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Friday, June 7, 2019

कार्नियल अल्सर / आँख का व्रण | [ Corneal Ulcer ] रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण , चिकित्सा व्यवस्था ? Corneal ulcer / eye ulcer. [Corneal Ulcer] Name, intro, cause, symptoms, medical system of disease?

कार्नियल अल्सर / आँख का व्रण | [ Corneal Ulcer ] 

कार्नियल अल्सर / आँख का व्रण | [ Corneal Ulcer ]  रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण , चिकित्सा व्यवस्था ? Corneal ulcer / eye ulcer. [Corneal Ulcer] Name, intro, cause, symptoms, medical system of disease?
corneal ulcer


नाम - स्वच्छ मण्डल के घाव । इसे Suppurative Keratitis भी कहते हैं । 

परिचय - इस रोग में स्वच्छपटल ( Cornea ) पर घाव हो जाता है जिससे उसकी पारदर्शकता नष्ट हो जाती है जिससे रोगी दृष्टिविहीन हो जाता है । 
• It means loss of corneal substance as a result of infection and formation of a Taw , excavated area .


रोग के प्रमुख कारण -

• रोहे ( Trachoma ) का नेत्र श्लेष्म कलाशोथ ( Conjunctivitis ) की उचित चिकित्सा न करने से । → 

• नेत्र में चोट लगना ( Ocular injuries ) 

• चेचक अथवा खसरा ( मिजिल्स ) के दानों का स्वच्छू पटल पर उभर आना । । 

• अश्रुकोश का शोथ । । । 

• स्वच्छ पटल मृदुता ( Keratoma lacia ) 

• मनुष्य के अधिक बीमार रहने से जब वह अर्धचेतन्य अवस्था में रहता है और पलक पूर्ण रूप से बन्द नहीं हो पाते हैं । जिससे स्वच्छ पटल के नीचे वाला भाग खुला रह जाता है जिससे उस पर घाव बन जाता है । 

• फेसियल नर्वस के पक्षाग्रस्त होने पर ।


रोग के प्रमुख लक्षण -



• नेत्र में पीड़ा ( Pain in the eye ) । 

• नेत्र से पानी बहना ( Lacrimation ) । 

• धूप में उनका न खुलना ( Photoph obia ) । → 

• पलकों का जोर से बन्द रहना ( Blep harospasm ) । 

• शिरःशूल ( Headache ) एवं Blurr ing of vision . → 

• दृष्टि का क्षीण होना । । 

• साधारणतः दिन में कितनी ही बार स्वच्छपटल पर छोटे - छोटे घाव होते हैं , किन्तु वे शीघ्र भर जाते हैं । यदि इन घावों में जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं । अथवा स्वच्छपटल की अपनी स्वाभाविक रक्षाक्षमता नष्ट हो जाती है । तो इसका अग्रिम भाग गलकर नष्ट हो जाता है जिससे स्वच्छ पटल खुरदरा एवं मटमैला हो जाता है ।



कार्नियल अल्सर की नैदानिक अनिवार्यतायें एक दृष्टि में -

• आँखों में भयंकर पीड़ा ,

• फोटोफोबिया ,

• आँख से पानी का अविरल बढ़ना ।  

• अल्सर में छिद्र होने की प्रवृत्ति अथवा घाव फट जाता है ।

• फ्लूरोसिन आई ड्राप्स डालने से घाव के तल में शीघ्र ही दाग पड़ जाता है। • रंजक अर्थात् डाई के द्वारा अल्सर के किनारों के आस - पास इन्फिल्ट्रेशन हो जाता है । 


कोर्नियल अल्सर की चिकित्सा व्यवस्था -

• पैड एवं बैण्डेज के द्वारा आक्षिगोलक ( Eye Ball ) की रक्षा आवश्यक । 

• सोफामाइसीन ड्रॉप्स या आई आयन्टमेण्टहर2 - 2 घण्टे बाद । 

• एट्रोपीन आई ड्रॉप्स या आयन्टमेण्ट - हर 2 - 2 घण्टे पर । 

• वायरल अल्सर ( हपज सिम्पलैक्स ) हो तो – रिडीनौक्स आई ड्राप डालें । 
• कभी - कभी लोकल कॉटराइजेशन आवश्यक । 

• सेप्ट्रान या आइबू - प्रोफेन ।


विशिष्ट व्यवस्थापत्र -

Rx 

• निओप्पोरिन आई ड्रॉप्स ( Neosporin Eye drops )  -  हर 2 घण्टे पर 7 दिन तक ।

• गैरामाइसीन आई ड्रॉप्स ( Garramycin Eye drops )  -  हर 2 - 2 घण्टे पर x 7 दिन तक । 

• सोफामाइसिन आई आयन्टमेंट  -  दिन में 2 बार x 7 दिन तक ।  

• बैक्ट्रिम डी . एस . 2 . ( Bactrim D . S . )  -  1 टि . दिन में 3 बार x 5 दिन तक  । 

• एट्रोपीन आई ड्रॉप्स  -  दिन में 2 बार x 5 दिन तक । 

•• जितना शीघ्र हो सके केश को किसी नेत्र चिकित्सालय में भर्ती करा देना चाहिये । 


•• कोर्नियल अल्सर की विस्तृत चिकित्सा इस प्रकार से भी -

A . स्थानीय ( Local ) चिकित्सा -

1 . इन्फेक्शन कंट्रोल के Rx लिये - • क्रिस्टेलाइन पेनिसिलीन 2.500 यूनिट + 0 . 5 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट 1 मि . ली . डिस्टिल्ड वाटर में घोलकर प्रति घण्टे पर डालें । एवं ।

• रात को सोते समय कोई ब्राड स्पेक्ट्रम एण्टीबायोटिक आयण्ट मेण्ट ।

•• यदि इस चिकित्सा से भी अल्सर बढ़ता रहे तो - थर्मोकाटरी अथवा  कार्बोलिक एसिड से जलावें 

2 . आँख के लिये विश्राम ( Rest to the Eye )एट्रोपीन आयन्टमेण्ट 1 % दिन में 2 बार लगावें । 

• डार्क ग्लासिस ( गहरे रंग के चश्मे ) अथवा शेड ( Shade ), पर आँख पर पट्टी न बाँधे । 

3 . दर्द निवारण के लिये → एनाल्जेसिक एवं गर्म सेक ( Analgesic & Hot Compress ) कोकेन ड्राप भूलकर भी प्रयोग न करें । इससे अल्सर बढ़ता है । 

4 . यदि पास में कोई सेप्टिक फोकस हो तो  -  ले क्रीमल सेक ( Lacrimal Sac ) का बराबर निरीक्षण करें । यदि Chronic Dacryocystis उपस्थित हो तो बिना किसी विलम्ब के सेक ( Sac ) को हटा दें । ।

B . जनरल चिकित्सा -

• शारीरिक रसिस्टेन्स बढाने के लिये । मिल्क इन्जेक्शन 5 मि . ली . माँसपेशी में सप्ताह में 2 बार । 4 सप्ताह तक । 

• विटामिन ए और सी मुख द्वारा ।

सावधान - • स्टेराइड्स का प्रयोग न करें । 
• कोकेन ड्रॉप्स का प्रयोग वर्जित । । 
• पट्टी ( bandage ) का प्रयोग न करें ।


•• स्वच्छ पटल के घाव की विकृतियाँ -

सफेद फुल्ली ( Cornealopacity ) - जब स्वच्छपटल ( Cornea ) का घाव गहरा होता है तो उसके भरने के लिये नई बनी हुई तहें पारदर्शक नहीं होती और वह स्वच्छपटल पर सफेद फुल्ला छोड़ देती हैं । 

• यह फुल्ली यदि तारा ( Pupil ) के ठीक सामने होती है तो यह प्रकाश की किरणों को अंदर जाने से रोक देती है और इससे दृष्टि नहीं के बराबर रह जाती है । । 

• कुछ रोगियों में कार्निया का फुल्ली वाला भाग दुर्बल होता है और सामान्य नेत्र के दबाव ( तनाव ) से ही यह बाहर की ओर उभर आता है । अंत में रोगी इसके बढ़ने से कुरूप लगने लगता है ।

फुल्ली की चिकित्सा - इस प्रकार से -

• बाल अवस्था में यदि फुल्ली हल्की हो तो यह डायोनीन ( Eye mide dionine 2 % ) का मरहम के दिन में 2 बार 3 – 6 माह तक लगाने से काफी कट जाती है । यदि इससे सफलता न मिले तो इसे काला ( Tatooing ) किया जा सकता है । इससे कुरूपता चली जाती है पर दृष्टि में कोई विशेष लाभ नहीं होता है । । 

• जब फुल्ली तारा के ठीक ऊपर हो और नेत्र में ज्योति बहुत कम हो तो उसका उपचार ऑपरेशन द्वारा करना चाहिये । इस चिकित्सा में फुल्ली वाला कार्निया का भाग काटकर निकाल दिया जाता है और किसी मृत व्यक्ति के कार्निया का इसी आकार का भाग काटकर लगा दिया जाता है । नोट - ० जिसकी आँख उसकी मृत्यु के चार घंटे के अन्दर निकाल ली जाती है ।

याद रखिये - सफेद फुल्ली ( Corneal Opacity ) को नाखूना , फोला आदि से भी जाना जाता है । । 

ल्यूकोमा ( Leucoma ) - इसे ' जाला ' या ' माडा ' भी कहते हैं । यह भी ओपेसिटी आफ कार्निया ( Opacity of Cornea ) ही है । इसे नेवुला , मेकुला अथवा ल्यूकोमा से भी जाना जाता है । यह कार्निया के एक छोटे भाग को अथवा पूरे भाग को आक्रान्त करती है । यह कार्निया के आघातिक टिशू पर निर्भर करता है । 

• ल्यूकोमा के अधिक समय तक रहने से ' एथीरोमेटस अल्सर विकास कर जाता है । 

लक्षण -  • यदि Pupillary area के बाहर ‘ ओपेसिटी है तो कोई लक्षण नहीं।

• यदि Pupillary area के अन्तर्गत है तो Visual disturbance होता है । 

चिकित्सा - • यदि ल्यूकोमा ( माड़ा ) छोटा है तो कोई चिकित्सा की आवश्यकता नहीं । केवल Cosmetic treatment निम्न अनुसार प्रयोग में लाया जा सकता है । 

कोसमेटिक चिकित्सा ( Cosmetic Treatment ) - इस चिकित्सा में निम्न प्रकार से ( in the following way ) कार्निया को केमेकल्स के द्वारा काला किया जा सकता है । 

1 . लोकल अनस्थीसिया ( अमीथोकेन हाइड्रोक्लोराइड 0 . 5 % ड्रॉप्स ) के बाद ल्यूकोमा के ऊपर का इपीथेलियम को केटारेक्ट नाइफ से खुरचकर । । 

2 . तीन केमिकल्स यथा 2 % गोल्ड क्लोराइड , 2 % प्लेटीनम क्लोराइड एवं 2 % हाइड्राजीन हाइड्रेट सोल्यूशन को Raw Area पर एक के बाद एक स्वाव स्टिक से तब तक लगाया जाता है जब तक कि सफेद ( Opacity ) काला रंग नहीं पकड़ लेती ।

3 . अतिरिक्त केमिकल्स को धोकर साफकर दिया जाता है और एट्रापीन तथा एण्टीबायोटिक आयण्टमेण्ट को लगाकर 48 घण्टे के लिये पट्टी बाँध दी जाती है । 

नोट -  • काला रंग ( Black Colouration ) 2 साल तक चलता है । 

 पर्याप्त रोशनी लाने के लिये - - ' केराटोप्लास्टी अथवा कार्नियल ग्राफ्ट तथा ओप्टिकल इरोडेक्टोमी की जाती है ।

धूमिल दृष्टि [ Dusty Sight ] रोग के परिचय , चिकित्सा ? Dusty Sight] Introduction to Disease, Medicine?

धूमिल दृष्टि [ Dusty Sight ] 

धूमिल दृष्टि [ Dusty Sight ]  रोग के परिचय , चिकित्सा ? Dusty Sight] Introduction to Disease, Medicine?


रोग परिचयआँखों के आगे अंधेरे धुएं जैसा दिखायी पड़ता है । यह रोग मोतियाबिन्द के प्रारम्भ में उत्पन्न होता है । शारीरिक दुर्घटना के कारण भी यह रोग हो सकता है । यदि लापरवाही से इसकी उचित चिकित्सा न की गई तो जल्द ही आँखों को खराब कर व्यक्ति को अन्धा बना देती है । 


चिकित्सा

• ग्लुकोमाल – प्रारम्भ में 1 बूंद ( 0 . 25 % वाला ) दिन में 2 बार डालें तत्पश्चात् 5 % वाला 1 बूद दिन में 2 बार डालें । 

• पाइलोकार ( Pilocar ) आई ड्राप्स पीडित आँख में 1 - 2 बार डालें । । 

• फिर भी लाभ न मिलने पर नेत्र विशेषज्ञ को दिखायें ।  

• रोग ऑपरेशन से भी ठीक हो सकता है । । 

• उचित कान्टेक्ट लेंस भी लगाया जा सकता है । 

• पौष्टिक भोजन के साथ - साथ हरी सब्जियों तथा फलों का अधिक सेवन । ।

Thursday, June 6, 2019

[ मोतियाबिन्दु कैटारेक्ट - cataract ] रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण एवं चिन्ह , प्रकार , चिकित्सा ? [Cataract Cataract - Cataract] Name, intro, cause, symptom and sign of disease, type, therapy?

[ मोतियाबिन्दु कैटारेक्ट - Cataract ] 

[ मोतियाबिन्दु कैटारेक्ट - Cataract ]  रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण एवं चिन्ह , प्रकार , चिकित्सा ? [Cataract Cataract - Cataract] Name, intro, cause, symptom and sign of disease, type, therapy?
cataract 



नाम - सफेद मोतिया । 

परिचय - नेत्र के क्रिस्टलीय लेन्स की अपारदर्शिता जिससे आंशिक अथवा पूर्ण अन्धत्व होता है । यह जन्मजात अथवा वृद्धावस्था , आघात या मधुमेह के कारण हो सकता है ।  

• इस रोग में आँख के लेंस या उसके आवरण या दोनों धुंधले हो जाते हैं और उस पर एक पर्दा सा आ जाता है ।

• आँख के अंदर का स्वच्छ पारदर्शक लेंस जब कठोर और धुंधला हो जाता है तब नेत्र की ज्योति बिल्कुल नष्ट या कम हो जाती है और देखने की क्षमता नष्ट हो जाती है । पहले अंदर और फिर आँख की पुतली में सफेद फली दृष्टिगोचर होती है । वही ' मोतियाबिन्द कहलाता है । 

मोतियाबिन्द भारत में बहुतायत से पाया जाता है । यह रोग साधारणतः 40 वर्ष की अवस्था के बाद उत्पन्न होता है किन्तु किसी भी अवस्था का व्यक्ति इस रोग से आक्रान्त हो सकता है । इस रोग में मोती या लेंस जो पारदर्शक होता है शनैः शनैः धूमिल होकर अपारदर्शक स्थिति को प्राप्त हो जाता है और रोगी को दिखायी देना बन्द हो जाता है ।

मातियाबिन्द के कारण -

• मोतियाबिन्द के बनने का असली कारण अभी तक पता नहीं । 

• रोगी की बढ़ती हुई उम्र , भोजन में मुख्य तत्वों ( प्रोटीन एवं विटामिन्स ) की कमी , तपते हुए सूरज की गर्मी एवं अन्य शारीरिक रोग मोतियाबिन्द में सहायक । । 

• नेत्र में चोट लगना , परितारिका रोमकपिण्ड शोथ , दृष्टिपटल वियोजन आदि अन्य कारण । 

• अल्ट्रा वायलेट चिकित्सा के अधिक प्रयोग से । 

• कुछ जहरीली दवाइयों की गठना हो सकती है । 


मोतियाबिन्द के लक्षण एवं चिन्ह -



• यह रोग एक या दोनों आँखों में शनैः शनैः कई मास या वर्षों में उत्पन्न हो जाता है । । 

• दूष्टि धीरे - धीरे घटती चली जाती है । साथ ही देखने की क्षमता लुप्त होती जाती है । अन्त में एकदम दिखायी नहीं पड़ता है । 

• देखने में प्रत्येक वस्तु बड़ी दिखायी देती है । । 

• बिजली के बल्ब के प्रकाश को देखने पर अन्तर प्रतीत होता है और प्रकाश के चारों ओर नीली - हरी दिखायी देती है । तारों और चाँद को देखने पर एक की बजाय कई दिखायी देते हैं । । 

• कभी - कभी रोगी को नेत्रों के सामने काला स्थिर धब्बा दिखायी देता है ।


मोतियाबिन्द 2 प्रकार का होता है• कोमल तथा • कठोर । । 

कोमल मोतिया - इसका रंग पूर्ण नीला तथा उत्पत्ति बाल्यावस्था से लेकर 35 वर्ष की आयु तक होती है । 

कठोर मोतिया - इसका रंग धुमैला या पीला आभा लिये होता है तथा उत्पत्ति वृद्धावस्था में होती है । 


मोतियाबिन्द की स्थिति 2 प्रकार की -

• मोतियाबिन्द की अपक्व स्थिति ( Immature Cataract ) । 

• मोतियाबिन्द की पक्व अवस्था ( Mature Cataract )

मोतियाबिन्द की अपक्व स्थिति - इस अवस्था में रोगी को कभी - कभी दो - दो आकृतियाँ दिखायी देती हैं । 

• मोतियाबिन्द की पक्व अवस्था जब नेत्र की दृष्टि बिल्कुल मंद हो जाती है और | रोगी को केवल अंधकार और प्रकाश का ही बोध रह जाता है । यही मोतियाबिन्द की शस्त्रकर्म द्वारा निकाल देने की सही अवस्था है ।


कभी - कभी मोतियाबिन्द और सबलवाया साथ - साथ भी -

कभी - कभी यह देखा गया है कि वृद्धावस्था में मोतियाबिन्द एवं सबलवाय नेत्र में एक साथ हो जाते है जाते हैं । ऐसी स्थिति में -

• ऐसे रोगी दृष्टिमंदता के साथ - साथ मस्तिष्क में पीड़ा का भी अनुभव करते हैं । 

• दृष्टि अधिक शीघ्रता से गिरती जाती है । 

• समय से चिकित्सा न करने पर मोतियाबिन्द के पकने के पूर्व ही दृष्टि तंत्रिका ( Optic | Nerve ) के क्षीण होने से दृष्टि का ह्रास हो जाता है । 

याद रखिये - 
काला मोतिया ( ग्लोकोमा ) - नेत्रगोलकों पर बढ़े हुए दबाव के कारण पैदा हुई स्थिति को लोकोमा , काला मोतिया या नीला मोतिया कहते हैं । सामान्य नेत्रों में जलद्रव पाया जाता है जो नेत्रों में बेरोकटोक चक्कर काटता रहता है । दबाव के सामान्य सीमा में रहने पर ही यह जलद्रव नेत्रों की आकृति व सीमा को बनाये रखता है । यदि किसी कारणवश छोटी नलिकायें , जिनसे द्रव बाहर निकलता है , बन्द हो जायें तो दबाव बढ़ जाता है । वह बढ़ा हुआ दबाव नेत्र के उन नाजुक हिस्सों को नष्ट कर सकता है , जो कि नेत्र के सामान्य कारणों के लिये उत्तरदायी हैं । 


सावधान - काला मोतिया और मोतियाबिन्द अलग - अलग हैं । दोनों की दशायें अलग हैं । पर30 वर्ष की आयु के बाद ही दोनों होते हैं इसीलिये भूल होती है । 


मोतियाबिन्द लक्षण एक दृष्टि में -

• रोग आमतौर पर वृद्धावस्था में । । 

• क्रमशः पीड़ाविहीन दृष्टिनाश । ।

• रोग के विकास काल में एक के दो दिखना । । । 

• एक वस्तु कई दिखायी देती हैं । । 

• सामान्यतः एक लेंस प्रभावित । । 

• बाद में दोनों आँखों में अपारदर्शकता पूर्वतः ( आपेसिटी ) विकिसत हो सकती है । 

लेंस का रंग भूरा - सफेद हो जाता है ।


•• मोतियाबिन्द की चिकित्सा → 



• इसकी कोई प्रभावशाली औषधि चिकित्सा नहीं ।  

• जब मोतियाबिन्द पक जाय तब ऑपरेशन ही एकमात्र चिकित्सा है । । 

• डिटेचमेण्ट आफ रेटिना । 

नोट - मोतियाबिन्द का ऑपरेशन के अलावा और उपचार नहीं है । अतएव योग्य डाक्टर से ऑपरेशन कराकर इससे छुटकारा पायें ।


निम्न औषधियों से प्रारम्भ में कुछ आंशिक लाभ मिल सकता है  -

1 . सिनेरिया मेरिटीमा ( होम्योपैथिक औषधि ) - 1 - 2 बूद दिन में 2 - 3 बार आँख में डालें ।

नोट - यह औषधि रोग के प्रारम्भ में लाभ पहुँचाती है । इससे मोतिया उतर जाता है और ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती है । 

2 . एट्रोपीन ( Atropine )  -  रोगग्रस्त आँख में डालने से पुतली फैलकर किसी सीमा तक दृष्टि साफ रहती है । 

3 . फाइब्रोलाइसिन ( Fibrolycin - मर्क )  -  2 - 3 बूंद रोजाना 3 बार आँख में डालें ।

4 . कैटेलिन ( Catalin ) विलशायर ।  -  1 टिकिया 15 मि . ली . घोलक के साथ आती है । टिकिया को घोलक में घोलकर 1 - 2 बूंद की मात्रा में हर 4 - 5 घण्टे पर डालें ।

नोट - रोग की प्रारम्भिक अवस्था में लाभ पहुँचाती है ।


कुछ तथ्य कुछ सुझाव -

• मोतियाबिन्द के रोगी को आरम्भ से ही योग्य नेत्र विशेषज्ञ के पास जाकर अपने नेत्रों की जाँच करा लेनी चाहिये ।

• यदि मोतियाबिन्द पका नहीं है तो उसे 2 - 3 माह के अन्तर से नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लेते रहना चाहिये । । 

• इसका ऑपरेशन बहुत ही आसान है । इस ऑपरेशन में अपारदर्शक मोती को बाहर निकाल दिया जाता है जिससे प्रकाश पुनः दृष्टिपटल तक पहुँचने लगता है । । 

• मोतियाबिन्द का ऑपरेशन किसी भी ऋतु में किया जा सकता है किन्तु जाड़े के ऋतु में रोगी बड़े आराम से चित्त लेट सकता है । इसीलिये इस ऋतु में अधिक संख्या में रोगी ऑपरेशन कराने के लिये विभिन्न नेत्र चिकित्सालयों में भर्ती होते हैं । 

नोट - ० केटालिन आई ड्रॉप्स ( Catalin eye drops ) दिन में 4 बार 2 माह तक डालें । केस को आई हॉस्पिटल के लिये रेफर कर देना चाहिये । →

ग्लोकोमा [ Glaucoma ] रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण , निदान , परिणाम , प्रकार , चिकित्सा ? Glaucoma [Glaucoma] Name of disease, intake, cause, symptoms, diagnosis, results, type, therapy?

ग्लोकोमा [ Glaucoma ] 

ग्लोकोमा [ Glaucoma ] रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण , निदान , परिणाम , प्रकार , चिकित्सा ? Glaucoma [Glaucoma] Name of disease, intake, cause, symptoms, diagnosis, results, type, therapy?
glaucoma



नाम - अधिमथ , नेत्र पौड़ा ( Extreme Pain in Eves ) । इसे सामान्य बोलचाल में सबलबाय ' भी कहते हैं । कोई - कोई इसे ' कालापाना ' भी कहते हैं । 

परिचय - बढ़ा हुआ आन्तरनैत्रिक दबाव । ग्लोकोमा का प्रमुख चिन्ह नेत्र में तनाव में वृद्धि है । जिससे दूष्टि तंत्रिका तन्तु एवं दृष्टि तंत्रिका पर अनावश्यक दबाव पड़ने से दूष्टि मंद हो जाती है । नेत्र का सामान्य तनाव ( Normal intra0cular pressure ) लगभग 15 से 20 मिलीमीटर पारा ( mmHg ) के बराबर होता है । जब यह सामान्य से बढ़कर नेत्र के कोमल भागों पर दबाव डालता है तो रोग के लक्षण पैदा होने लगते हैं । इसे ' काला मोतिया ' भी कहते हैं ।


रोग के सामान्य कारण 



• अधिकतर 40 साल की आयु के बाद होता है । वास्तविक कारण अज्ञात । । 
• नेत्र में नेत्रोद का अधिक मात्रा में बनना । । 

• नेत्रों से नेत्रोद का यथेष्ट मात्रा में बाहर की ओर न निकलना । यह कारण अधिक महत्व का है । 

• चोट , खरोंच , ऑप्टिक - नर्व की विकृति आदि अनेक कारणों से आँखों में जब दीर्घकाल तक दर्द रहता है तब ग्लोकोमा हो जाता है ।


रोग के सामान्य लक्षण 



• नेत्रों में पीड़ा एवं स्पर्शा - सहायता ( टेन्डरनेस ) । । 

• आधे सिर में भयंकर दर्द । । 

• कुछ ही घंटों में रोगी ( Acute Stage ) को धुंधला दिखायी देने की शिकायत कर सकता है एवं चमकदार रोशनी के चारों ओर इन्द्रधनुष या प्रभामण्डल दिखायी देने लगता है । 

• धीरे - धीरे दृष्टि कम होती जाती है । । 

• आँखों में रक्ताधिक्य अधिक महत्वपूर्ण । । 

• कार्निया पर धुंधलापन । । 

• आँख की पुतली अनियमित रूप से चौड़ी हो जाती है । एवं कभी - कभी खड़े आकार में अण्डाकार हो जाती है । 

• पुतलियों पर प्रकाश की प्रतिक्रिया नहीं । । 


रोग निदान → 

• प्रारम्भिक अवस्था में ग्लोकोमा का निदान बहुत कठिन है । किन्तु यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रति वर्ष सावधानी के रूप में अपने नेत्रों की परीक्षा यदि नेत्र विशेषज्ञ द्वारा सदैव कराता रहे तो इसका निदान सहज है । 

• 35 वर्ष की अवस्था के बाद इस प्रकार की परीक्षा कराते रहना अनिवार्य है।


रोग का परिणाम 


• रोग की उचित चिकित्सा न करने से दृष्टि मन्द पड़कर अन्त में स्थायी अंधापन उत्पन्न हो जाता है ।

नोट - सभी ऐसे व्यक्तियों को जिनके चश्मे के नम्बर में शीघ्र परिवर्तन होता हो , आध मस्तिष्क में पीड़ा बनी रहती हो तथा दीपक के चारों ओर रंगीन घेरे दिखायी देते हों , विशेष रूप से ग्लोकोमा को ध्यान में रखकर अपने नेत्रों की परीक्षा करानी चाहिये ।

० नेत्र की परीक्षा रेटीनोस्कोप ' , सेल्फ लमीनस डाइरेक्ट आफ्थेल्मोस्कोप से की जाती है । ' ओकुलर प्रेशर की माप Schiotz Tonometer से की जाती है । 

•• ग्लोकोमा के प्रकार ( Kinds of Glaucoma ) ••

प्राइमरी ग्लोकोमा - वह जो किसी अन्य रोग के बिना पाया जाता है । प्रौढ़ों में यह आंशिक अथवा पूर्ण अन्धत्व का सामान्य कारण है । 

क्लोज्ड एन्गल ग्लोकोमा वह जो निकास कोण की नैसर्गिक त्रुटि के कारण होता है । एवं प्राथमिक अथवा द्वितीयक हो सकता है । यह पीड़ा एवं दृष्टि के धुंधलेपन के कारण तीव्र अथवा पीडा नहीं होने पर दीर्घकालीन हो सकता है । जिसमें दृष्टि का लोप धीमे - धीमे होता है ।

ओपेन एन्गल ग्लोकोमा दीर्घकालिक प्राथमिक ग्लोकोमा जिसमें कोण खुला हुआ रहता है किन्तु निकासी धीमे - धीमे समाप्त हो जाती है । 4 . 

सेकेण्डरी ग्लोकोमा वह जो किसी नेत्र रोग के आन्तर नेत्रिक दबाव बढ़ने से जटिल हो जाने के कारण होता है ।


•• ग्लोकोमा / सबलवाय की चिकित्सा ••

• शीघ्र से शीघ्र नेत्र विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दें । ताकि अंधेपन से बचा जा सके । → 

• पाइलोकापन 4 % ( पाइलोकार - F . D . C ) को दिन में 5 - 6 बार डालें । 
• एसीटोजोलामाइड ( डायामोक्स - Diamox ) 500 मि . ग्रा . टिकिया । ऐसी 1 टिकिया । तत्काल दें एवं 250 मि . ग्रा . 6 - 6 घण्टे से इण्ट्रा - आकुलर टेन्शन को कम करने हेतु ग्लोकोमा के सभी मरीजों में दें । → 

• मेनीटोल आई . वी . दें । अथवा ग्लिसरोल मुख द्वारा ।

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•• ग्लोकोमा की विशेष चिकित्सा -

एक्यूट ग्लाइकोमा -
Rx

• गैरासोन आई ड्रॉप्स ( Garasone eye drops ) ( गैरामाइसीन , डेक्सामेथासोन ) दिन में 6 बार 3 दिन तक । 

• डायामोक्स टैबलेट ( Diamox Tab ) 2 टिकिया । तत्पश्चात् 1 टिकिया प्रति 6 घण्टे पर3 दिन तक । । 

• पाइलोकार 2 % ड्रॉप्स ४ दिन में 4 बार 3 दिन तक । चिकित्सा प्रारम्भ कर , बाद को किसी नेत्र चिकित्सालय के लिये रोगी को रेफर ( Refer ) कर देना चाहिये । ( यह एक इमरजेन्सी की स्थिति है ) ।

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( 1 ) ओपिन एन्गल अथवा सिम्पल ग्लोकोमा की चिकित्सा ( Treatment of 0pen Angle 0 Simple Glaucoma ) -

Rx

• मेडिकल चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य टेन्शन को कण्ट्रोल करना है । एवं  

• शल्य चिकित्सा आखिरी प्रयास ( Last resort ) । 

• टिमोलोल मेलिएट ( Timolol Maleate ) 0 . 25 % अथवा 0 . 5 % ड्रॉप्स दिन में 2 बार । । 

• डिपीवायलिल इपीनेफ्रीन ( Dipivalyl epinephrine ) 0 . 1 % ड्रॉप्स x दिन में 2 बार । । → 

• पाइलोकार्पोन ( Pilocarpine ) 2 % ड्रॉप्स दिन में 2 - 4 बार ।

•• यदि टिमोलोल असफल हो जाये तब ‘ डिपीवायलिल इपीनेफ्रीन ड्राप्स मिलाकर डालें । यदि टेन्शन कण्ट्रोल करने में यह भी फेल हो जाये तो कार्बोनिक एनहाइड्रेज ( Carbonic anhydrase ) मिलायें । एवं शल्य चिकित्सा की योजना बनावें । 

नोट - इसमें ट्रेवेकुलेक्टॉमी अथवा Schics Operation किये जाते हैं ।  

( 2 ) क्लोज्ड अथवा नेरो - एन्गल ग्लोकोमा ( Closed or Narrow Angle ( Glaucoma ) -

Rx  

• पाइलोकार्पोन नाइट्रेट 2 % अथवाएजरीनसल्फ0 . 5 से 1 % दिन में 3 बार डालें । 

• फेल होने पर ऑपरेशन । 

• ऑपरेशन से पूर्व उपद्रवों को इस प्रकार कण्ट्रोल करें -

• दर्द तथा शान्ति के लिये - एनाल्जेसिक ( Analgesics ) दें । । 

• पाइलोकापन 20 % ड्रॉप्स – माइओसिस पैदा करने के लिये । ( To produce Miosis ) ,

• डायामोक्स टैबलेट - 2 टि . तत्काल । तत्पश्चात् 1 टि . हर 6 घण्टे पर । 

• आई . वी . मेनीटोल ( Mannitol ) बहुत प्रभावकारी ।  

• बेसोमोटर फेनोमेनोन दूर करने के लिये — सिस्टेमिक एवं लोकल स्टेराइड्स दिन में 2 या 3 बार दें ।

•• एक बार टेन्शन नीचे आने और कंजेशन दूर हो जाने पर गोनियोस्कोपी करें तत्पश्चात् तद्नुसार ऑपरेशन की व्यवस्था । 
( 3 ) इन्फेन्टाइल ग्लोकोमा ( Infantib Glaucoma ) -

• एकमात्र शल्य चिकित्सा ( Treatment is surgical ) । 

• मेडिकल चिकित्सा ओपरेशन पूर्व सहायक । → 

• गोनियोटोमी केवल टेन्शन को 70 - 80 % केसिस में कण्ट्रोल करता है ।

परितारिका शोथ [ आइराइटिस - Iritis ] रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण , चिकित्सा ? Irisitis [Iritis - Iritis] Name of disease, intake, cause, symptoms, therapy?

परितारिका शोथ [ आइराइटिस - Iritis ] 

परितारिका शोथ [ आइराइटिस - Iritis ] रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्षण , चिकित्सा ? Irisitis [Iritis - Iritis] Name of disease, intake, cause, symptoms, therapy?
iritis



नाम

परितारिका शोथ । आँख के उपतारा की शोथ । तारामण्डल शोथ । 


परिचय - 

आँख के उपतारा का प्रदाह , जो पीड़ा , प्रकाशसंत्रास , प्यूपिल का संकुचन एवं आइरिस की रंगहीनता उत्पन्न करता है । 

' Inflammation of the Iris is called Iritis . '


रोग के कारण -

• आँख में चोट लगना ।

• नेत्रों से अधिक काम लेना एवं बारीक काम करना । । 

• मसूड़ों में पीप / पायरिया रोग । । 

• दाँतों में कीड़े ( कृमि दन्त ) । 

• तालुग्रन्थि के कीटाणुजन्य रोग । → 

• यक्ष्मा , उपदंश , सुजाक आदि विविध रोग । । 

• पुराने संक्रामक घाव । । 

• गठिया , मधुमेह , जीर्ण कब्ज , अजीर्ण अथवा आँत में सूजन । ।


रोग के लक्षण -

• प्रायः एक नेत्र का उपतारा ही प्रभावित होता है । 

• अत्यन्त पीड़ा । 

• कॉर्निया के चारों तरफ रक्ताधिक्य । । 

• उपतारा का वर्ण धुंधला । 

• पुतली सिकुड़ी हुई , शिथिल एवं टेढ़ी - मेढ़ी । । 

• पीड़ित नेत्र में भिन्न दिखायी देता है एवं उसमें तीव्र दर्द , जो कनपटी और माथे तक जाता है । । 

• प्रकाश और धूप सहन करने में असमर्थता । । 

• कुछ दिनों में दृष्टि मंद । । 

• कभी - कभी रोग पुराना होने पर दोनों आँखें प्रभावित हो जाती हैं ।


नोट -  • चिकित्सा न करने पर आँखों में जाला ( Opacity of Cornea ) पड़ जाता है या मोतिया बिन्दु उतरकर रोगी अन्धा हो जाता है । 


•• तारामण्डल शोथ ( Iritis ) की चिकित्सा ••

• नेत्रों का संरक्षण ( Protection ) आवश्यक । । 

• पीड़ा के लिये डिस्प्रिन / एनाल्जिन - दिन में 3 बार । 

• एण्टी - इन्फ्ले मेटरी - यथा - ब्रुफेन ( Brufen ) 1 - 1 टि . दिन में 3 बार । 
• सेप्ट्रान ' या ' एम्पीसिलीन का कोर्स दे  । । 

• बीटामीथासोन 1 / 2 मि . ली . + मीडूियाकेन इन्जे . 0 . 3 मि . ली , दोनों मिलाकर सबकन्जक्टाइवल इन्जेक्शन दे सकते हैं ।


स्थानीय चिकित्सा - एट्रोपीन आई ड्रॉप्स ( 16 ) 2 - 4 बूंद दिन में 3 - 4 बार डालें । । अथवा → 

• बेटनीसाल / एल्यूकोर्ट ड्रॉप्स / सोफाकोर्ट आई ड्रॉप्स - दिन में 4 – 6 बार प्रभावित आँख में डालें ।  

• सोते समय बेटनीसोल आई आयन्टमेण्ट लगावें ।

Monday, June 3, 2019

गुहेरी [ स्टाई - Stye ] होर्डिओलम रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्ष्ण , चिकित्सा ? Guhaari [Styi] Stye - Name, intro, cause, symptom, therapy, of Hordial disease?

गुहेरी [ स्टाई - Stye ] होर्डिओलम 

गुहेरी [ स्टाई - Stye ] होर्डिओलम रोग के नाम , परिचय , कारण , लक्ष्ण , चिकित्सा ? Guhaari [Styi] Stye - Name, intro, cause, symptom, therapy, of Hordial disease?
stye



नाम -

अंजनहारी , गुहाजनी । अंग्रेजी में इस्टर्नल होर्डिओलम ( External Hordeolum ) । अन्जना , पलक के नीचे फुन्सी , नेत्रबरौनियों की तैल ग्रन्थियों का प्रदाह । । 


परिचय - 

Stye is on acute inflammation of one of zeiss gla nds , usually ending in subburation ,

नेत्र की पलकों के किनारे पर दाने या लाल रंग की एक या अधिक फुन्सियाँ हो जाती हैं जिसे गुहेरी स्टाई - Stye ) कहते हैं । इसे क्षेत्रीय भाषाओं में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है । इसके छने पर दखन तथा नेत्र में बहुत अधिक दर्द का आभास होता है । तीन - चार दिन के बाद उसमें पीप पडले स्वयं फट जाती है । कभी - कभी कई गुहेरियाँ एक साथ निकल आती हैं ।


रोग के कारण -



• कब्ज ( कॉन्स्टीपेशन - Constipation ) कामवासनात्मक विचारों की अधिकता । 

• नवयुवक एवं क्वयुवतियों की आँखों में स्टेफिलोकोकस जीवाणु संक्रमण से । 

• विटामिन ए और डी का अभाव । । 

• अजीर्ण एवं दृष्टि की कमजोरी । → 

• दूषित जल से नेत्र धोने या गंदे हाथों के सम्पर्क से भी । 

• धूप और अधिक सर्दी , उष्ण , खट्टे मीठे . तेल - मिर्च और अधिक मसालों के खाद्य पदार्थ अधिक सेवन करने से  भी ।



रोग के लक्ष्ण -




• तीव्र पी एवं कठोरता ( Acute pain and tenderness ) । । 

• पलक के किनारे एक विशेष प्रकार पाइन्ट ( Aparticular point on the lid margin ) । ।

• प्रारम्भ में पलक के किनारे कड़ी और मुलायम स्थानीय सूजन । । 

• सम्पूर्ण पलक के मार्जिन पर द्रव जन्य शोथ । । 

 सिलिया के आधार के निकट एबिसस का पाइन्ट बनता है । 

• पीप निकल जाने के बाद पीड़ा शान्त ।


विशिष्ट कारण ( Special or Main Causes )  -  • यह स्टेफाइलोकोकाई द्रारा उत्पन्न होती है । 

• यह झुंड ( Crops ) में निकलती हैं । एक के बाद अनेक । ऐसा विचार है कि जन व्यक्तियों में स्टेफाइलोकोकाई के प्रति निम्न क्षमता ( Low Resistance ) होती है उनमें अधिक निकलती है । 

• दुर्बल व्यक्तियों में अधिक कामन हैं । 

• इनके निकलने में अस्वच्छता अधिक सहायक ।


याद रहे संक्रमण से नेत्र के पलकों में छोटी सी कील के बराबर सूजी हुई तथा लाल फुसी निकलती है । इसमें कम या अधिक पीड़ा तथा जलन होती है । कुछ ही दिनों में पक जाती है । फुन्सी के समान कील के शिखर पर पीला चिन्ह दीख पड़ता है जो पीप पड़ने का सांकेतिक चिन्ह है । पीप पड़ने के बाद वह स्वतः फट जाती है ।

• इससे रोगी को बहुत पीड़ा होती है क्योंकि गुहरी पलकों के किनारे निकलती है । इसलिये पलक खोलते - बन्द करते समय अधिक पीड़ा होना स्वाभाविक है ।


गुहेरी की औषधि चिकित्सा -

• गुहेरी निकलने पर पहले हलके गरम ( कुनकुने ) जल में बोरीक पाउडर मिलाकर नेत्रों को साफ करें । तत्पश्चात् -

• गुलाब जल नेत्रों में डालें । इससे जलन और पीड़ा कम होती है । 

नोट - कपड़े या रुई की गद्दी बनाकर उसे मामूली गरम करके सेंक करना चाहिये । । 

• यदि पहले से ही उसमें पीप पड़ गई हो तो उसके बीच के बाल को इस प्रकार चिमटी से पकड़कर खींचे कि उसके अंदर की सारी वस्तु बाहर निकल आयें । तत्पश्चात् -

• निओस्पोरिन अथवा टैरामाइसीन आफ्थेल्मिक आयटमेण्ट लगायें । । 

• व्रॉडिसिलीन ( Broadicilin - अल्केम ) 500 मि . ग्रा . एवं बच्चों को 250 मि . ग्रा . का इन्जेक्शन गहरे मॉस में नित्य लगावें । ।

• घाव पर रात सोते समय सोफामाइसीन आफ्थेल्मिक आयन्टमेण्ट । ।  

• खाने के लिये रॉशिलीन ( Roscilin - रैनवैक्सी ) 250 मि . ग्रा . का 1 कै . हर 8 घण्टे पर दें । शिशुओं को पीडियाट्रिक ड्राप्स 125 मि . ग्रा . प्रति 12 घण्टे पर । 

नोट -  अभाव में कै . टैरामाइसीन / कै . रेस्टेक्लीन 250 मि . ग्रा . ( 1 - 1 कै . ) दिन में 2 - 3 बार 5 दिन तक दे सकते हैं । 

• यदि स्टाई बार - बार हो जाती हो तो नेत्र के परीक्षण के लिये रोगी को नेत्र विशेषज्ञ के पास भेज दें ।


•• गुहेरी में प्रयुक्त विशिष्ट व्यवस्थापत्र

Rx 

• एम्पीसिलीन कैप्सूल 500 मि . ग्रा . - 1 कै . दिन में 3 बार x 5 दिन तक मात्र । । 

• वेनमाइसेटिन आई ड्रॉप्स ( Vanmycetin Eye drops ) – दिन में 5 बार 15 दिन तक । 

• क्लोरोमाइसेटिन ( Chloromycetin ) एप्लीकेप - रात सोते समय प्रभावित आँख में लगावें । x 15 दिन तक । 

• सुप्राडिन टेबलेट ( Supradin Tabs ) - मल्टी विटामिन्स 1 टिकिया नित्य 15 दिन तक । 

• सिकाई ( Foementation ) x दिन में 2 बार 5 दिन तक । 


कुछ लोग गुहेरी की चिकित्सा इस प्रकार से भी करते हैं । -

• हाट कम्प्रेश ( गर्म सेक ) दिन में 2 - 3 बार । 

• इन्जेक्शन क्रिस्टेलाइन पेनिसिलीन - 500 , 000 ( 5 लाख ) यूनिट x प्रतिदिन 4 - 5 दिन तक । → 

• बैक्ट्रिम डी . एस . - 1 टि , दिन में 3 बार 6 दिन तक । 

• यदि पीप ( Pus ) बन गया हो तो पीप को दबाकर निकाल दें । अथवा चाकू से चीरा लगाकर पीप को निकालकर पलक को साफ कर कोई सा एण्टीबायोटिक आफ्थेल्मिक मरहम लगावें । ।

रोहे ट्रैकोमा [ Trachoma ] रोग के पर्याय नाम , परिचय , रोहे , कारण , लक्षण , पहिचान , परिणाम , चिकित्सा ? Rohche trachoma [syn: name, intro, rhythm, cause, symptom, recognition, outcome, therapy of the disease?

रोहे ट्रैकोमा [ Trachoma ] 

रोहे ट्रैकोमा [ Trachoma ] रोग के पर्याय नाम , परिचय , रोहे , कारण , लक्षण , पहिचान , परिणाम , चिकित्सा ? Rohche trachoma [syn: name, intro, rhythm, cause, symptom, recognition, outcome, therapy of the disease?
trachoma



पर्याय नाम – 

कुकरे , दाने । नेत्र का भयंकर रोग पोथकी । । 


परिचय

एक संसर्गी श्लेष्मकला शोथ ( Infective Conjunctivitis ) जिसमें झिल्ली पर कणिकाओं का निर्माण और पलकों का संकुचन एवं फलस्वरूप क्षतचिन्ह निर्माण होता है । बहुधा अंधेपन में परिणित होती है ।

• • ट्रेकोमा एक ऐसा रोग है जो कंजंक्टिवाइटिस से मिलता - जुलता है । इस बीमारी में पलकों की भीतरी सतह पर दाने निकल आते हैं और आँखें दुखने लगती हैं । यह भी एक छत की बीमारी है और अधिकतर शिराओं एवं छोटे बच्चों को यह बीमारी जल्दी लगती है । । 

रोहे

भारत में ही नहीं वरन् पूरब एवं दक्षिण - पूरबी एशिया में विस्तृत रूप से पाये जाते हैं । यह रोग इस भाग के पिछड़े एवं विकासशील देशों में 50 - 60 % दृष्टिविहीनता का मुख्य कारण है । भारत में पंजाब , राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में रोहों का अत्यधिक प्रकोप है । निम्न वर्ग के लोग अज्ञान एवं लापरवाही वश इस रोग से आक्रान्त होकर अपनी दृष्टि खो बैठते हैं । विश्व के डेढ़ करोड़ नेत्रहीनों में से 50 लाख नेत्रहीन भारत में हैं ।


रोग के कारण → 



• यह क्लेमाइडिआ की एक प्रजाति अथवा ' वेडसोनिया नामक जीवाणु से उत्पन्न होता है ।

• छोटी उम्र के बालक अधिक प्रभावित । विशेषकर निर्धन वर्ग के । ।  

• शुष्क एवं धूलयुक्त वातावरण में प्रकोप अधिक । 

• बच्चों में बचपन की आयु में पर्याप्त पौष्टिक व संतुलित आहार न मिलने से । कुपोषण के कारण रोग का आक्रमण । 

• लालटेन या दूर से आती रोशनी में अधिक पढ़ने - लिखने से प्रायः दृष्टि क्षीण होने पर नेत्रों में शोथ होकर । । 

• वर्षा ऋतु में गली मुहल्लों की विशेष गंदगी संक्रमण प्रसार में सहायक ।


रोग के लक्षण 




• रोग का प्रारम्भ आँखें दुखनी ( Conjunctivitis ) के साथ जाम । 

• आँखें लाल एवं उनसे पूय ( Pus ) का स्राव जारी । । 

• साबूदाने के समान दाने ( Follicles ) या दानों के सूखने के बाद मोटी झिल्ली जमना तथा स्वच्छपटल के ऊपर रक्तवाहिनियों के छा जाने ( Pannus ) के रूप में दिखायी देते हैं । 

• प्रारम्भ में कोई पीडा नहीं । 

• रोग बढ़ने पर नेत्रों में कडक होन " ( खुजली चलना ) । पानी अथवा मवाद बहना , नेत्रों का चिपक जाना , धुप में उनको न खोल पाना , नेत्रों का लाल बने रहना , पलकों का भारी रहना तथा कभी - कभी उनमें पीडा रहना आदि लक्षणों से पीड़ित रहना आदि होते हैं ।


प्रायः ऐसा होता है - 

• ' रोहे या ‘ कुकरे ( Trachoma ) अधिकतर पुराने होने पर हो । चिकित्सकों द्वारा देखा जाता है , क्योंकि लोग पहले इसका स्वतः उपचार करते हैं । साथ ही घर ले । औषधियों का उपयोग करते हैं । जब रोगी की आँखों की पलकों को उठाकर देखा जाता है तब पलकों के आंतरिक छोर पर दाने तथा लाल रंग की धारियाँ दिखायी देती हैं । इस समय रोगी की शिकायत होती है कि उसकी आँखों में खुजली ,  पानी निकलन  , जलन तथा प्रकाश में चौंध सी होती है । 

• यह एक या दोनों आँखों में हो सकता है ।


रोग की पहिचान -



निम्नलिखित में से किन्हीं दो । चिन्हों की उपस्थिति रोग निदान में सहायक → 

• दाने ( Follicles ) । 

• इपीथेलियल केराटाइटिस । । 

• रक्तवाहिनियों के छा जाने ( Pannus ) 

• कंजंक्टाइवा में स्केरिंग ( Scarring of Conjunctiva )


रोग का परिणाम -

• 10 - 15 प्रतिशत रोगी बिना किसी उपचार के रोग मुक्त । 

• शेष रोगियों में उपचार के अभाव में या तो पलकों में स्वच्छपटल ( Cornea ) में विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । 

• पलकों का मोटा होना या भारी होना , बरौनियों का नेत्रों के अंदर की ओर मुड़ना ( Trichiasis ) अथवा पलकों के किनारों का अंदर की ओर मुड़ जाना तथा कार्निया पर घाव बना देता है ।


नोट - कभी - कभी रक्तवाहिनियों का सारे स्वच्छपटल पर छा जाना और उसकी पारदर्शकता को नष्ट कर देना आदि विकृतियाँ होकर अन्धापन उत्पन्न हो जाता है । 

• रोहें की उपयुक्त चिकित्सा -

• यदि आँखों की लाली किसी रोगी के नेत्रों में हो जाये तो उसकी पलकों को थोड़ा पलटकर अवश्य निरीक्षण कर लें , कहीं रोहें तो नहीं हैं यदि हैं तो तत्काल निम्न क्रमानुसार व्यवस्था करें,

• स्वच्छता की ओर विशेष हिदायत । वह अपना रूमाल / तौलिया अलग रखें । । 

• पौष्टिक आहार की व्यवस्था । । 

• जेनसील आई ड्रॉप्स ( Gencyl Eye drops - I . D . P . L . ) 

• अलसाइक्लीन मरहम ( Alcycline Oint - एलेम्बिक ) → 

• एल्बूसिड आई ड्रॉप्स ( Albucid eye drops ) नि . निकोलस दिन में 2 बार नियमित रूप से 2 - 3 माह तक । 

• टे . बैक्ट्रिम डी . एस . - 1 - 1 टि . प्रातः सायं 1 सप्ताह तक ।


ट्राकोमा की चिकित्सा ऐसे भी -

Rx 

• टेट्रासाइक्लीन आई आयन्टमेण्ट – रात सोते समय 3 माह तक । 

• सल्फासिटामाइड 20 % ड्रॉप्स दिन में 6 बार3 माह तक । । 

• सामान्य स्वास्थ्य की उन्नति आवश्यक । 

• टेट्रासाइक्लीन अथवा इरीथ्रोमाइसिन 1 ग्राम नित्य 4 मात्राओं में विभाजित कर3 सप्ताह तक । → 

• डोक्सी - साइक्लीन ( Doxy - Cycline ) 5 मि . ग्रा . । किलो भार पर प्रति माह 1 बार ( once per month ) लाभकर । ।


नोट - 

 यदि कार्निया में घाव हो गये हो तो – एट्रोपीन आयन्टमेण्ट 1 % दिन में  बार लगावें । 

• टेट्रासाइक्लीन , इरीथ्रोमाइसीन , रिफाम्पिसिन , सल्फोनामाइड्स प्रभावकारी हैं । जब इनको मुख द्वारा सेवन कराया जाता है तब गम्भीर प्रकार के साइड इफेक्टस होते हैं । 

• दुबारा संक्रमण हो सकता है इसलिये फालोअप ( Follow up ) आवश्यक है । 

• 10 - 12 सप्ताह तक लाभ न मिले तो रोगी को बता देना चाहिये कि रोग और उसके उपद्रवों की चिकित्सा 1 वर्ष तक सम्भव है । 

• यदि फोलिकल्स आकार में बहुत बड़े हो गये हों तो ‘ फोरनिक्स ' का सर्जिकल इक्सीजन ( Excision ) आवश्यक है ।


याद रहे
• रोहेंजन्य विकृतियों के उपचार में शीघ्रता की आवश्यकता होती है , अन्यथा कॉर्निया ( स्वच्छपटल ) सदैव के लिये धूमिल हो जाता है । यदि पलकों की बरौनियाँ पलक के किनारों सहित अंदर की ओर मुड़गई हों तो पलकबन्दी ( Entropion Correction ) द्वारा उनका उपचार होना चाहिये । 
• कार्नियल अल्सर का उपचार नेत्र विशेषज्ञ से ही करवाना चाहिये । 


नोट - इस बीमारी की रोकथाम एवं बचाव भी उसी तरह सम्भव हैं , जिस प्रकार आँखों का दुखना ( कंजंक्टिवाइटिस ) में उपाय बताये गये हैं ।

Sunday, June 2, 2019

मसूड़ों से खून आना [ Bleeding Gums ] की समस्या के परिचय एव चिकित्सा ? Introduction to the problem of bleeding gums [Bleeding Gums] and medicine?

मसूड़ों से खून आना [ Bleeding Gums ] 

मसूड़ों से खून आना [ Bleeding Gums ] की समस्या के परिचय एव चिकित्सा ? Introduction to the problem of bleeding gums [Bleeding Gums] and medicine?
Bleeding Gums


यह एक बहुत ही सामान्य ( Common ) अवस्था है । अनेक रोगी मसूडों से रक्त आने की शिकायत करते हैं । आजकल मसूड़ों से खून आने का विकार ठीक तरह से ब्रुश न करने से होता है । असावधानी के कारण मसूड़े बराबर हिलते रहते हैं । मसूड़े जख्मी होकर कुछ समय बाद फूलने लगते हैं तब साधारण ब्रुश करने या अंगुली के दबाव मात्र से रक्त निकलने लगता है । 

• कभी - कभी भोजन के बाद घावों को भली प्रकार से साफ न करने और मसूड़ों को ठीक से न मलने से भी रक्त निकलने लगता है । 

• दाँतों पर पपड़ी ( Tartar ) जमने से भी मसूड़ों से रक्त आने लगता है ।

• कभी - कभी भोजन के बाद घावों को भली प्रकार से साफ न करने और मसूड़ों को ठीक से न मलने से भी रक्त निकलने लगता है । → दाँतों पर पपड़ी ( Tartar ) जमने से भी मसूड़ों से रक्त आने लगता है । । कभी - कभी गर्भावस्था में भी मसूड़ों से रक्त आने लगता है । यह उस समय होता है जब हार्मोन्स का सन्तुलन बिगड़ जाता है ।


व्लीडिंग गम्स की चिकित्सा



• भोजन के बाद दोनों बार ब्रुश करें । → 

• टारटार ( पपड़ी ) जमने की स्थिति में दाँतों की सफाई के लिये रोगी को दंत चिकित्सक के पास भेज देना चाहिये । ( दाँतों की सफाई For Scaling of teeth ) । 

• गर्भावस्था में मसूड़ों से रक्त आने पर मुखगुहा को स्वच्छ रखना है तथा यह स्वतः ही ठीक हो जाता है ।


कृमिदन्त / दंतकृमि डेन्टल केरीज - Dental Caries ] की समस्या के परिचय , कारण , लक्षण , चिकित्सा ? Intramuscular Dentistry - Dental Caries Introduction to the Problem, Causes, Symptoms, Treatment?

कृमिदन्त / दंतकृमि डेन्टल केरीज - Dental Caries ] 

Intramuscular Dentistry - Dental Caries Introduction to the Problem, Causes, Symptoms, Treatment?
Dental Caries


परिचय

दाँतों को साफ न रखने से कीटाणु दाँत के तने में घुस जाते हैं । अन्त में यह दन्तमज्जा तक प्रसारित हो जाते हैं । जहाँ से ये दन्तमज्जा के गढ़ में पहुँचकर सड़न की जलन पैदाकर बहुत दर्द होकर कृमिदन्त रोग पैदा करते हैं । 


कारण 



• लापरवाही एवं अस्वच्छता ।

• जो न तो प्रातः मंजन या पेस्ट आदि से दाँत साफ करते हैं और न ही भोजन के बाद अच्छी तरह कुल्ला ही । 

• गंदा पानी और सड़ा - गला दूषित भोजन । । 


लक्षण



• दाँत और दाढ़ गल जाते हैं । अन्त में टुकड़े - टुकड़े होकर निकल जाते हैं । । अथवा उनको निकलवाना पड़ता है । 

• समय - समय पर तीव्र शूल के दौरें । । → 

• पीड़ा के समय बेचैनी । । 

• इसमें दाँत के भीतर खोल सा बन जाता है अथवा दाँत गल - गलकर गिरता जाता है ,

• खोल में वस्तु के जाने से असह्य पीड़ा ।


नोट – दाँत भली प्रकार साफ न करने से , दाँतों एवं मसूड़ों में कीड़ा लग जाने से मुख दुर्गन्धित हो जाने से , दाँतों में पायरिया के कीड़े पड़कर दाँतों में दर्द होने लगता है । दर्द से व्यक्ति बेचैन होकर छटपटाता है ।

चिकित्सा -

• खट्टी , मीठी , अधिक शीतल और गर्म चीजें न दें । । 

• गरम चीज खाने के बाद तुरन्त शीतल वस्तु न दें । 

• पोटाश परमैंगनेट के गरम घोल से कुल्ला । । 

• दाँत के छेद में अमृतधारा / आयल क्लोज / क्रियोजोट / कार्बोलिक एसिड की फरेरी रख दें । 

• दर्द दूर करने के लिये सेरीडोन अथवा ब्रुफेन की 1 - 1 टि , दें । । 

• खोखली जगह में मसाला भराया जा सकता है । । 

• यदि दाँत खूब हिलता हो और लगातार दर्द रहता हो तो उस दाँत को अवश्य निकलवा दें ।


विशिष्ट चिकित्सा -

• ऑप्टालिडॉन 1 टि . + वैक्ट्रिम 1 टि . / ऐसी 1 मात्रा दिन में 3 - 4 बार गर्म जल से दें । । अथवा आप्टालिडॉन 1 टि . + डुरासाइक्लीन 2 कै . प्रथम दिन और उसके बाद 1 कै . प्रति दिन दें । 

• तीव्र दाँत दर्द में स्प्रिट क्लोरोफार्म रुई की फुरेरी से लगावें ।

नोट -  • एल्वाइट फोर्ट ( Alvite forte ) का 1 - 2 कै . हर खाने के बाद दें ।  • सोलूपेन ( Solupen - सिपला ) 1 - 3 चम्मच रोजाना दें । → 

• ब्रासील 500 मि . ग्रा . का एक वायल में डिस्टल्ड वाटर मिलाकर माँस में नित्य लगावें । । 

• कॉरबुटिल 1 टि . + वैक्ट्रिम 1 टि . - ऐसी 1 मात्रा गर्म जल से दिन में 3 - 4 बार दें ।