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अग्निमांद्य [ Dyspepsia ] क्या है ? और इसके रोकथाम के लिए क्या - क्या कर सकते है ? What is dyspepsia? And what can you do to prevent it?

अग्निमांद्य [ Dyspepsia ]

अग्निमांद्य [ Dyspepsia ]


पर्याय - 
मन्दाग्नि , साधारण बोलचाल में इसे ' भूख न लगना ' कहते हैं ।

परिचय -
अग्निमांद्य रोग में पाचन क्रिया धीमी पड़ जाती है जिससे भोजन का पाचन भली-भांति नहीं हो पाता और भोजन की पचने की सामान्य क्रिया में बहुत सी समस्याएं उत्पन्न हो जाती है, इसी कारण हमें भूख नहीं लगती थोड़ी मात्रा में किया गया भोजन भी बहुत देर से पचता है, इसके साथ पेट व सिर में भारीपन, मुख में अधिक लार बनना एवं अंगों में दर्द आदि के लक्षण होते हैं ।


रोग के सामान्य कारण >> 

-  संतुलित आहार नहीं करना ।

-  पूर्व में किये गये भोजन के बिना पचे पुनः  भोजन करना ।

-  अजीर्ण होने पर भी भोजन करना ।

-  आटे या बेसन की बनी वस्तुओं का अधिकांश प्रयोग ।


-  अधपका भोजन करना ।

-  दिन में भोजन के बाद तुरंत सोना ।

-  पेय पदार्थों का अत्याधिक सेवन , जैसे : - शराब एवं अत्यधिक दूध का सेवन भी ।

-  अत्यधिक गर्म अधिक तेल से बना भोजन तथा अत्यधिक खट्टे पदार्थों का सेवन ।


-  भोजन के बाद अथवा भोजन के बीच में पानी पीना ।

-  तेज चाय ( Strong tea ) एवं कॉफी का अधिक मात्रा में सेवन । ।

-  भोजन सही समय अनुसार नहीं करना ।

-  जल्दी - जल्दी खाना ( Hurried eating )


-  अधिक बीड़ी - सिगरेट सेवन ।

-  गर्भावस्था , भोजन के प्रति एलर्जी भी एक कारण हो सकता है । ।


रोग के विशिष्ट कारण >>

-  यदि ग्रासनली ( Oesophagus ) , आमाशय या गृहणी ( Duodenum ) आदि की बनावट जन्म से ही विकृत हो अथवा इनमें कहीं पर गांठ हो जायें । मध्यपेशी का हर्निया हो । आमाशय की बीमारी , पेप्टिक व्रण (छाला) या आमाशय कैंसर हो ।

आन्त्रपुच्छ की बीमारी , पित्ताशय की बीमारी , अग्न्याशय की बीमारी , एमीबिएसिस , संग्रहणी ( Sprue ) , आन्त्रकृमि विशेषकर जियार्डियासिस आदि रोगों के साइड इफेक्ट्स से । 

-  ह्रदय की बीमारी , फेफड़े की बीमारी ( टी.वी. ) , यक्ष्मा , रक्त की कमी , एडिशन रोग  ( सुप्रारीनल ग्रन्थि का विकार ) , यूरीमियाँ एवं अतिपरावटुता( Hyper parathyroidism ) से भी रोग की सम्भावना । 

परगेटिव , एस्प्रिन , सैलीसिलेट्स आदि का अधिक सेवन । 
अग्निमांद्य बहुत पाया जाने वाला साधारण विकार है । पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे अग्निमांद्य रोग न होता हो । यह भी कह सकते हैं कि अनेक बीमारियों का जड़ भी है अतः इसके कारणों का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त करना अति आवश्यक है । ।
• चाय में ' टैनिन ' नामक एक पदार्थ रहता है । अतएव चाय का अधिक सेवन जठराग्नि को मन्द बनाता है । जिससे भूख मारी जाती है ।

प्रमुख कारण एक दृष्टि में  >>

■ पाचन संस्थान के आर्गेनिक रोग - 

- पित्ताशय रोग ( Pancreatic disease )
- क्रोहन्स रोग ( Crohn ' s disease )

■ सिस्टेमिक डिजीज - 

- हृदय , वृक्क अथवा यकृत पात ( Cardiac , Renal or Hepatic Failure )

■ औषधीय ( Medication ) - 

- नॉन - स्टेरॉइडल - एण्टी - इन्फ्ले मेटरी औषधियाँ
- डिजोक्सिन ( Digoxin )
- पीड़ा निवारक ( Analgesic )
- एण्टीबायोटिक्स ( Antibiotics )

- शराब ( Alcohol ) - 

- गर्भावस्था Pregnancy ) - 

- मानसिक विकार ( Psychiatric disorders ) , अवसादक विकार ( Depressive illness )-

नोट - जरूरत से ज्यादा चिंता भी एक प्रमुख कारण है ।

याद रखिये - वास्तविक कारण का पता नहीं । सामान्यतया मनोविकार सम्बन्धी ( Psychological ) , तंत्रिका सम्बन्धी ( Neurological ) एवं Geet Peptide Factor हो सकते हैं । रोगी प्रायः 40 साल की उम्र वाला विशेषकर पुरुष होता है ।
नोट -  दाँतों के रोग विशेषकर ' पायरिया ' भी इसका प्रमुख कारण है । 

रोग के प्रमुख लक्षण >>

●  पेट की बीमारी, गैस, कब्ज, अंगों में जकड़ाहट , गले एवं मुख का सूखना । ।

● भूख न लगना , खट्टी डकारें आना , भोजन के प्रति अरुचि । 


● सिर में चक्कर , मुख से धुंआ जैसा निकलना , पसीना आना ।

● शरीर में भारीपन , माथे एवं आंखों के आसपास में दर्द, उल्टी करने की इच्छा अथवा उल्टी होना भी ।


● आलस्य , शारीरिक संबंध बनाने में अरुचि । 

● प्रातःकालीन लक्षणों में - टहलते समय पेट मे दर्द अथवा चक्कर जैसा महसूस होना । 

●  जीभ में सफेद व पीला रंग का परत जमना एवं मुह से दुर्गन्ध ।
● मुह में पानी भर आता है । भोजन के बाद अक्सर पेट फूलने की शिकायत रहती है ।


जटिलताएं ( Complications ) >>

■  परनीसियस अनीमिया मुख्य जटिल समस्या है ।

■ रोग पुराना होने पर पेट में गैस बनने लगती है । इसके साथ बेचैनी , भारीपन , सुस्ती , थकान , नाड़ी दुर्बलता , स्नायु दुर्बलता ( न्यूरेस्थेनिया ) तथा अनिद्रा आदि विकार हो जाते हैं ।
■ रोगी का सिर भारी रहने लगता है । और उसे चक्कर आने लगते हैं ।
• यह कोई विशेष रोग नहीं है बल्कि एक लक्षण मात्र है जो अनेक रोगों में दिखायी देता है ।

रोग की पहिचान >>
◆ भूख न लगने के साथ - साथ तबियत का गिरा रहना , भोजन के बाद पेट फूलना , मितली , उल्टी , सिर दर्द आदि लक्षणों से इसे सरलतापूर्वक पहिचाना जा सकता है ।

आवश्यक परीक्षण >>
■  रोग के वास्तविक कारणों को जानने के लिये X - Ray करना बहुत जरूरी होता है ।

■  इसी प्रकार रक्त , मल - मूत्र , आमाशयक पदार्थ , यकृत( liver ) कार्य आदि के परीक्षणों ( test ) की भी आवश्यकता होती है ।


रोग निदान के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें >>

◆ यदि रोग का आरम्भ एहसास हुआ हो तो ' अपेंडिस ' या शोक चिन्ता आदि कारण हो सकते हैं ।

◆ कभी - कभी अजीर्ण के होने की आशंका हो तो ' पेप्टिक अल्सर ' कारण समझना चाहिए । यदि यह लक्षण कुछ दिनों से दिख रहे हो तो इन दोनों बीमारियां का साथ उभरना संभव है । 

◆ ' पित्ताशय की बीमारी ' एवं ' जीर्ण आमाशय की बीमारी ' में दर्द न होकर बेचैनी महसूस होती है ।
by - www.scientificanimations.com

◆ पेट के आधे भाग की परेशानी गैस ( आध्यमान ) ( Flatulance ) हो सकता है ।

◆  जीर्ण आमाशय की बीमारी में मितली ( चक्कर जैसी स्तिथि ) होती है ।

◆  उल्टी होने का कारण कोई पेट मे कोई केमिकल इमबैलेंस हो सकती है ।

◆ खूनी उल्टियां हो , तो उसका कारण पेप्टिक अल्सर , कैंसर , आमाशय शोथ एवं यकृत सिरोसिस हो सकते हैं।

◆ यदि कब्ज ( Constipation ) रहने लगे तो पेप्टिक अल्सर ' , ' आमाशय कैंसर एवं ' अतिसार ' का कारण अन्त्रशोथ ( colitis )

◆  शोक , चिन्ता तथा काले रंग का मल आवे तो आंतों में कहीं रक्त स्त्राव होने का सूचक है ।

◆ ' जीर्ण पित्ताशय की बीमारी ' के कारण बदबूदार गैस की प्रॉब्लम होता है ।
मन्दाग्नि में पित्ताशय के विकारों के कारण रोगी प्रायः मोटा होता जाता है । । जबकि मानसिक विकारों से उत्पन्न अग्निमांद्य में पतला । 
याद रखिये - चाय - सुपारी , जामुन फल आदि के अधिक सेवन से भूख मारी जाती है ।

चिकित्सा विधि >>

कारण , लक्षण एवं रोगी की अवस्था विशेष को देखते हुए अग्निमांद्य के रोगी को -

● जहां तक संभव हो सके रोगी को पाचन ( Digestive Stimulant ) एवं कार्मिनेटिव की दवाइयां देनी चाहिए ।

●  दाँत में यदि कोई रोग हो तो उसकी चिकित्सा पहले जरूरी है।

● भोजन के समय अधिक पानी न पियें , 1 घण्टे बाद 1 गिलास पानी अवश्य पियें।

● भोजन में दूध , दही की मात्रा बढ़ा कर दें ।

● खाने के पश्चात् ब्राण्डी 1 चम्मच को 100 मि . ली , जल में मिलाकर दें । 

● मानसिक विकार गुस्सा डिप्रेशन इत्यादि से बचाव यह भी कह सकते हैं कि रोगी को मानसिक उत्तेजना से बचना चाहिए ।


● कभी - कभी उपवास भी आवश्यक है ।


क्या करे ?------ >>

■ पुराने चावल , अगहनी चावल का भात , मूंग का यूष , बथुआ , पालक , कच्ची नूली , सहिजन , परवल , करेला , लहसुन , नीबू , अदरख , नमक , धनियाँ , मट्ठा , हल्के कड़वे रस युक्त द्रव्य लेना चाहिए ,

By - Gourav mishra

■  भोजन करने से पहले अदरख की कतरन , सेंधा नमक के साथ चबाकर खानी चाहिए ।

■  सिरका + अदरख बराबर - बराबर मिलाकर खानी चाहिये । ।

◆  भोजन के साथ हरी मिर्च + धनियाँ की पत्ती + पके टमाटर + पतली मुली + नीबू का रस + नमक मिलाकर सलाद बनाकर भोजन के साथ लेने से भोजन में रुचि उत्पन्न होती हैं । 

◆  अग्निमांद्य में व्यायाम का अधिक महत्व है । जठराग्नि को सही कार्य के लिए व्यायाम एक बहुत उपयोगी प्रतिक्रिया है । 

याद रखिये - 
● दुर्बल एवं अग्निमांद्य रोगी को पुनः पाचन प्रणाली सुचारू रूप से चलाने के लिए चौबीस घण्टे में एक बार भोजन करना चाहिए । 

● अग्निमांद्य में हल्का गुनगुना पानी पीना चाहिए । 

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औषधि चिकित्सा >> 
by - Own work

औषधि चिकित्सा से विशेष लाभ नहीं होता , पर सही व क्रमबद्ध रूप से इसे प्रयोग में लाना चाहिये । कभी-कभी इस मामले में एंटासिड ( Antacids ) लाभकारी होता है,

Rx .

1.  मेटाक्लोप्रामाइड ( Metaclopramide ) 10 मि . ग्रा . × दिन में 3 बार , भोजन से पूर्व ,

अथवा -

     डोमपेरीडोन ( Domperidone ) 10 - 20 मि . ग्रा . × दिन में 3 बार - भोजन से पूर्व । 

2.  पाइरेन्जीपाइन ( Pirenzepine ) 50 मि . ग्रा . × दिन में 2 बारे ।

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विशिष्ट औषधि व्यवस्था पत्र >>

Rx

■ प्रातः सायं - टाका काम्वेक्स कैपसूल ( पी . डी . )  - 1 कै , , दिन में 2 बार , जल से ।

■ भोजन से पूर्व - लिवोजिन कैप्सूल ( एलनवरीज ) -  कै , भोजन से 1 / 2 घण्टे पूर्व ।


■ भोजन के बाद - डीजीप्लेक्स इलेक्सिर ( Digiplex Elixicr ) - 2 चम्मच , दिन में 2 या 3 बार ।

■ रात सोते समय - वाडेंज इलेक्सिर ( Bardese Elixier ) ' पी . डी . ' -  2 चम्मच रात 10 बजे ।

■ इन्जे , विटा , ' बी कम्प्लेक्स ( लीडले ) -  2 मि . ली . मांस में नित्य या तीसरे दिन × कुल - 10 से 20 इन्जे , पर्याप्त ।
नोट - भोजन के बाद - ' बी . जी . फॉस इलेक्सिर लिया जा सकता है ।
अग्निमांद्य की लक्षणानुसार चिकित्सा >>

1 . सामान्य भूख की कमी में -   डायस्टेज 60 मि . ग्रा . , पेपेन 60 मि . ग्रा . , स्प्रिट अमोनिया एरोमेट 1 मि . ली . , टि . कार्ड 0.6 मि . ली . , पिपरमेण्ट वाटर 30 मि . ली . । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 बार , भोजन के बाद ।

2 , अजीर्ण , कब्ज , एवं गैस से उत्पन्न अग्निमांद्य में -   गैसटोल ( Gastol ) - 1 - 2 टेबलेट , भोजन के बाद , दिन में 3 बार चुसवायें ।


3 . अफारा ( Flatulent जन्य डिस्पे - प्सिया में -    अल्माजेल ( Almazel ) निमार्ता . ' आई . डी . पी . एल . - 1 - 2 गोली , दिन में 3 या 4 बार चूसें । आसीरप 10 - 20 मि . ली . दिन में 3 या 4 बार । अथवा ' अलमाकार्ब ( ग्लैक्सो ) 2 टेबलेट , दिन में 3 बार । 
नोट - यह एक उत्तम गैस निरोधक है ।

4 . अम्ल युक्त डिस्पेप्सिया में -   एलूसिनोल ( Alucinol ) निमार्ता . ' फ्रेन्को - इंडिया 2 - 3 गोली दिन में 4 बार भोजनोपरान्त ।
नोट - इसका ' सस्पेन्शन भी आता है । 

5 . नर्वस डिस्पेसिया में -   स्टेलाबिड ( Stclubid ) नि . ' स्केलेव ' या ' स्पेजारिल ' ( Spasril ) नि , ' मोण्टारी - 1 2 टेबलेट - दिन में 3 - 4 बार । 
नोट - स्टेलाविड - 2 ' भी आता है ।

6 . हाइपर एसीडिटी एव एनोरेक्सिया जन्य डिस्पेप्सिया में -  ' डिजीटोन लिक्विड ( Dczytone ) ' यूनीकेम ' 5 - 10 मि . ली . - दिन में 2 या 3 बार । अथवा - डिस्पेप्टेज लिक्विड ( Dispeptase Liquid ) नि , ‘ पास्चर कं , । मात्रा - 5 - 10 मि . ली . - भोजन के बाद दिन में 2 या 3 बार ।


7 . पेट फूलना , अजी तथा छाती की जलन युक्त डिस्पेप्सिया में  -   टे . इनजार ( Tab . Enzar ) निमार्ता . वाल्टर वुशनेल - 1 - 2 टेबलेट - दिन में 3 बार भोजन के मध्य में । चबायें नहीं , निगल जायें ।

8 . अजीर्ण , पेट फूलना एवं वृद्धावस्था का रोग ( old age Dispensia ) -   ' इन्जाइमेक्स - एम . . एस . ' ( Enzymex - M . P S . ) - 1 - 2 टेबलेट - भोजनोपरान्त । 

9 . अनिद्रा , आमाशय , बेचैनी युक्त डिस्पेप्सिया में -   ‘ डिस्पेप्टाल 1 ड्रेगी - दिन में 2 बार भोजनोपरान्त दें । साथ ही - ' लिवरियम ' 1 गोली - नित्य , सोते समय - 1 माह तक दें ।

10 . अजीर्ण , अग्निमांद्य , पेट फूलना क्रोनिक गैस्ट्राइटिस तथा पाचक रसों की कमी में  -   ओरीजाइम ( Orizyme ) नि . ' कोप्रान ' 1 - 2 चम्मच - दिन में 2 बार । 
11 . सामान्य पाचन न होने की स्थिति -    ' नोरमोजाइम ' ( Normozyme ) नि . ' यूनीलुआइड्स - 2 चम्मच - दिन में 2 बार । 
नोट - इसकी ' ड्रेगी ' भी आती है ।

12 . अजीर्ण , फरमेन्टिव डिस्पेप्सिया , छाती की जलन , एनोरेक्सिया -    विटाजाइम ' ( Vitazyme ) नि . ईस्ट इंडिया 2 से 3 चम्मच - दिन में 2 बार भोजन के समय या भोजनोपरान्त । 
नोट - इसका ड्राप भी आता है ।

13 . अजीर्ण , डिस्पेप्सिया , पेट फूलना , गैस्ट्रिक फरमेन्टेशन , छाती की जलन एवं । विटामिन डिफीसिएन्सी -    ' लूपीजाइम सीरप ( Lupizyme Syrup ) नि . लूपिन ' 10 मि . ली . ( 2 चम्मच ) दिन में 2 बार भोजनोपरान्त । अथवा - ' ओरोजाइम ( Orizyme ) नि . ' क्रोपान - 2 - 5 मिली लीटर - दिन में 2 या 3 बार अथवा आवश्यकतानुसार दें ।

14 . पेट फूलना , अग्निमांद्य क्रानिक गैस्ट्राइटिस एवं एनोरेक्सिया -    पेप्सीनोजाइम ( Pepsinozyme ) नि . ' स्टेडमेड 1 - 2 टेबलेट - दिन में 2 बार - भोजन के बाद ।

15 . हीन डाइजेशन ( Poor digestion ) -  रालक्रीजाइम ( Ralcrizyme ) नि . ' रैलिस 1 - 2 ड्रेगी - दिन में 2 बार - भोजन के बाद । 

16 . पेट फूलना , डिस्पेप्सिया या क्रानिक गैस्ट्राइटिस कन्वल्सेन्स आदि में -   यूनीइन्जाइम ( Unienzyme ) नि . ' यूनीकेम 1 - 2 टेबलेट - दिन में 2 - 3 बार - भोजन के बाद ।


17 . हाइड्रोक्लोरिक एसिड की कमी , बच्चों में बार - बार होने वाले दस्त , डिस्पेप्सिया में  -   विल्कोजाइम ( Vilco - enzyme ) नि . ' विल्कों कं . - 1 टेबलेट , दिन में 2 बार भोजन के बाद । 
सीरप रूप में - बालक 1 . 25 मि . ली . । वयस्क - 5 - 10 मि . ली . भोजन अथवा दूध से पूर्व । 

18 . मानसिक अजीर्ण युक्त डिस्पेप्सिया में - टि . वेलाडोन 1 चम्मच , इलिक्सिर फीनोवाटोन 2 औंस ( 60 मि . ली . ) मिलाकर - 1 - 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार दें । अथवा ' डिस्पेप्टाल ( नोल कं . ) एवं ' लिबरियम ( रोशे कं . ) टेबलेट को दिन में 2 बार खाना खाने के बाद दें ।

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अग्निमांद्य की मिश्रित चिकित्सा ० ( Combination Therapy ) >>

प्रमुख लक्षण  -

1 . पित्ताशय की दुर्बलता के परिणाम स्वरूप उत्पन्न अग्निमांद्य में →  कौम्बीजाइम ( निमार्ता . न्योफार्मा ) 1 ड्रेगी . डिस्पेप्टाल ( Dispeptal ) नि . ' बोह रिंगर ' 1 टेबलेट मिलाकर दिन में 2 बार दें । ऊपर से ' इनजार फोर्ट ' ( Enzar forte ) नि . ' इल्डर ' कं . की 1 टेबलेट चूसें । 

2 . सामान्य अग्निमांद्य के नवीन रोग में →   पेप्सिनोजाइम ( PepsinozyTne ) नि . स्टेडमेड 1 टेबलेट , सन्जाइम कम्पाउन्ड ( Sanzyme Compound ) नि . यूनिसांकियो - 1 टेबलेट , बेसिलैक ( Becelac ) नि . फाइमेक्स - 1 कैप्सूल । ऐसी 1 मात्रा दिन में 1 या 2 बार दें ।


3 . दीर्घकालिक अग्निमांद्य के रोग में -  यूनिइन्जाइम ( नि . यूनिकेम ) 1 टेबलेट , सेरुटान ( नि . टिक ) की 1 टेबलेट एवं विलामाइड ( नि . इथनॉर ) 1 टेबलेट तीनों को मिलाकर ऐसी एक मात्रा दें । एवं बी . जी . फॉस इलिजिर नि . मेरिण्ड - 10 मि . ली . ( 2 चम्मच ) बराबर पानी के साथ मिलाकर दिन में 3 बार प्रतिदिन 2 से 3 सप्ताह तक दें।

4 . अग्निमांद्य के साथ - साथ शारीरिक दुर्बलता अथवा किसी बीमारी के बाद की दुर्बलता में -  पोलीबियोन 1 टेबलेट + लिबरियम 1 टेबलेट + डेस्ट्रोल ( Destrol ) 1 टेबलेट - इन तीनों को मिलाकर एक पुड़िया बना लें । ऐसी 1 पुड़िया खाना खाने के बाद खिलायें । ऊपर से ‘ बी . जी . फॉस इलेक्जिर ' 2 चम्मच एक भाग जल में मिलाकर दिन में 3 बार दें ।
पुराने रोग में - यूनीइन्जाइमटेबलेट , इक्वात्रोमटेबलेट , पेरीना ( Perinorm )टेबलेट । ऐसी 1 मात्रा दिन में 2 - 3 बार दें । ऊपर से प्रति खुराक के बाद ' बी . जी . फॉस इलिजर 2 चम्मच पिलावें । चिकित्सा 1 माह तक ।
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भूख की कमी ( मन्दाग्नि ) में देने योग्य लेटेस्ट पेटेन्ट टेबलेट्स / कैप्सूल्स  >>>

1 . एरिस्टोजाइम कैप्सूल्स ( Aristozyme  Cap ) नि . ' एरिस्टो '   → 1 - 2 कै . , भोजनोपरान्त । 

2 . बिलामाइड ( Bilanmidc ) नि , ' इथनॉर ' → 1 - 2 टेबलेट , दिन में 3 बार , भोजनो परान्त । कुछ दिन की चिकित्सा के बाद , मात्रा को घटा दें ।

3 . डीजीप्लेक्स - टी ( Digiplex - T ) नि . ' रेलिस → 2 ड्रेगी , दिन में 2 बार , भोजन के बाद । तीव्र ‘ आंत्रिक संक्रमण के विकारों के बाद की अवस्था में उपयोगी ।

4 . डिस्पेप्टाल ( Dispcplal ) नि . ' बोहरिगर - मेनहेम ' → 1 - 2 ड्रेगी - भोजन के साथ ।


5 . डीजेक ( Di / Cc ) नि , ' एस . के एफ ,  → 1 टेबलेट - भोजन के बाद । 

6 . इनजार फोर्ट ( En / ar fortc ) नि . ' इल्डर के . → 1 टेबलेट चूसें एवं हर भोजन के साथ निगलें । 
नोट  -अफराजन्य डिस्पेप्सिया में , तीव्र ‘ पित्ताशय शोथ की अवस्था में प्रयोग न करें ।

7 . फेस्टल ( Festal ) नि . ' हैक्स्ट ' → 1 - 2 ड्रेगी दिन में 2 - 3 बार 2 - 3 दिन तक । 
नोट - गम्भीर लिवर रोगों एवं ' हेपेटिक कॉमा में प्रयोग न करें ।

8 . मरकेनंजाइम ( Merckenzyme नि . ‘ मर्क  → 1 टेबलेट भोजन के साथ।

9 . मोलजाइम ( Molzyme ) नि . ' एफ . डी . सी . → 1 - 2 टेबलेट भोजन के बाद अथवा आवश्यकतानुसार ।

10 . निओपेप्टाइन कै . ( Neopeptine capsules ) नि . ' रेप्टाकोस → 1 कैप्सूल दिन में 2 बार ।

11 . सेरुटान ( Serutan ) नि . टी . टी . के . → 1 - 3 टेबलेट प्रमुख भोजन के साथ, गैस युक्त अग्निमांद्य में ।

12 . रैलक्रिजाइम विद डी . एम . एस . ( Ralcrizyme with D . M . S . ) नि . " रैलिस ” -- 
वयस्कों को - 2 टेबलेट भोजन के बाद दिन में 2 बार ।

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अग्निमांद्य में सेवन कराने योग्य अपडेट ऐलोपैथिक पेटेन्ट पेय / सीरप  >>>

1 . एरिस्टोजाइम लि . ( Aristozyme Liquid ) नि , ' एरिस्टों  → 1 - 2 चम्मच ( 5 - 10 मि . ली . ) भोजन के बाद । "इसका ' ड्रॉप्स भी आता है । "

2 . डीजीप्लेक्स ( Digiplex ) नि . रैलिस . → 2 चम्मच ( 10 मि . ली . ) भोजनोपरान्त । "इसका ' ड्रॉप्स भी आता है । " 

3 . इलकेरिम ( Elcarim ) नि . टी . टी . के . → बालक 5 - 15 मि . ली . ( 1 - 3 चम्मच ) तथा शिशु में 1/4 - 1/2 चम्मच दिन में 3 बार । "इसका ' ड्रॉप्स भी आता है । "

4 . मीथोजाइम ( Methozyme ) नि ' अखिल फार्मा      2 - 10 मि . ली . दिन में 2 बार । 

5 . निओपेप्टाइन लि . नि . ' रेप्टाकोस → 1 चम्मच दिन में 2 बार । 

6 . ओरेक्सीम ( Orexyme नि . कोप्रान .  → 1/2 - 1 चम्मच दिन में 2 - 3 बार भोजन से पूर्व या बाद में ।

7 . टाकाजाइम ( Takazyme ) नि . पी . डी . → 1 - 2 चम्मच दिन में 3 बार जल से भोजन के बाद दें । स्टार्च वाले भोजन न पचने ।

8 . जाईमेक्स ( Zymex ) नि . ' मेडलेय '   3 चम्मच हर भोजन के बाद । 

9 . विटाजाइम ( Vitazyme ) नि , ' ईस्ट इंडिया  → 5  - 10 मि . ली . भोजनोपरान्त 3 बार । ।

10 . लिवोजेन ( Livogen ) नि . ' एलनवरीज → पुराने रोग में 1 - 2 चम्मच भोजन से पूर्व ।

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अग्निमांद्य में लगाने योग्य ऐलोपेथिक पेटेन्ट इन्जेक्शन  >>>

1 . इमेक्सोल ( Emakal ) नि . एम . एम . लैब्स   → 2 मि . ली . मास में आवश्यकतानुसार या दिन में 2 - 3 बार ।

2 . पेरिनॉर्म ( Perinorm ) नि , ' इपका → 2 मि . ली . मांस में । ।

3 . विटामिन बी कम्पलेक्स ( Vitamin Complex ) नि . टी . सी . एफ . → 2 मि . ली . मांस में नित्य 5 दिन । तत्पश्चात हफ्ते में 3 या 4 बार 10 इन्जे . तक ।

4 . हिपाटेक्स टी ( HepatexT ) नि . ' ईवन्स  → दीर्घ कालिक रोग में 2 मि . ली . की सुई मांस में लगावें ।"निओ - हेपाटेक्स फोर्ट भी आता है । "

5 . युबीसिड ( Ubicid ) नि , ' यूनीकेम कं , ' → 1 - 2 मि . ली . मांस में रोजाना । कुल 10 इन्जे , पर्याप्त ।

6 .  बीप्लेक्स फोर्ट ( Bcplex Fortc ) नि ' एन्गलो फ्रेंच  → 1 मि . ली . नित्य मांसपेशी में ।

7 . पोलीबिओन ( Polvbion ) नि , ' मर्क ' → 1 एम्पुल नित्य 5 दिन मांस में । तत्पश्चात 1 एम्पुल सप्ताह में 2 - 3 बार । 

8 . फोस्फोटोन ( Phosphoton ) नि ' सिपला  → 1 एम्पुल मांस में एक दिन छोड़कर । 

9 . परकोर्टिन ( PerCortin ) नि . ' सीबा →  पुराने रोग में एक एम्पुल मांस में हफ्ते में 2 - 3 बार । 

याद रखिये -  ऊपर दिए गए चाटों में कई - कई टेबलेट्स , कैप्सूल , पेय एवं इन्जेक्शन इसलिए लिखे गये हैं ताकि आपको आसानी से मिल सके और चिकित्सा में सुविधा हो ।

 

पाचन संबंधित अन्य और रोगों को जाने -





































और भी जाने : -























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