जलने से प्रभावित हो गया है तो जीवन को खतरा रहता है । ० आरम्भ में त्वरित एवं उचित रूप से प्राथमिक सहायता करने तथा बाद में अच्छे चिकित्सकीय उपचार से । त्वचा के अत्यधिक जले हुए क्षेत्र या करीब 50 प्रतिशत जलन वाले रोगियों का जीवन सुरक्षित बच सकता है ।

उपद्रव -

• दाह का विस्तार एवं गहराई अधिक होने से शॉक ( Shock ) उत्पन्न होता हैं एवं हृदय की गति बन्द होकर मृत्यु की सम्भावना होती है । 

• ज्वर , दाह , प्यास की अधिकता एवं मूच्र्छा होना – ये विशेष उपद्रव हैं । 

• यदि दग्ध शिर , वक्ष और उदर आदि मर्म स्थानों पर हो , तो मस्तिष्कावरण शोथ , फुफ्फुसावरण शोथ , न्यूमोनिया आदि उपद्रव उत्पन्न होते हैं । 

• दग्ध स्थान में जीवाणुओं के उपसर्ग से विसर्प , टिटेनस आदि उपद्रव उत्पन्न होते हैं । 

• व्रणरोपण के पश्चात् सम्बद्ध स्थान में संकोच एवं कुरूपता हो जाती है । 

 व्रण वस्तु ( स्कार - Scar ) ऊतकों में कार्सीनोमा हो जाता है ।


आवश्यक प्राथमिक चिकित्सा सम्बन्धी निर्देश  

• दर्द कम करना । 

• संक्रमण की रोकथाम करना । 

• यदि आघात की स्थिति हो तो तुरन्त उसकी प्राथमिक सहायता करना । । यदि किसी दुर्घटना में आप जलते हुए व्यक्ति को देखें तो स्वयं सुरक्षित होकर उस व्यक्ति को तुरन्त जमीन पर लेटायें यदि सम्भव हो तो जलता हुआ अंग ऊपर की ओर रखें ताकि आग की लपटें शरीर के आस - पास न फैलें और उस व्यक्ति को कोई मोटा कपड़ा या कम्बल उड़ाकर आग बुझाने का प्रयत्न करें ।

• यदि शरीर के किसी अंग पर मामूली जलन है तो उस अंग को तुरन्त ठंडे पानी में डुबोकर रखें । इससे दर्द में कमी होगी और ऊतकों के अंदर पहुँची गर्मी में कमी आवेगी । । 

• अब जलन के घावों के अनुसार उसकी डेसिंग करें । शुष्क विसंक्रमित गाँज , कॉटन मरहम ( सोफ्रामाइसिन / फ्यूरासिन ) आदि का उपयोग करें । क्योंकि इसके रेशे घाव में चिपक जाते हैं । । 

• यदि जले हुए घावों पर कोई वस्तु या कपड़े चिपके हुए हैं तो उन्हें खींच कर न निकालें । आस - पास के कपड़ों को साफ कैंची से काटकर अलग करना चाहिये । । 

• इसी दौरान यदि रोगी होश में है तो 10 - 10 मिनट के अन्तरालों पर मुँह द्वारा द्रव पदार्थ दे । सकते हैं । पर द्रव की अधिक मात्रा न दें इससे उल्टियाँ होने लगती हैं । 

• दग्ध के स्थान पर टैनिक एसिड का कोई लेप न लगायें ।

• जले पर घी और मक्खन न लगावें , क्योंकि इनके छुड़ाने पर कठिनाई होती है एवं संक्रमण होने की पर्याप्त सम्भावना रहती है । 

• व्यापक दग्ध पर बोरिक एसिड का कोई मरहम न लगावें । 

• यदि दग्ध स्थान पर अधिक फफोले हों तो उनके काटने की उचित व्यवस्था न होने पर उन्हें स्वयं फोड़ना ठीक नहीं ।


• दग्ध की तात्कालिक / आपातकालीन चिकित्सा 

• सर्वप्रथम माफीन थणन ग्रेन का इण्टामस्कुलर इन्जेक्शन दें । → 

• जले भाग को स्वच्छ वस्त्र से ढक दें और यदि बंधन योग्य ( Suturing ) हो तो व्रणबन्धन करे । । 

• यदि रोगी के कपड़ों में आग लगी हो और पास में कोई न हो तो जमीन पर लेटकर करवटें लेनी चाहिये । 

• आग बुझाने के लिये कम्बल आदि को लपेट दें । वैसे आग बुझाने के लिये पानी एक प्रभावशाली तथा आरामदायक उपाय है ।

• शीतलता का प्रयोग दर्द एवं जलन के लिये आवश्यक । । 

• नगर या मकान में आग लगी हो तो तत्काल फाइर ब्रिग्रेट को सूचित करें,

• रोगी को एकान्त स्थान में लिटाये रखें । 

• घाव को जीवाणुविहीन ड्रेसिंग से ढककर रखें । । 

• रसायनिक दग्ध को पर्याप्त मात्रा में जल से धोयें । 

• अधिकं जलने पर रोगी को अस्पताल में भर्ती करा दें । 

• दर्द को दूर करने के लिये पैथोडीन या कोई एनाल्जेसिक अथवा उपयुक्त मान । । 

• अंगों को साबुन के पानी या सेवलान से साफ करके शुद्ध वैसलीन या एण्टीबायोटिक युक्त गाँज रखें या ड्रेसिंग को दूसरे दिन बदलें । 

• ड्रेक्सट्रोज सैलाइन आई . वी . । 

• ए . टी . एस . / 500 यूनिट का इण्टामस्कुलर इन्जेक्शन । । 

• आवश्यकता पड़ने पर आक्सीजन सुंघायें । । 

• गम्भीर दाध में एवं 25 % से अधिक जलने पर रुधिराधान या प्लाज्मा को शिरा द्वारा ड्रिप विधि से दें । → 

• 25 % से अधिक जलने पर ब्लड ट्रान्सफ्यूजन । । 

• रक्त मिलने की व्यवस्था होने तक ग्लूकोज सैलाइन को शिरामार्ग द्वारा ड्रिप विधि से दें । । → 

• सिर्फलेक्सीन कैप्सूल दिन में 4 बार । । । 

• यदि किसी बालक के शरीर का वाह्य स्तर 10 प्रतिशत से अधिक जल गया है अथवा युवक में 15 % से अधिक भाग जल गया है तो प्लाज्मा , डेक्स्ट्रान , डेक्स्ट्राबेन अथवा किसी प्लाज्मा के यौगिक का तत्काल प्रयोग,

• अधिक दग्ध पर डेकाडून ( Decadran ) , ' बेटनीसोल का इन्जेक्शन प्रतिदिन । । 

• रोगी को पर्याप्त मात्रा में विटा , सी . , डी . एवं बी कम्पलेक्स देते रहना चाहिये । । 

• संक्रमण से बचने के लिये व्रण को स्टेलाइज्ड वस्त्र से ढककर रखना । । 

• जले हुए स्थान को डेटालं आदि एण्टीसेप्टिक की सहायता से साफकर विकृत तन्तुओं को कैंची से काटकर अलग कर दें । तत्पश्चात् पेनिसिलीन , सिबाजोल , बनोल या सेटावलॉन को किसी स्वच्छ वस्त्र पर फैलाकर व्रण पर रख दें । । 

• अल्प दग्ध में बनल , सेवलान , टेनोफेक्स जैली , विटाप्लेक्स या सुप्रामाइसीन लगानी चाहिये । 

• जलने के 24 घण्टे के भीतर ही रोगी को ए . टी . एस . का इण्टामस्कुलर सूचीवेध देना चाहिये । जिससे आगे टिटेनस होने की सम्भावना न रहे । साथ में टेटनस टाक्साइड का माँसपेशीगत् प्रयोग करना चाहिये । 4 - 6 सप्ताह के अन्तर पर फिर से सूचीवेध देना चाहिये ।


• विकृत भाग पर त्वचा निरोपण ( Skin grafting ) गम्भीर क्षत की चिकित्सा में की जाती है । इसे यथाशीघ्र जब क्षत कच्चा और ग्रेनूलेटिंग स्थिति में हो तभी उस पर त्वचा निरोपण कर देना चाहिये । कुरूपता ठीक करने के लिये योग्य सर्जन इस विधि का आजकल अधिकतम प्रयोग कर रहे,

•• दग्ध की नवीन और उत्तम चिकित्सा आजकल बन्धन रहित विधि मानी जाती है । जिसमें संक्रमण का ध्यान रखते हुए व्रण स्थान को स्वच्छ कर स्ल्फोनामाइड एवं नौवा सल्फ पाउडर छिड़ककर खुला छोड़ देते हैं । इससे व्रण शीघ भरता है । एतदर्थ जेन्सियन वायोलेट , एक्रेफ्लेवीन और ब्रिलिएन्ट ग्रीन का बनाया हुआ योग पेण्ट आफ क्रिस्टल वायोलेर कम्पाउण्ड ' का भी । प्रयोग होता है ।

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